हाल ही में सीबीएसई की 10वीं और 12वीं कक्षाओं की परीक्षा के नतीजे घोषित हुए. इनमें एक बार फिर से लड़कों के मुकाबले लड़कियों का पलड़ा भारी रहा. 12वीं की परीक्षा में जहां पहले दो स्थान लड़कियों को मिले तो वहीं 10वीं में तीन लड़कियां संयुक्त रूप से पहले स्थान पर रहीं. दोनों ही कक्षाओं में पास होने वाली लड़कियों की संख्या भी लड़कों से ज्यादा है. लड़कियों की यह उपलब्धि सिर्फ 2018 के सीबीएसई के परीक्षा परिणामों में ही सामने नहीं आई है, बल्कि पिछले कुछ सालों में यह एक पैटर्न जैसा बन गया है.

लड़कियों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में लड़कों को पीछे छोड़ना कई कारणों से उनकी सफलता को ज्यादा बड़ा बनाता है. न्यूनतम संसाधनों और सहयोग के साथ बोर्ड की परीक्षाओं में इतने अच्छे परिणाम लाने के कारण ये लड़कियां हमें लड़कों की तुलना में ज्यादा गौरवान्वित करती हैं. यहां हम उन पांच कारणों को जानने की कोशिश कर रहे हैं जिनके चलते हमें लड़कियों पर फक्र करना चाहिये और बतौर समाज खुद पर शर्मिंदा भी होना चाहिए.

1 . हर जगह लड़कियां अव्वल

लड़कियों ने न सिर्फ सीबीएसई बोर्ड में बल्कि देश के कई अन्य राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में भी छात्रों को पछाड़ा है. उत्तराखंड राज्य बोर्ड की 12वीं में परीक्षा में 83 फीसदी लड़कियां पास हुईं जबकि लड़कों के लिये यह आंकड़ा 75 फीसदी रहा. उधर, 10वीं में यह अनुपात 80: 69 का रहा. ऐसा ही हरियाणा राज्य बोर्ड में दिखा. 12वीं में 72 फीसदी लड़कियों के मुकाबले 57 फीसदी लड़के पास हुए और 10वीं में आंकड़ा 55 फीसदी बनाम 48 फीसदी का रहा. यही स्थिति कर्नाटक, गुजरात, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भी है.

2. टॉप करने वालों में लड़कियां लड़कों से ज्यादा हैं

सीबीएसई बोर्ड में 10वीं और 12वीं दोनों कक्षाओं में टॉप करने वाले छात्रों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है. 12वीं की परीक्षा में पहले दो स्थान पर लड़कियां रहीं. 10वीं में न सिर्फ तीन लड़कियां संयुक्त रूप से पहले स्थान पर रही हैं बल्कि दूसरे स्थान पर आने वाले सात छात्रों में से भी पांच लड़कियां हैं. इसी तरह हरियाणा बोर्ड के 10वीं के परिणाम में दूसरे स्थान पर आने वालों में दो लड़कियां हैं. इसी तरह उत्तराखंड बोर्ड में 10वीं और 12वीं में टॉप करने वाली लड़कियां ही हैं. लगभग सभी राज्यों में 10वीं और 12वीं में टॉप करने वालों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा या उनके बराबर है.

3. लड़कों की अपेक्षा कम लड़कियां परीक्षा में बैठीं लेकिन, उनसे ज्यादा संख्या में पास हुईं

हर साल न सिर्फ सीबीएसई में बल्कि देश के लगभग सभी राज्यों की 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में लड़कों की तुलना में कम लड़कियां परीक्षा में बैठती हैं. इसके बावजूद बोर्ड परीक्षाओं में पास होने वाली लड़कियों का प्रतिशत लड़कों से ज्यादा है. इसी बात से पता चलता है कि हमारा समाज लड़कियों की शिक्षा के प्रति कितना ज्यादा उदासीन है. लेकिन इस उदासीनता के बावजूद पढ़ने का मौका मिलने पर लड़कियां लड़कों से ज्यादा बेहतर परिणाम ला रही हैं.

सीबीएसई के अनुसार इस साल 12वीं की परीक्षा में लगभग सात लाख लड़कों की तुलना में पांच लाख लड़कियां बैठी थीं. लेकिन इसमें पास होने वाली लड़कियों का आंकड़ा 88 प्रतिशत है और लड़कों का इससे नौ फीसदी कम यानी सिर्फ 79 प्रतिशत. इसी तरह 10वीं की परीक्षा देने वालों में लगभग 10 लाख लड़के थे और सिर्फ सात लाख लड़कियां. लेकिन इसमें भी लगभग 85 फीसदी लड़कों के मुकाबले 89 फीसदी लड़कियां पास हुईं.

4. ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों का पास प्रतिशत शहरी छात्रों से ज्यादा है

कई राज्यों के बोर्ड के परीक्षा परिणामों में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है. वह यह कि ग्रामीण इलाकों के छात्र-छात्राओं के पास होने का प्रतिशत शहरी छात्र- छात्राओं से ज्यादा है. हरियाणा में 65 प्रतिशत ग्रामीण छात्रों की अपेक्षा 62 प्रतिशत शहरी बच्चों ने 12वीं की परीक्षा पास की. इस तरह कर्नाटक में 60 प्रतिशत ग्रामीण छात्रों की अपेक्षा 59 प्रतिशत शहरी छात्रों ने 12वीं की परीक्षा पास की. जिन राज्यों में ग्रामीण इलाकों के छात्रों ने शहरी छात्रों की अपेक्षा ज्यादा संख्या में बोर्ड परीक्षा पास की, वहां भी पास करने वाली लड़कियों का प्रतिशत लड़कों से ज्यादा है. यानी गांवों में रहने वाली लड़कियों ने लड़कों से ज्यादा संख्या में बोर्ड की परीक्षा पास की है.

ग्रामीण लड़कियों पर ग्रामीण लड़कों और शहरी लड़के-लड़कियों की अपेक्षा घर और खेत आदि के कामों का अक्सर ही ज्यादा भार होता है. इस कारण उन्हें पढ़ाई के लिये तुलनात्मक रूप से कम समय मिलता है. इसके साथ ही बहुत सारे गांवों में बिजली की सुविधा तक नहीं होती. साथ ही बहुत बार अच्छे शिक्षकों की कमी और ट्यूशन के विकल्प न होने की कमी से भी छात्रों को जूझना पड़ता है. इन तमाम परेशानियों के साथ गांव के लड़कों की तुलना में ग्रामीण लड़कियों की सफलता के कहीं ज्यादा मायने हैं.

5. दिव्यांग श्रेणी में भी लड़कियों ने टॉप किया

सीबीएसई की दिव्यांग श्रेणी में 12वीं की परीक्षा में टॉप करने वाले तीन छात्रों में से दो लड़कियां हैं. न सिर्फ 12वीं बल्कि 10वीं कक्षा की दिव्यांग श्रेणी में भी टॉप करने वालों में तीन लड़कियां हैं.

यूं तो सभी दिव्यांग लोगों की किसी भी क्षेत्र की सफलता ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. लेकिन दिव्यांग लड़कियों की सफलता को दिव्यांग लड़कों की सफलता से ज्यादा आंका जाने के पीछे कुछ ठोस तर्क हैं. हमारे समाज में अक्सर ही लड़कियों की बीमारियों, शारीरिक मानसिक तकलीफों, उनकी जरूरतों या फिर किसी भी किस्म की अपंगता पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है. अक्सर ही दिव्यांग लड़कियों को उनकी जरूरतों के अनुसार कोई खास ट्रेनिंग या सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती. इसलिये दिव्यांग लड़कियों की शैक्षिक सफलता भी हमें उनके प्रति ज्यादा सम्मान से भरती है.

12वीं में लड़कियों के ज्यादा संख्या में परीक्षा पास करने के बावजूद दुखद विडंबना है कि उच्च शिक्षा में लड़कों का दाखिला ज्यादा होता है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार 2014-15 में उच्च शिक्षा में जहां 18 लाख लड़कों का रजिस्ट्रेशन हुआ, वहीं लड़कियों की संख्या सिर्फ 15 लाख ही थी.

10वीं और 12वीं में अच्छे रिजल्ट के बावजूद उच्च शिक्षा में लड़कियों के गिरते प्रतिशत के पीछे कई कारण नजर आते हैं. एक तो हमारे यहां बहुत सारी लड़कियों की शादी कम उम्र में ही हो जाती है. दूसरा मां-बाप को लगता है कि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियों के लिए लड़का ढूंढ़ने में दिक्कत होगी. इसके अलावा महंगी शिक्षा के चलते भी ज्यादातर माता-पिता सिर्फ बेटों की उच्च शिक्षा पर ही अपना पैसा खर्च करना पसंद करते हैं.

आज भी कमाई करने और घर चलाने की जिम्मेदारी सिर्फ लड़कों की ही मानी जाती है. इसलिए लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की पढ़ाई उतनी महत्वपूर्ण नहीं समझी जाती. लेकिन 10वीं और 12वीं की परीक्षा के परिणाम ही बताते हैं कि इसके बावजूद वे लड़कों से अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं. यानी अगर उन्हें बराबरी का मौका मिले तो वे इससे कहीं बेहतर करने की क्षमता रखती हैं.