पेट्रोल और डीज़ल के दाम अब तक की रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं. कर्नाटक चुनाव के दौरान 19 दिनों तक तेल के दामों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. लेकिन चुनाव ख़त्म होने के बाद से तेल कंपनियों की तरफ़ से दाम बढ़ाने का सिलसिला रुक ही नहीं रहा है. हालांकि बीते दो दिनों में इनमें कुछ गिरावट जरूर हुई है लेकिन, पहले दिन एक पैसे और फिर पांच और सात पैसे की इस गिरावट को कई जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा बता रहे हैं.

उधर, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का बचाव करने की कोशिशें जारी हैं. सोमवार को उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की क़ीमतें उनके (यानी सरकार के) नियंत्रण से बाहर हैं. उन्होंने कहा, ‘कच्चे तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़ा और डॉलर व रुपये की दर में अंतर की वजह से ऐसी स्थिति बनी है.’

इस मुद्दे पर राज्य सरकारों की भूमिका को दोष देते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने आगे कहा, ‘पिछले दिनों केंद्र ने (पेट्रोल और डीज़ल पर) टैक्स घटाया था लेकिन राज्यों ने उस अनुपात में कमी नहीं की. हम उन पर दबाव नहीं डाल सकते, केवल अनुरोध कर सकते हैं.’ केंद्रीय मंत्री के मुताबिक़ मोदी सरकार ग़रीबों और मध्यम वर्ग की समस्याओं के प्रति गंभीर है और वह तेल की बढ़ती क़ीमतों का कोई हल ज़रूर निकालेगी.

एक ही बात का दोहराव

यह पहली बार नहीं था जब पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों को लेकर पेट्रोलियम मंत्री ने एक ही तरह की बात एक बार फिर कही हो. मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान पिछले साल सितंबर में पेट्रोल के दाम पहली बार 70 रुपये के पार पहुंचे थे. तब से धर्मेंद्र प्रधान इस मुद्दे को लेकर किए जाने वाले सवालों का जवाब इसी तरह दे रहे हैं कि सरकार ज़रूर जल्द ही कोई हल निकालेगी. वह हल क्या है या क्या हो सकता है यह अभी तक नहीं पता चल पाया है.

जीएसटी का बहाना?

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के उतार-चढ़ाव और राज्य सरकारों के असहयोग के अलावा भारत में बढ़ रहीं क़ीमतों के लिए तेल निर्यातक देशों की भूमिका को भी दोषी ठहराया जाता रहा है. ये तमाम मजबूरियां गिनाते हुए पेट्रोलियम मंत्री यह कहना नहीं भूलते कि अगर तेल के दामों को वस्तु और सेवा कर के तहत लाया जाए तो ग्राहकों को काफ़ी ज़्यादा राहत मिल सकती है.

तो सरकार यह करती क्यों नहीं? आलोचकों का कहना है कि सरकार के नियंत्रण के बाहर की सभी वजहें गिनाने के बाद मंत्री शुल्क में कमी या जीएसटी लागू करने की बात तो करते हैं, लेकिन फिर यह भी कहते हैं कि इसके लिए वे राज्यों पर दबाव नहीं डाल सकते. हालांकि उनकी यह बात इसलिए गले नहीं उतरती क्योंकि इस समय देश के अधिकतर छोटे-बड़े राज्यों में उन्हीं की पार्टी या उसके सहयोगियों की सरकार है. ऐसे में सवाल किया जा रहा है कि क्या आम आदमी को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और भाजपा अपने ही लोगों पर दबाव नहीं डाल सकते. अब तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने भी कह दिया है कि तेल के दामों को जीएसटी के तहत लाया जाना चाहिए. फिर भी सरकार और उसके मंत्री मजबूरियां गिनाते रहते हैं.

पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ी क़ीमतों से परेशान लोगों का कहना है कि जब सरकार के हाथ में कुछ है ही नहीं तो पेट्रोलियम मंत्री जीएसटी का ज़िक्र कर क्यों रहे हैं. उनके मुताबिक जब से केंद्र सरकार ने तेल के दाम तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को दिया है तब से अब तक के सिलसिले पर ग़ौर करने पर पता चल जाता है कि पेट्रोलियम मंत्री ने जीएसटी को इस मुद्दे से जुड़े सवालों से बचने का बहाना बना लिया है.

सरकार के मंत्रियों का रवैया

इस मुद्दे पर पेट्रोलियम मंत्री और उनकी सरकार के अन्य मंत्रियों और पार्टी के लोगों के बयानों में भी फ़र्क़ है. धर्मेंद्र प्रधान जहां लोगों को राहत देने के लिए अज्ञात उपायों का ज़िक्र करते हैं तो उनके सहयोगी अप्रत्यक्ष रूप से संदेश और संकेत देते हैं कि तेल के दाम में बढ़ोतरी सही है और ये कम नहीं होने वाले.

मिसाल के लिए क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का हालिया बयान लिया जा सकता है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ जब उनसे पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि इन पर लगने वाले शुल्कों से ही विकास के कार्य होते हैं. कुछ इसी तरह का बयान केंद्रीय मंत्री के अल्फोन्स ने दिया था. पिछले सितंबर में उन्होंने कहा था कि सरकार लोगों की भलाई के लिए घर-शौचालय बनाती है, गांवों में बिजली लाती है और इसके लिए पैसे की ज़रूरत होती है. उन्होंने कहा था, ‘लोग अगर कार-बाइक लेते हैं तो उन्हें चलाने के लिए पेट्रोल भी ख़रीदना होगा. हम लोगों पर इसलिए टैक्स लगा रहे हैं कि ग़रीब सम्मान के साथ जी सकें.’ वे यह तक कह बैठे कि गाड़ियां ख़रीदने वाले भूखे नहीं मर रहे.

उनके अलावा केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ला ने हाल में कहा, ‘कच्चा तेल आयात किया जाता है. विदेशी कंपनियां क़ीमतें बढ़ा रही हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय कह चुका है कि पेट्रोल तथा डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए, लेकिन मुद्दा यह है कि इस प्रस्ताव को जीएसटी काउंसिल के समक्ष तब तक नहीं लाया जा सकता, जब तक सभी राज्यों के वित्त मंत्रालय इसे मंज़ूरी न दें.’

वहीं, भाजपा नेता जे मिश्रा इतिहास के आधार पर बढ़ते क़ीमतों को लेकर सरकार का बचाव करते दिखे. कुछ दिन पहले उन्होंने कहा कि कांग्रेस आज मोदी सरकार का विरोध कर रही है, लेकिन यूपीए के दस साल के कार्यकाल में पेट्रोल 29 रुपये प्रति लीटर से 74 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया था. यानी तेल के दाम और बढ़ेंगे और इस पर तब तक कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए जब तक एनडीए सरकार यूपीए की बराबरी न कर ले.

वहीं, टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ तेल की मौजूदा क़ीमतों को लेकर भाजपा के एक शीर्ष नेता ने कहा, ‘यह कोई अच्छी स्थिति तो नहीं है लेकिन हम इसका सामना करेंगे. अर्थव्यवस्था के हित और सरकार की आमदनी को ध्यान में रखते हुए कभी-कभी कड़े फैसले लेने पड़ते हैं.’

ख़ुद पेट्रोलियम मंत्री के बयानों में विरोधाभास साफ़ नज़र आता है. जब मोदी सरकार के रहते पेट्रोल का दाम पहली बार 70 रुपये के पार गया था तब धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि सरकार तेल कंपनियों द्वारा पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें तय करने से संबंधित अपनी नीति में बदलाव नहीं करेगी. उन्होंने कहा था कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है और पेट्रोल के दामों में बदलाव होते रहेंगे क्योंकि यह ग्राहकों के हित में है. यह नीति 16 जून, 2017 से लागू की गई थी. उस समय दिल्ली में पेट्रोल 63 रुपये के आसपास था. तब से लोगों के हित के लिए इस क़ीमत में 15 रुपये से ज़्यादा का इज़ाफ़ा हो चुका है.

जनता को राहत नहीं देने में केंद्र और राज्य ‘साथ-साथ’

पेट्रोल ख़रीदने पर अभी 80 प्रतिशत से ज़्यादा कर लगता है. यानी अगर देश में पेट्रोल की औसत क़ीमत 80 रुपये प्रति लीटर है तो लगभग आधा पैसा कर की वजह से बढ़ा हुआ है. इसमें राज्य और केंद्र दोनों का हिस्सा होता है. राज्य सरकारें केंद्र से पेट्रोलियम उत्पादों पर लग रहे कर और उससे हो रही आमदनी का बड़ा हिस्सा ख़र्चे के रूप में लेती हैं. यह एक बड़ी वजह है कि कई राज्य तेल के दामों को जीएसटी के तहत लाने के लिए तैयार नहीं हैं.

वहीं, जीएसटी के नियम के मुताबिक़ पेट्रोलियम उत्पादों पर ज़्यादा से ज़्यादा 28 प्रतिशत कर लगाया जा सकता है. ज़ाहिर है उन्हें जीएसटी के तहत लाने से सरकार के राजस्व को बड़ा नुक़सान होगा. कर के रूप में जो अपेक्षाकृत कम रक़म आएगी उसे केंद्र और राज्यों में बांटना होगा. साफ़ है कि ऐसा करने से सरकारों की आमदनी लगभग आधाी हो जाएगी. रिपोर्टों के मुताबिक़ यह नुक़सान उठाने के मूड में न तो केंद्र है और न ही राज्य.

इसके अलावा टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर के मुताबिक़ फ़िलहाल मोदी सरकार तेल के दामों में एक्साइज ड्यूटी जैसे शुल्क कम करने का भी विचार नहीं कर रही. सूत्रों के हवाले से अख़बार ने बताया कि सरकार को लगता है कि ऐसा करने से उसकी आमदनी पर असर पड़ेगा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए फ़ंड की कमी हो जाएगी. वह उम्मीद लगा रही है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम घटें तो ग्राहकों को राहत मिले.

लेकिन यहां भी यह जानकर निराशा ही मिलती है कि कच्चे तेल के दाम पिछले कुछ दिनों से गिर रहे हैं और रुपया भी 1.5 प्रतिशत मज़बूत हुआ है, इसके बावजूद सरकार की तरफ़ से बड़ी राहत के कोई संकेत नहीं मिल रहे. तेल कंपनियां क़ीमतों में एक और पांच-सात पैसे की कटौती कर ग्राहकों का मज़ाक़ बना रही हैं.