एक लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार ब्रिटेन में रहने वाले पूर्व रूसी जाासूस सेर्गेई स्क्रीपाल और उनकी बेटी यूलिया की जान बचा ली गई. दोनों को अस्पताल से छुुट्टी मिल गई है और पुलिस सुरक्षा के बीच उन्हें ब्रिटेन में ही किसी अज्ञात जगह पर रखा गया है. सर्गेई और उनकी बेटी पर चार मार्च 2018 को ‘नोविचोक’ वर्ग के बेहद घातक जानलेवा रसायन का हमला किया गया था जिसके बाद से वे अस्पताल में मौत से जूझ रहे थे. शुरू के 20 दिनों तक कोमा में रहने के बाद 33 वर्षीय यूलिया स्क्रीपाल को आठ अप्रैल के दिन अस्पताल से छुट्टी मिली थी. यूलिया के 66 वर्षीय पिता को ठीक होने में डेढ़ महीने और लगे. उन्हें 18 मई के दिन छुट्टी मिली.

स्क्रीपाल पर रासायनिक हमले को लेकर ब्रिटेन ने रूस पर अारोप लगाया था और उसका सीधा इशारा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तरफ था. ब्रिटेन का कहना है कि सेर्गेई स्क्रीपाल का एक समय दोहरा जासूस होना और अब ब्रिटेन में रहना रूसी राष्ट्रपति पुतिन को सुहाता नहीं है इसीलिए वे स्क्रीपाल का काम तमाम कर देना चाहते थे. ब्रिटेन के अारोपों पर अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी ने भी उसके सुर में सुर मिलाया था.

इसी सब के बीच एेसे तथ्य भी सामने अाए हैं कि ‘नोविचोक’ का फार्मूला रूस के अलावा भी कम से कम छह और देशों के पास है. यह बात ब्रिटेन के उस दावे पर सवाल खड़ा करती है जिसमें कहा गया था कि ‘नोविचोक’ का फार्मूला सिर्फ रूस के पास है और इस हमले में उसी का हाथ है. अब साफ हो गया है कि ‘नोविचोक’ के मामले में सभी विकसित देश झूठ बोल रहे हैं और रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध के उपदेश खुद उनकेे लिए कोई मायने नहीं रखते. कभी युद्धभूमि के लिए विकसित इस जहर का इस्तेमाल जासूसी लड़ाइयों में लोगों के मारने के लिए किया जा रहा हैै.

ब्रिटिश सरकार का दावा

ब्रिटेन का कहना है कि 1980 और 90 वाले दशक में यूरोप में रह कर सेर्गेई स्क्रीपाल पहले भूतपूर्व सोवियत संघ की सैनिक गुप्तचर सेवा ‘जीआरयू’ के लिए और सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद रूस के लिए जासूसी किया करते थे. बाद में, 2004 में अपनी गिरफ्तारी होने तक, वे रूस में ही रह कर ब्रिटेन की गुप्तचर सेवा ‘एमआई6‘ के लिए जासूसी करने लगे थे. गिरफ्तार जासूसों की अदला-बदली के एक समझौते के अंतर्गत 2010 में अपनी रिहाई के बाद से वे ‘एमआई6‘ की ही छत्रछाया में ब्रिटेन में रह रहे हैं. ब्रिटिश अधिकारियों का दावा है कि स्क्रीपाल के दोहरे जासूस होने के कारण रूस के राष्ट्रपति पुतिन उन्हें खत्म कर देना चाहते थे. उन्हें मारने के लिए उनके घर के दरवाज़े की मूठ और कुछ दूसरी चीज़ों को ‘नोविचोक’ वर्ग के एक ऐसे तरल रासायनिक विष से प्रदूषित किया गया, जो त्वचा और सांस के रास्ते से शरीर में पहुंचता है और बहुत जल्द किसी की जान ले लेता है.

दावे किये, प्रमाण नहीं दिये

इस विष के रासायनिक सूत्र (फ़ार्मूले) की खोज भूतपूर्व सोवियत संघ के समय में हुई थी. इसलिए बड़ी सहजता से मान लिया गया कि केवल रूसी ही उसे बनाना जानते हैं, इसलिए वह आज भी रूस में ही बनता होगा. लेकिन इस बारे में ब्रिटेन ने कभी कोई पुख्ता प्रमाण नहीं दिए. सिर्फ रूस पर बार-बार आरोप दोहराए जाते रहे. तथ्यों की पड़ताल के बजाय ब्रिटेन और उसकी हां में हां मिलाने वाले अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे 25 पश्चिमी देशों तथा नाटो ने भी, अपने यहां कार्यरत 150 रूसी राजनयिकों को निष्कासित कर दियाा. बदले में रूस ने भी इन देशों के इतने ही राजनयिकों को चले जाने के लिए कहा.

सेर्गेई स्क्रीपाल की पुत्री यूलिया, रासायनिक विष का शिकार बनने से एक ही दिन पहले, उनके साथ कुछ दिन बिताने के लिए मॉस्को से साल्सबरी आयी थी. ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस यूलिया को जिस गुप्त स्थान पर रखे हुए है, वहां उसने ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स को एक वीडियो संदेश दिया है. 23 मई को सार्वजनिक किये गये इस संदेश में उसने कहा, ‘हम बेहद प्रसन्न हैं. मैं इस हमले के बाद भी जीवित हूं. मुझे आशा है कि देर-सवेर मैं अपने देश (रूस) वापस लौट जाऊंगी.’ लेकिन यूूलिया ने ब्रिटेन के रूसी दूतावास की ओर से सहायता की पेशक़श को धन्यवाद-सहित ठुकरा दिया. प्रेक्षकों का मानना है कि यूलिया ऐसा इसलिए कह रही है क्योंकि ब्रिटिश पुलिस ने उसे यही पट्टी पढ़ाई है.

ब्रिटेन और उसके साथी सकते में आये

स्क्रीपाल पिता-पुत्री के ठीक हो कर अस्पताल से छुट्टी पा जाने के बाद ब्रिटेन और उसके साथी देश सकते में आ गये हैं. इस बीच कुछ ऐसे नये तथ्य सामने आये हैं, जिन से पता चलता है कि रूस के अलावा कम से कम छह ऐसे और देश भी हैं, जो ‘नोविचोक’ वर्ग के रासायनिक विष बनाने का गुर जानते हैं. रूस ने भी इसके बाद तेवर तीखे किए हैं. जर्मनी में रूस के राजदूत ने 27 मई को कहा, ‘ब्रिटेन को चाहिये कि वह स्वीकार करे कि यह (प्रकरण) एक बहुत बड़ी ग़लती या बहुत बड़ा झूठ था... और कहे कि रूसियों, क्षमा करना, हम से बहुत बड़ी ग़लती हो गयी.’

उधर, 24 मई को, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तो इस बात को ही संदेहास्पद बताया कि चार मार्च के दिन साल्सबरी में जो कुछ हुआ, वह सचमुच किसी प्राणघातक रासायनिक विष का हमला था. उनका कहना था कि यदि वह पदार्थ रासायनिक विष रहा होता, तो उससे पीड़ित लोग देखते ही देखते चल बसे होते. लेकिन स्क्रीपाल पिता-पुत्री का ठीक हो जाना और इस बीच अस्पताल से छुट्टी भी पा जाना उस सब पर प्रश्नचिन्ह लगाता है जो ब्रिटिश सरकार कहती रही है. पुतिन ने इस मामले में रूस और ब्रिटेन की संयुक्त जांच की मांग भी दोहराई, लेकिन ब्रिटेन ने हमेशा की तरह इससे इन्कार कर दिया.

अगर जहर सिर्फ रूस के पास तो ब्रिटिश लैब ने कैसे पहचान की?

साल्सबरी के पास ही ब्रिटेन की एक विशेष सैन्य प्रयोगशाला है - ‘पोर्टन डाउन’. ब्रिटेन बड़े गर्व से कहता रहा है कि इस प्रयोगशाला ने स्क्रीपाल पिता-पुत्री को मारने के लिए प्रयुक्त विष को, कुछ ही दिनों के भीतर ‘नोविचोक’ वर्ग के एक ऐसे रासायनिक विष के तौर पर पहचान लिया जो वास्तव में एक विश्वव्यापी प्रतिबंधित रासायनिक हथियार है. ब्रिटेन का दावा है राष्ट्रपति पुतिन की सरकार अभी पिछले दशक तक गुप्त रूप से उसका निर्माण करती रही है. ब्रिटेन के इन दावों पर शक करने वाले पूछते रहे हैं कि यह विष यदि केवल रूस के ही पास है, तो ‘पोर्टन डाउन’ प्रयोगशाला ने इसका कोई नमूना हुए बिना इतना जल्दी उसे पहचान कैसे लिया. जाहिर है कि इस मामले में काफी कुछ छिपाया जा रहा है.

जर्मनी के पास 1990 में ही फार्मूला था

जर्मनी के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण नेटवर्क ‘एआरडी’, ‘एनडीआर’ टेलीविज़न और ‘ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ और ‘दी त्साइट’ नाम के अख़बारों की एक मिली-जुली टीम ने खोज निकाला है कि जर्मनी को 1990 वाले दशक में ही ‘नोविचोक’ बनाने का गोपनीय फ़ॉर्मूला मिल गया था. मई के मध्य में प्रकाशित उनकी रिपोर्टों से पता चलता है कि जर्मनी के चांसलर कार्यालय और रक्षा मंत्रालय की जानकारी मेें उसकी वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ 1990 वाले दशक में एक अत्यंत गोपनीय अभियान चला रही थी. इस अभियान के अंतर्गत ‘बीएनडी’ 1990 के आरंभ से ही एक ऐसे रूसी वैज्ञानिक के संपर्क में थी, जो ‘नोविचोक’ के बनाने के तरीके से जुड़ा हुुआ था. इस रूसी वैज्ञानिक ने 1990 के मध्य में ‘बीएनडी’ को ‘नोविचोक’ वर्ग की नयी क़िस्म का एक नमूना इस शर्त पर देने की पेशक़श की कि उसे और उसके परिवार को पूरी तरह सुरक्षित जीवन बिताने की सुविधा मिलेगी.

इसकी ठोस वजह भी थी. दिसंबर 1991 में भूतपूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में भारी अफ़रातफ़री मची हुई थी. उससे तंग आकर वहां के बहुत से वैज्ञानिक और इंजीनियर अपनी गोपनीय जानकारियां बेच कर पैसा कमाने या किसी दूसरे देश में जा कर बस जाने के उपक्रम करने लगे थे. पश्चिमी देशों की गुप्तचर सेवाओं के लिए भी यह सुनहरा मौका था. जर्मन गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के एजेंट जिस रूसी वैज्ञानिक के संपर्क में थे वह अपनी पत्नी के साथ चोरी-छिपे ‘नोविचोक’ की नयी क़िस्म का एक नमूना जर्मनी ले आया.

सभी झूठ बोल रहे हैं

जर्मन गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ को ढाई दशक पहले मिले ‘नोविचोक’ के इस नमूने की कहानी से साफ है कि रूस का यह कहना झूठ था कि उसने रासायनिक अस्त्र बनाने वाले अपने संयंत्र बंद कर दिये हैं. वहीं जर्मनी सहित अन्य पश्चिमी देशों का यह दावा भी झूठा है कि उनके पास ‘नोविचोक’ बनाने का फ़ॉर्मूला नहीं है.

ढाई दशक पहले जब जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा को ‘नोविचोक’ का नमूना मिला था तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नहीं, बोरिस येल्त्सिन थे. उस समय के जर्मन चांसलर हेल्मूट कोल ने तय किया कि रूस में ‘नोविचोक’ के उत्पादन के बारे में मिली जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जायेगा क्योंकि ऐसा करने से येल्त्सिन नाराज़ हो जायेंगे. मॉस्को में एक बैठक के समय रूस को दबी ज़बान में केवल यह बता दिया गया कि ‘नोविचोक’ जैसे रासायनिक अस्त्रों वाली बात अब गोपनीय नहीं रही.

चांसलर कोल के कहने पर ‘बीएनडी’ ने ब्रिटेन और अमेरिका की गुप्तचर सेवाओं को भी ‘नोविचोक’ के बारे में सूचित किया. इस सूचना के बाद अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो के कुछ देशों में उससे बचाव के साधनों और मापन-यंत्रों तथा उसके निराकरण की दवाएं बनाने के उद्देश्य से सीमित मात्रा में उसे बनाया भी गया. इससे सिद्ध हो जाता है कि कि ब्रिटेन और अमेरिका ही नहीं, कुछ दूसरे नाटो देशों के पास भी ‘नोविचोक’ बनाने का फ़ार्मूला है. अगर वे 1990 में यह घातक रसायन बना सकते थे तो अाज क्यों नहीं ?

घर का अादर्शवादी भेदी

इस खोज से जुड़े जर्मन पत्रकारों का कहना है कि जिस रूसी वैज्ञानिक ने जर्मनी की गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ को ‘नोविचोक’ की नयी क़िस्म का नमूना दिया था, उसे कई वर्षों तक जर्मनी से हर प्रकार की सुरक्षा मिली. वह एक आदर्शवादी था, उसने पैसा कभी नहीं मांगा. इससे यही संकेत मिलता है कि वह रूसी वैज्ञानिक शायद जर्मनी में ही रहता था और यदि अब भी जीवित है, तो हो सकता है कि अब भी जर्मनी में ही या कहीं और रह रहा है. उसका नाम अब भी गुमनाम है.

यह भी माना जा सकता है कि जिस तरह इस रूसी वैज्ञानिक ने जर्मन गुप्तचर सेवा को ‘नोविचोक’ का नमूना दिया, उसी तरह किन्हीं दूसरे रूसी वैज्ञानिकों ने धन या सुरक्षा पाने की लालच से अन्य देशों को भी उसके नमूने या फ़ॉर्मूले दिये होंगे. जर्मन मीडिया में कहा जा रहा है कि पश्चिमी जगत में रूस और जर्मनी के अतिरिक्त कम से कम पांच और देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड और कनाडा) के पास ‘नोविचोक’ बनाने का रासायनिक सूत्र और क्षमता है. यह कोई नहीं जानता कि रूस से पहले के सोवियत संघ वाले किन्हीं गणतंत्रों के पास भी ‘नोविचोक’ का फ़ार्मूला और उसे बनाने की क्षमता है या नहीं.

जर्मन सरकार भी सवालों केे घेरे में

जर्मन पत्रकारों की इस सनसनीखेज़ खोज के बाद जर्मन सरकार के उस आंखमूंद समर्थन की आलोचना होने लगी है जो स्क्रीपाल-प्रकरण में वह शुरू से ही ब्रिटेन को दे रही है. यहां तक कि सत्तारूढ़ महागठबंधन में शामिल सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) भी जर्मन पत्रकारों की खोज के बाद अपने आप को असहज महसूस कर रही है. ‘एसपीडी’ के संसदीय दल के गृहनीति प्रवक्ता बुर्कहार्ड लिश्का ने 17 मई को एक जर्मन दैनिक से कहा, ‘इस खोज से यह तर्क हिलने लगा है कि केवल रूसी ही नोविचोक का ऐसा हमला कर सकते थे. उचित यही है कि सावधानीपूर्वक इस सारे प्रकारण की तह में जाया जाये, न कि आनन-फ़ानन में किसी को दोषी ठहराया जाये.’

दूसरी संभावनाएं

जर्मनी की वामपंथी पार्टी ‘दी लिंके’ के संसदीय दल के उपाध्यक्ष आन्द्रे हान ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘जर्मन सरकार का यह कहना कि (रूस के सिवाय) कोई दूसरा समझ में आने वाला कारण हो ही नहीं सकता, अब नहीं चलेगा. एक दूसरी व्याख्या भी अब विश्वसनीय लगने लगी है.’

वैसे, दूसरी एक नहीं, कई व्याख्याएं हो सकती हैं. हो सकता है कि रूस की सरकार के बदले वहां का कोई अपराधी गिरोह या कोई व्यक्ति, जो कहीं से ‘नोविचोक’ की थोड़ी-सी मात्रा प्राप्त करने की युक्ति जानता रहा हो, सेर्गेई स्क्रीपाल से किसी बात का बदला लेना चाहता रहा हो. 1995 में एक ऐसा हत्याकांड हो चुका है जिसमें रूस की एक प्रयोगशाला से चुरा कर बेचे गये ‘नोविचोक’ से, वहां के अपराधियों के एक गिरोह ने, इवान किवेलेदी नाम के एक बैंकर और उसके सचिव को मार डाला था.

ब्रिटेन में बसे रूसियों के बीच भी ऐसी कई रहस्मय मौतें हो चुकी हैं, जिनका भेद आज तक नहीं खुल सका है. ‘पोर्टन डाउन’ ब्रिटेन की एक बहुत ही उच्चकोटि की प्रयोगशाला है. उसके निदेशक इस बात से इन्कार नहीं करते कि इस प्रयोगशाला के पास भी ‘नोविचोक’ है. लेकिन वे कहते हैं कि ऐसी चीज़ें उनकी प्रयोगशाला से बाहर नहीं जा सकतीं. इसी कारण ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि साल्सबरी वाला विष संभवतः ब्रिटेन में ही या उसके किसी पश्चिमी मित्र देश में बना था, इसीलिए प्रयोगशाला स्रोत का नाम नहीं बताती.

रूस की राहत पश्चिमी देशों की सांसत बनी

साल्सबरी विषकांड को पश्चिमी देशों की सरकारों ने एकजुट होकर रूस पर जिस तरह हमला बोला था उससे यह शक होना स्वाभाविक ही था यहां दाल में कुछ काला है. जर्मन पत्रकारों की सनसनीखेज़ खोज रूस के लिए राहत की सांस और पश्चिमी देशों के नेताओं के लिए सांसत भले ही बन कर आयी है, रूस को अभी पूरी तरह से बरी नहीं माना जा सकता. इसका कारण है रूस के ही एक रसायनशास्त्री व्लादिमीर उग्लेव के साथ बातचीत पर आधारित एक टेलीविज़न कार्यक्रम, जिसे 29 अपैल को बुल्गारिया के ‘बी टीवी’ चैनल पर दिखाया गया.

71 वर्षीय उग्लेव काला सागर किनारे बसे रूस के अनापा शहर में रहते हैं. इस कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि जैसे ही उन्हें पता चला ब्रिटेन के साल्सबरी नगर में एक भूतपूर्व रूसी जासूस को मारने के लिए रासायनिक विष का हमला हुआ है, उन्हें लगने लगा कि ‘बहुत संभव है कि यह विष मेरे ही हाथ से बना है.’ कुछ ही दिनों के भीतर राह चलते समय एक कार ने उग्लेव को टक्कर मार कर घायल कर दिया. अब वे ठीक हैं, पर यह नहीं कहते कि रूस की सरकार या किसी गुप्तचर सेवा के इशारे पर ऐसा हुआ, बल्कि यही मानते हैं कि वह एक दुर्घटना थी. दूसरी ओर, यह कहना भी उन्होंने बंद नहीं किया है कि ‘यदि मुझसे पूछा जाये कि पिता-पुत्री पर हुए हमले वाला विष किसने बनाया है, उसका नाम और देश क्या है, तो मैं कहूंगा कि वह संभवतः मेरे ही हाथों से बना था.’

उग्लेव इस टेलीविज़न कार्यक्रम में अपनी बात पर डटे रहे कि साल्सबरी में प्रयुक्त विष उसी प्रयोगशाला में बना होना चाहिये, जहां वे काम करते थे. उन्होंने कहा कि ‘मैं वर्णक्रम-मापी (स्पेक्ट्रोमीटर) के मापन, फ्लोरीन की मात्रा, परमाणुभार और उन दूसरे आंकड़ों के आधार पर ऐसा कह रहा हूं, जो हाल ही में मेरे पास भेजे गये हैं.’ व्लादिमीर उग्लेव का अनुमान है कि स्क्रीपाल पिता-पुत्री इसलिए जीवित रह गये क्योंकि इस विष की मात्रा बहुत कम थी और हो सकता है कि उन्होने मोटे कपड़े पहन रखे हों. वैसे भी इस विष को ‘’लिपस्टिक वाले ट्यूब के आकार जितनी बड़ी या गोंद के किसी छोटे-से ट्यूब जैसी चीज़ में रख कर कहीं ले जाया जाता है. जिस किसी ने उसे स्क्रीपाल के दरवाज़े की मूठ पर लगाया होगा, उसने अपने बचाव के लिए फेंक देने लायक दस्ताने पहन रखे रहे होंगे और कुछ समय के लिए अपनी सांस रोक रखी होगी.’’

जो भी हो, अब यह बात साफ़ हो गयी है कि ‘नोविचोक’ शुरुआत में लड़ाई के लिए बना एक ऐसा अत्यंत प्राणघातक रासायनिक विष है जो अब जासूसी लड़ाई में इस्तमाल होने लगा है. रूस से लेकर अमेरिका तक वे सभी धनी लोकतांत्रिक देश झूठ बोल रहे हैं, जो रासायनिक अस्त्र निषेध संधियों की दुहाई दे कर अपने पास नोविचोक’ होने से इनकार करते हैं.