इस संग्रह की एक नज़्म ‘इश्तेहारों का शहर है शायद’ :

इश्तेहारों का शहर है शायद / इसमें सिर्फ़ इश्तेहार रहते हैं! / आसमां में टंगे गु़ब्बारों पर, साहिलों पर भी, टीलों पे, पानी में / जगमगाती दराज़ सड़कों पर / खम्बों पर और बस के अड्डों पर / बस की टिकटों पे, और कारों में / हर जगह इश्तेहार चिपके हैं! / जींस पर और कमीज़ों पर, सीने पर और पुश्त के ऊपर / प्लेटों पे और गिलासों पर / आंख पर, होठों और गालों पे / सब जगह इश्तेहार चिपके हैं! / देखो उस आदमी ने मुंह खोला / जीभ नंगी है, गोंद से आओ / उस पे भी इश्तेहार चिपका दें!’


नज़्म संग्रह : पाजी नज़्में

लेखक : गुलज़ार

प्रकाशक : राधाकृष्ण

कीमत : 125 रुपये


नज़्में और गज़लें अक्सर ही अपने श्रोताओं और पाठकों को एक उनींदी और अलसाई-सी रूमानी दुनिया में पहुंचा देती हैं. यहां से सिर्फ यादों की फिसलनभरी घाटी में उतरने का ही काम हो सकता है, लेकिन गुलज़ार की ये नज़्में हमें सिर्फ रूमानी जादू से ही नहीं बल्कि कई अलग तरह के अहसासों से भी भरती हैं. गुलज़ार का यह नज़्म संग्रह बड़ी ही नफासत से पाठकों को अपने साथ बिल्कुल ही जुदा किस्म के रास्तों पर हाथ थामे काफी दूर तलक ले जाता है.

भगवान, खुदा या गॉड से इंसानों का रिश्ता अक्सर ही डर का है. उसके दरबार में अदब से पेश आना और सजदे में झुके रहना ही इबादत का शऊर माना जाता है. लेकिन यहां गुलज़ार का खुदा को याद करने का तरीका निहायत ही मुख्तलिफ है. आम इंसान की नज़र में वे पूरी बेअदबी से खुदा के साथ पेश आते हैं और हद ये कि उससे कुछ याराना किस्म के लहज़े में बात करने की खूबसूरत खता करते हैं. इसी मिजाज़ की एक नज़्म है ‘मैं जितनी भी ज़बानें बोल सकता हूं’. यहां गुलज़ार खुदा को सीधे-सीधे अनपढ़ कहते हैं! वे लिखते हैं -

‘मैं जितनी भी ज़बानें बोल सकता हूं / वो सारी आज़माई हैं.../ ‘खुदा’ ने एक भी समझी नहीं अब तक / न वो गर्दन हिलाता है, न वो हंकारा ही देता है! / कुछ ऐसा सोचकर / शायद फ़रिश्तों ही से पढ़वा ले / कभी मैं चांद की तख़्ती पे लिख देता हूं, कोई शेर ‘ग़ालिब’ का / तो धो देता है या उसको कुतर के फांक जाता है / पढ़ा-लिखा अगर होता खु़दा अपना.../ न होती गुफ़्तगू तो कम से कम, चिट्ठी का आना-जाना तो रहता!’

या फिर एक दूसरी जगह वे खुदा को सिर्फ इतना भर भाव देते हैं जितना किसी निठल्ले आदमी को दिया है...और फिर कुछ इस अंदाज में अपने पास बुलाते हैं, मानो कह रहें हों, ‘यदि खाली हो तो चले आना!’ एक बानगी -

‘इस हस्पताल में / सब कुछ है, और माहिरे-फ़न डॉक्टर भी हैं / सांसें मशीन के ज़रिये चलती रहती हैं / और बोतलों में भर के ख़ून मिलता रहता है / ‘लीवर’ भी ठीक दामों पर मुहैया होता है / आंखें बदलने के लिए, आंखों के बैंक हैं / मैं ‘हार्ट बाईपास’ कर रहा हूं ऐ खु़दा / डॉक्टर नीतिन एक्सपर्ट है.../ ऐसी शदीद तेरी ज़रूरत नहीं मगर / गर वक़्त हो, तो आना, पास बैठ / कोई बात करेंगे’.

गुलज़ार की नज़्मों, गज़लों, कविताओं या त्रिवेणी में इश्क कुछ इस तरह से दाखिल होता है कि पढ़ते हुए भीतर कहीं गहरे कुछ हरकत सी होती है. वे सीधे-सीधे ‘आई लव यू’ या ‘मुझे तुमसे प्यार है’ कहने में यकीन नहीं रखते. वे प्रेम को घूंट-घूट पीते हैं, कुछ चाय या कॉफी की सी माफिक. इतनी सहजता से प्रेम का इज़हार करते हैं मानो कोई हाथ छू के तो निकला हो जानबूझकर, लेकिन मुस्कुराकर इस मासूम गलती के लिए माफी भी मांगे और फिर चोरी से सामने वाले के चेहरे की प्रतिक्रिया भी देख ले. इसी अंदाज की एक नज़्म है ‘मुझको इतने से काम पे रख लो’.

‘मुझको इतने से काम पे रख लो / जब भी सीने में झूलता लॉकेट / उलटा हो जाए तो मैं हाथों से / सीधा करता रहूं उसको / जब भी आवेजा (कान का कुंडल) उलझे बालों में / मुस्कुरा के बस इतना सा कह दो / ‘आह’ चुभता है यह, अलग कर दो / जग ग़रारे में पांव फंस जाए / या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके / इक नज़र देख लो तो काफ़ी है / ‘प्लीज’ कह दो तो अच्छा है / लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है / मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा / मुझ को इतने से काम पे रख लो!’.

वक्त की रफ्तार स्थिर रहते हुए भी वह हर किसी के लिए अलग-अलग गति से चलता है. किसी के लिए वक्त की रफ्तार बहुत तेज है, तो कहीं वो ठहर सा जाता है. कहीं वक्त काटना मुश्किल है, तो कहीं उड़ते हुए लम्हों को कैद करने की कवायद चलती है. लेकिन इस सबके बीच गुलज़ार का वक्त को देखने का नजरियां इतना अलग है कि क्या ही कहा जाए. वे वक्त का ‘वस्तुकरण’ करते हैं, मानो वक्त न हुआ कोई फल या सब्जी है जिसे मनचाहे तरीके से, मनचाहे आकार में काटा जा सकता है! वे लिखते हैं -

‘वक़्त काटना क्या मुश्किल है? / एक घंटे को आधा-आधा कर के दो हिस्सों में काट लो पहले / उसको फिर से आधा कर लो तो... / पन्द्रह मिनट हैं! / पन्द्रह मिनट को तीन हिस्सों में काटो / पांच मिनट के तीन हिस्से बचते हैं.../ पांच को काटो तो तीन और दो / दो के फिर दो.../ एक बचेगा!.../ दो घंटे से लेट है फ़्लाइट / एयरपोर्ट पर बैठा वक़्त को काट रहा हूं!’

ये नज़्में आपको एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती हैं. यहां दीवानगी है, बेवजह मुस्कुराने की वजहें हैं, हंसी-ठिठोली है, कुछ देर को आंख मूंद के खो जाने की लालसा है, तड़प के रह जाने की कसक है और बस बिनबात के गिले-शिकवों पर खुद अपना ही कोर्टमार्शल है. इन नज़्मों में गुस्सा भी है तो अपने आसपास के लोगों के मामूलीपन पर कोफ़्त भी है. कहीं ये नज़्में इर्द-गिर्द के लोगों की क्षुद्रता पर चिकोटी काटकर मुस्कराती हैं तो कहीं हल्का सा तंज करके उनकी ओढ़ी हुई ऊंचाई को छोटा कर देती हैं.

इन नज़्मों को पाजी कहने की वजह खुद गुलज़ार के ही शब्दों में ‘पाजी इसलिए कि अक्सर गुद्दी पर धप् पड़ती हैं और ‘धत् पाजी’ की आवाज़ आती है. हालांकि मज़ा लो तो इतनी पाज़ी भी नहीं हैं!’ तो मज़ा लीजिए पकी निबोली सी इन नज़्मों का.