सीबीएसई की 12वीं और 10वीं कक्षा के नतीजे आ चुके हैं. हर बार की तरह टॉपर्स की चर्चा है. 12वीं में नोएडा के स्टेप बाइ स्टेप स्कूल की मेघना श्रीवास्तव ने पहला स्थान हासिल किया है. 500 में से 499 अंक लाकर उन्होंने खुद के साथ देश भर को भी हैरान कर दिया. उधर, 10वीं के नतीजों में तो और भी कमाल हो गया. यहां चार छात्रों के 499 अंक आए.

नतीजों के बाद मेघना का कहना था कि इस प्रदर्शन से वे अभिभूत हैं. उनकी मानें तो उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उन्हें 499 अंक मिलेंगे. मेघना ने कहा, ‘सच कहा जाए तो कोई भी इतने अंकों की उम्मीद नहीं करता.’

बेशक 99.8 फीसदी अंक लाने वाले इन विद्यार्थियों की प्रतिभा का लोहा पूरा देश मान रहा है. लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या आज से पांच या 10 वर्ष पहले ऐसे विद्यार्थी ही नहीं थे जो 99.8 फीसदी अंक लाने के काबिल हों. या उस समय शिक्षक अंक देने में कंजूसी कर रहे थे? या फिर उन दिनों का अंक देने का तरीका अब से अलग था?

सीबीएसई के शिक्षकों से बात करने और पिछले सालों के नतीजों और प्रश्नपत्रों पर ध्यान देने से दो बातें साफ होती हैं. पहली यह कि सीबीएसई ने अंक देना बहुत आसान कर दिया है. दूसरी, प्रश्नपत्र पहले से और आसान हुए हैं.

पंजाब के तरनतारन जवाहर नवोदय विद्यालय के प्राचार्य और रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) के शिक्षक डॉक्टर अनिल कुमार शर्मा कहते हैं, ‘पिछले सालों में सीबीएसई स्टूडेंट्स के लिए ज़्यादा स्कोर करना काफी आसान हो गया है. एक तो यहां मार्क्स का मॉडरेशन है. उसके बाद लगभग हर विषय में प्रैक्टिकल मार्क्स हैं. और फिर क्वेश्चन पेपर भी आसान होता जा रहा है.’

मार्क्स मॉडरेशन पॉलिसी के तहत अंक तब बढ़ाए जाते हैं जब किसी भी विषय के तीन अलग-अलग सेट्स के सवालों की कठिनाई के स्तर में अंतर हो या फिर किसी सवाल में गलती हुई हो. इसके लिए बाकायदा कमेटी बनती है जो दिए जाने वाले अंकों पर निर्णय लेती है. हालांकि मॉडरेशन पॉलिसी में पारदर्शिता की कमी के कारण इसकी काफी आलोचना होती रही है. पिछले साल खुद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस पॉलिसी को बेतुका बताया था. इसके अलावा उनके मंत्रालय का कहना था कि मॉडरेशन के ज़रिए अंक बढ़ाने की इस प्रक्रिया को खत्म करने पर सीबीएसई समेत अन्य बोर्डों ने हामी भर दी है. वैसे बताया जा रहा है कि इस बार परीक्षाओं में तीन के बजाय सवालों का एक ही सेट रखा गया था ताकि मॉडरेशन की ज़रूरत ही न पड़े. हालांकि कुछ खबरों की मानें तो इस बार भी मॉडरेशन किया गया है.

अगर प्रश्नपत्र के और आसान होने की बात करें तो दिल्ली के एक निजी स्कूल में अंग्रेजी की शिक्षिका अपना नाम न देने की शर्त पर बताती हैं कि हर साल सवाल आसान और सीधे होते जा रहे हैं. वे कहती हैं, ‘अंग्रेजी जैसे विषय में भी अब बच्चे अगर 99 तक अंक लाने लगे हैं तो इसलिए कि सवालों की गुणवत्ता पहले जैसी नहीं बची है.’ वे अंग्रेज़ी में 100 अंक लाने की पड़ताल करते एक आलेख का ज़िक्र करती हैं. इसके अलावा वे ज़्यादातर विषयों में प्रैक्टिकल के 20 अंक जोड़ दिए जाने को भी ज़िम्मेदार ठहराती हैं. मसलन अब इतिहास और अर्थशास्त्र जैसे विषयों में भी प्रयोग के लिए 20 अंक रखे जाने लगे हैं.

जवाहर नवोदय विद्यालय के एक और प्राचार्य बच्चों के बढ़ते अंकों के चार कारण गिनाते हैं. वे कहते हैं कि अव्वल तो हर विषय के पाठ्यक्रम से कठिन हिस्सों को हटा कर पाठ्यक्रम सीमित कर दिया गया है. दूसरे, प्रश्नपत्रों का कठिनाई स्तर भी लगातार कम किया गया है. तीसरे, उत्तर पुस्तिका जांचने वाले शिक्षकों को निर्देश हैं कि यदि परीक्षार्थी किसी सवाल का उत्तर सही से समझा नहीं पाता लेकिन अगर शिक्षक को लगता है कि बच्चे को सवाल का उत्तर पता है तो उसे पूरे अंक दिए जाएं.

इसके अलावा वे निजी विद्यालयों के शिक्षकों के स्तर पर भी सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, ‘सीबीएसई स्कूलों में सिर्फ केंद्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों को छोड़ दिया जाय तो अधिकतर स्कूल निजी हाथों में हैं. इनमें से भी प्रतिष्ठित स्कूलों को हटा दें तो बाकी स्कूलों में शिक्षकों का स्तर बहुत अच्छा नहीं है. ये शिक्षक जब आंसरशीट जांचते हैं तो उसके साथ न्याय नहीं कर पाते.’ वे निजी स्कूलों और सीबीएसई के अधिकारियों की मिलीभगत को बच्चों के बढ़ते अंकों और मॉडरेशन के खेल के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं. हालांकि वे यह भी कहते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट की वजह से बच्चों के पास अपने विषय को लेकर अपडेट रहने के मौके बढ़ गए हैं, यह भी एक वजह है कि बच्चे अच्छा कर रहे हैं.

वहीं दिल्ली के एक केंद्रीय विद्यालय की प्राचार्या मानती हैं कि बच्चों के बढ़ते मार्क्स उनकी अपनी मेहनत का नतीजा हैं. वे कहती हैं, ‘खासकर लड़कियां काफी मेहनत करती हैं. उन्हें पूरी-पूरी टेक्स्टबुक याद रहती है.’

बहस का मुद्दा यह भी है कि क्या बच्चों को इतने अंक दिए जाने चाहिए. इस बार 12,737 बच्चों को 95 फीसदी या उससे ज़्यादा अंक मिले हैं. इन बच्चों और खासकर 98 या 99 फीसदी अंक लाने वाले बच्चों को लेकर यह आशंका जताई जा रही है कि एक तरफ ये बच्चे खुद को सबसे बेहतर समझने लगेंगे जिससे इनके और बेहतर होने की संभावना कम होगी. दूसरे, आने वाले समय में ज़रा सी भी असफलता इन्हें और इनके अभिभावकों के मनोबल को बहुत अधिक प्रभावित करेगी. इसके अलावा बहस का दूसरा पहलू यह भी है कि 75 या 85 फीसदी अंक लाने वाले विद्यार्थियों में भी इनके चलते हीन भावना बढ़ेगी.