देश की 10 विधानसभा और चार लोकसभा सीटों पर हुए हालिया उपचुनावों में भाजपा को करारी हार मिली. गुरुवार को आए नतीजों में वह केवल महाराष्ट्र की पालघर लोकसभा और उत्तराखंड की थराली विधानसभा सीट जीत पाई. इस उपचुनाव में उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर सबकी नजरें थीं जिसे भाजपा बनाम विपक्ष के रूप में देखा जा रहा था. यहां संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने भाजपा की मृगांका सिंह को अच्छे-खासे अंतर से हरा दिया.

राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ीं तबस्सुम हसन को सपा और बसपा का साथ मिला. लेकिन चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के मुखिया प्रचार करते नहीं दिखे. सवाल उठ रहा था कि अखिलेश यादव और मायावती ऐसा क्यों कर रहे हैं. अब टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट को मानें तो यह रणनीति थी. रणनीति यह थी कि कैराना के मतदाताओं को 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की याद से दूर रखा जाए.

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने में इन दंगों की खासी भूमिका रही थी. सपा के अंदर के लोगों का कहना है कि मुजफ्फरनगर दंगे ऐसे समय में हुए थे जब पार्टी राज्य की सत्ता में थी. उन्होंने बताया कि अखिलेश ने प्रचार नहीं करने का फैसला इसलिए किया कि भाजपा को ध्रुवीकरण का मौका न मिले. उनका कहना था कि विपक्ष के दोनों उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से थे और अगर अखिलेश प्रचार करते तो लोगों को दंगे याद आ सकते थे.

शायद यही वजह है कि गुरुवार की जीत के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि उन्होंने (यानी विपक्ष) भाजपा को उसी के हथियार से हरा दिया. जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि कैराना उपचुनाव में वे प्रचार के लिए क्यों नहीं उतरे तो उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों से डर गए थे. अखिलेश ने कहा, ‘भाजपा अपने ही हथियार से हार गई.’

इसी तरह बसपा प्रमुख मायावती भी चुनाव अभियान के दौरान खामोश रहीं. पार्टी के सूत्रों का कहना है कि मायावती ने पार्टी के लोगों को सपा और आरएलडी के साथ काम करने के निर्देश दिए और खुद चुप रहने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि दलित मतदाताओं को भाजपा की तरफ जाने से रोकने के लिए मायावती ने सपा-आरएलडी को खुला समर्थन नहीं दिया. पार्टी के एक नेता ने बताया, ‘मायावती पहले ही साफ कर चुकी थीं कि (लोकसभा चुनाव के लिए) सपा और बसपा का गठबंधन सीटों के बंटवारे के स्तर पर पहुंच चुका है, इसलिए उन्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी.’