भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हाल में देश भर के सभी प्रमुख संपादकों से मिले. उन्होंने सबसे पहले राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के संपादकों से मुलाकात की. इसके बाद उनकी प्रिंट मीडिया के संपादकों के साथ बैठक हुई और फिर वे क्षेत्रीय समाचार चैनलों और अखबारों के पत्रकारों से मिले.

राजधानी दिल्ली के अशोक होटल की तीसरी मंजिल पर पार्टी ने ‘साफ नीयत, सही विकास’ के नारे का बोर्ड टांगा था. मनोरंजन चैनलों की तरह ही बड़ी सी एलईडी स्क्रीन लगाई गई थी और वित्त मंत्री के साथ रेल मंत्री की जिम्मेदारी संभालने वाले पीयूष गोयल मोदी सरकार के काम काज पूरा ब्योरा पत्रकारों को पेश करते थे. अलग-अलग दिन मोदी सरकार के अलग-अलग मंत्री पत्रकारों और संपादकों से खुलकर मुलाकात करते थे. सुनी-सुनाई है कि पूरी बातचीत अनौपचारिक और साफ-साफ लहजे में हुई.

ऐसी ही मुलाकातों में मौजूद रहे कुछ संपादकों और पत्रकारों से बातचीत के बाद पता चला कि अमित शाह से अलग-अलग अंदाज़ में एक सवाल जरूर पूछा गया. यह सवाल था कि क्या देश में इसी साल विधानसभा चुनाव के साथ-साथ लोकसभा चुनाव भी होंगे? शुरू में अमित शाह इस तरह के सीधे सवालों का सीधा जवाब नहीं देते थे. या तो वे हंसकर सवाल को अनसुना कर देते या फिर पूछने वाले पत्रकार से ही उल्टा सवाल पूछ लेते थे. लेकिन इस बार अमित शाह ने साफ कहा कि सरकार विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव के पक्ष में है. उनके मुताबिक विधि से लेकर नीति आयोग तक इस काम में लगे हुए हैं.

लेकिन, ऐसा इसी साल होगा इसकी संभावना अभी नहीं दिखती. भाजपा के बाकी मंत्रियों से बातचीत में एक बात साफ हुई कि सरकार जल्दी चुनाव करने के पक्ष में बिल्कुल नही हैं. एक वरिष्ठ मंत्री ने तो इस सवाल के जवाब पर हंसते हुए कहा, ‘जल्दी नहीं, हम तो देर से चुनाव करवाना चाहते हैं. जितना ज्यादा वक्त मिले उतना अच्छा रहेगा. जो गलती अटलजी ने शाइनिंग इंडिया के वक्त की थी वो गलती मोदीजी नहीं करने वाले. चुनाव तो अगले साल ही होंगे’.

सुनी-सुनाई है कि अशोक होटल में दोपहर के लंच पर मुलाकातों का लंबा दौर चला है. इन मुलाकातों में जिस तरह की बातचीत हुई उसे सुनने के बाद लगता है भाजपा अभी थोड़ी परेशान है. लंच पर हुई बातचीत के दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कुछ पत्रकारों से कहा, ‘2014 में भाजपा को अपने दम पर 282 सीटें मिली थीं. पिछले चार साल में हम 10 सीट घटकर 272 पर आ गए हैं. अगर उत्तर प्रदेश में सपा बसपा का गठबंधन हो गया तो भाजपा को सीधा नुकसान होगा. सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही पार्टी कम से कम 40 से 45 सीटें हार सकती है. अगर ऐसा हुआ तो भाजपा सीधे 220-225 के आंकड़े पर सिमट जाएगी.’ उनका आगे यह भी कहना था कि जब तक उत्तर प्रदेश में होने वाले सीटों के नुकसान की भरपाई का इंतजाम न हो जाए तब तक भाजपा चुनाव मैदान में नहीं जाना चाहेगी.

एक संपादक ने अमित शाह से सवाल किया था कि क्या महागठबंधन से भाजपा को दिक्कत आएगी. जवाब में उन्होंने जो कहा उसका लब्बोलुआब यह है कि उन्हें सिर्फ उत्तर प्रदेश को लेकर चिंता है. एक पत्रकार के शब्दों में ‘अमित शाह ने उस संपादक से कहा था कि उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां अखिलेश और मायावती अगर मिल जाएं तो वोट एक दूसरे को ट्रांसफर कर सकते हैं. बाकी राज्यों में ऐसे हालात नहीं है’.

दूसरा राज्य बिहार है जहां अगर लालू और नीतीश साथ होते तो भाजपा को मुश्किल होती. इसलिए भाजपा ने पहले ही नीतीश को लालू से अलग कर दिया और नीतीश से दोस्ती कर ली. भाजपा के संगठन में प्रभाव रखने वाले एक नेता से जब पत्रकारों ने खुलकर पूछा कि क्या उत्तर पूर्व, दक्षिण और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से भाजपा को इतनी सीटें मिल जाने की उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में होने वाले नुकसान की भरपाई हो सके. इस नेता ने बिना लाग लपेट के कहा, ‘अभी उत्तर पूर्व और दक्षिण में भाजपा को 20 सीटें भी मिलने की उम्मीद कम है. पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी को हराना बहुत मुश्किल है. इसलिए 2018 में चुनाव सोचना आत्मघाती कदम होगा’.

भाजपा 2018 में सीधे-सीधे कांग्रेस से मुकाबला करने वाली है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों ऐसे राज्य हैं जहां आमने-सामने की टक्कर होगी. भाजपा चाहती है कि इन राज्यों में नेता और संगठन दोनों जान लगा दें. पार्टी की कोशिश है कि तीन में से दो राज्यों में जरूर जीत मिले. इससे एक तीर से दो निशाने लगेंगे. पहला, भाजपा कह पाएगी कि मोदी लहर अब भी बरकरार है और दूसरा राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान कायम रहेगा.

भाजपा की रणनीति बनाने में जुटे एक सूत्र बताते हैं, ‘भाजपा किसी भी तरह राहुल गांधी को विपक्षी खेमे का नेता नहीं बनने देना चाहती. पूरी पार्टी एक रणनीति पर काम रही है कि मुकाबला तिकोना हो. तीसरे मोर्चे के तौर पर ममता बनर्जी हों या मायावती या अखिलेश यादव या फिर तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर, ये सामने जरूर आएं. किसी भी तरह से कांग्रेस के साथ सभी विपक्षी पार्टियों का प्री-पोल अलायंस ना हो’.

भाजपा नेतृत्व विपक्षी मोर्चे को तोड़ना चाहता है और तोड़ने का तरीका भी थोड़ा अलग है. भाजपा के एक मंत्री से जब पूछा गया कि राहुल गांधी के साथ अखिलेश यादव, मायावती, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी, केसीआर, कुमारस्वामी जैसे नेताओं को देखकर डर नहीं लगता. उस मंत्री ने हंसते हुए कहन था, ‘ये जितने ज्यादा दिन साथ रहेंगे उतना ज्यादा भाजपा को फायदा होगा. ये एक ऐसा गठबंधन है जो टूटेगा जरूर, बस वक्त चाहिए’.

भाजपा वक्त मांग रही है इसलिए कहा जा सकता है कि इस साल लोकसभा चुनाव की संभावना न के बराबर ही है.