उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) की प्रत्याशी तबस्सुम हसन की जीत के साथ उत्तर प्रदेश को चार सालों के बाद लोकसभा का पहला मुस्लिम सांसद मिल गया है. द टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक इससे पहले 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी और अपना दल ने मिलकर चुनाव लड़ा था. उत्तर प्रदेश में 19 फीसदी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद दोनों दलों ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था. भाजपा-अपना दल के इस गठबंधन को राज्य की 80 में से 73 सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी.

31 मई को आए उपचुनाव के नतीजों में रालोद की तबस्सुम हसन ने भाजपा की अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी मृगांका सिंह पर 44618 वोटों से जीत दर्ज की. इससे पहले साल 2009 के आम चुनाव में भी तबस्सुम हसन इसी सीट से सांसद चुनी गई थीं. तब उन्होंने भाजपा उम्मीद्वार हुकुम सिंह को हराया था.

चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि इस उपचुनाव में तबस्सुम हसन को न सिर्फ मुस्लिम और दलित बल्कि जाट वोटरों के बड़े वर्ग का समर्थन भी मिला. साल 2014 के आम चुनाव के दौरान जाट और दलित वोट वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में जाने से इसके प्रत्याशी को जीतने में कामयाबी मिली थी. अपनी इस जीत पर तबस्सुम हसन का कहना था, ‘विपक्षी दलों की एकजुटता ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र किस तरह काम करता है. जाति और धर्म को भुलाकर हम एकजुटता के साथ 2019 के आम चुनाव में भाजपा को पराजित करेंगे.’

उधर, उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष जेपीएल राठौर ने अपनी पार्टी की हार पर कहा, ‘विकास के ऊपर फतवा भारी पड़ गया.’ उन्होंने यह भी माना ​कि गैर भाजपाई वोट के न बंटने और विजेता प्रत्याशी के पक्ष में जाने से भी पार्टी के प्रतिस्पर्धी प्रत्याशी को फायदा मिला.