उत्तर प्रदेश में कैराना और मीरपुर लोक सभा सीटों पर हुए उपचुनाव में संयुक्त विपक्ष का प्रयोग एक बार फिर सफल रहा. इसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस ने जेडीएस (जनता दल-धर्मनिरपेक्ष) को समय पर समर्थन देकर आसानी से सत्ता में वापसी कर ली. इसके बाद अब माना जा रहा है कि कांग्रेस यही प्रयोग संसद भी दोहरा सकती है. एक मौका इसी महीने आने वाला है जब राज्य सभा के उपसभापति का चुनाव होगा.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक राज्य सभा के मौज़ूदा उपसभापति पीजे कुरियन का कार्यकाल इसी महीने ख़त्म होने वाला है. इससे पहले नए उपसभापति का चुनाव होगा. संसद के उच्च सदन की स्थिति ये है कि कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी में से कोई भी अन्य दलों के समर्थन के बिना अपना उपसभापति नहीं बनवा सकती. हालांकि भाजपा के पास सबसे ज़्यादा सीटें हैं. लेकिन इतनी नहीं कि वह अपना उपसभापति बनवा ले. ऐसे में उपसभापति का चुनाव रोचक होने की पूरी संभावना है.

सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने के मक़सद से इस पद के लिए अपनी दावेदारी छोड़ने को तैयार हो सकती है. वह ओडिशा के सत्ताधारी दल- बीजेडी (बीजू जनता दल), पश्चिम बंगाल के तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) या किसी अन्य विपक्षी दल के उम्मीदवार को समर्थन दे सकती है. बताया जाता है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने इस बाबत बीजेडी, टीएमसी सहित अन्य विपक्षी दलों से संपर्क साधना भी शुरू कर दिया है. इसमें भी कांग्रेस का झुकाव बीजेडी की तरफ़ ज्यादा बताया जाता है.

सूत्रों की मानें तो ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले कुछ समय में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बीजेडी ने केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) सरकार की नीतियों का समर्थन किया है. ऐसे में अगर उसने उपसभापति चुनाव में भी सत्ताधारी गठबंधन का साथ दिया तो विपक्ष को हार का मुंह देखना पड़ सकता है. लिहाज़ा बीजेडी को ही इस बात के लिए मनाया जा रहा है कि वह उपसभापति के पद के लिए अपना उम्मीदवार उतारे. बाकी विपक्ष उसका समर्थन करेगा.

कांग्रेस के एक रणनीतिकार कहते भी हैं, ‘तीन पार्टियां हैं- बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और वाईएसआर कांग्रेस. इनमें से दो के बारे में (टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस के) तो हम दावे के साथ नहीं कह सकते कि वे हमारे साथ आ जाएंगे. लेकिन बीजेडी से उम्मीद की जा सकती है. वह अगर विपक्षी खेमे में आ जाती है तो हम आसानी से बहुमत के लिए ज़रूरी 122 का आंकड़ा जुटा लेंगे.’ अलबत्ता यह तो फिर भी क़रीब-क़रीब तय है कि राज्य सभा और लोक सभा का यह आख़िरी पद भी कांग्रेस के हाथ में शायद न रहे.