‘डोनाल्ड ट्रंप जैसे दोस्त के होते हुए हमें किसी दुश्मन की क्या जरूरत’. पिछले दिनों अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी संगठन यूरोपीय संघ के अध्यक्ष डोनाल्ड टेस्क का यह बयान पूरी दुनिया में छाया रहा. टेस्क का कहना था कि यूरोप को ट्रंप का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने अब यह पूरी तरह साफ़ कर दिया है कि अगर यूरोप को मदद करने वाले हाथ की जरूरत है तो वह आपके बाजू में ही मौजूद है.’ यहां ‘बाजू वाले हाथ से उनका मतलब रूस से था.

इस बयान के बाद कई लोग कयास लगा रहे थे कि अब यूरोप रूस के करीब जा सकता है. अटकलें सही साबित हुईं और इस बयान के कुछ ही घंटों बाद रूस के शहर सोची में जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस की. इसमें मेर्कल ने कहा, ‘अब दोनों देश समस्याओं को हल करना चाहते हैं, कई मुद्दों पर हम सहमत हैं और जिन पर नहीं हैं उन पर बातचीत कर रहे हैं.’

इसके चार दिन बाद ही मास्को में रूस द्वारा आयोजित की गई एक इकॉनॉमिक फोरम में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पहुंचे. इसमें मैक्रों ने दुनिया को चौंकाते हुए रूस को यूरोप का कभी न अलग होने वाला हिस्सा बताया. उन्होंने पुतिन से कहा, ‘अब वह समय आ गया है जब हमें साथ बैठ कर चीजों को सुलझाना चाहिए.’ इस दौरान 20 से ज्यादा उद्योगपतियों को साथ लेकर गए मैक्रों ने रूस के साथ कई व्यापारिक समझौते भी किए.

रूसी शहर सोची में जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल का स्वागत करते राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन | फोटो : एएफपी
रूसी शहर सोची में जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल का स्वागत करते राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन | फोटो : एएफपी

इस सब में हैरान करने वाली बात यह थी कि यह सब तब देखने को मिला जब हाल ही में एक पूर्व रूसी जासूस को ब्रिटेन में जहर देने के मामले के चलते रूस और यूरोप के संबंध बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं. इस मामले में जर्मनी और फ़्रांस सहित यूरोप के दो दर्जन से ज्यादा देशों ने 100 से ज्यादा रूसी राजनयिकों को अपने देश से निकाल दिया था. तनातनी इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि रूस और यूरोप के रिश्तों की तुलना शीत युद्ध के समय से की जाने लगी थी.

लेकिन, इसके एक महीने बाद ही ऐसी परिस्थितियां बन गईं जिन्होंने यूरोपीय देशों को रूस के करीब जाने के लिए मजबूर कर दिया. दरअसल, इसी महीने की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग करने के फैसले ने यूरोप को बड़ी मुश्किल में डाल दिया. 2015 में ईरान से परमाणु समझौता होने के बाद यूरोपीय देशों ने ईरान में अरबों डॉलर का निवेश किया है लेकिन ट्रंप के फैसले के बाद यह डूबता नजर आ रहा है. अमेरिका ने साफ़ कर दिया है जो भी कंपनी ईरान में व्यवसाय करेगी उसे प्रतिबंधित कर दिया जाएगा. ऐसे में ईरान डील को बचाने और इस संकट का रास्ता खोजने के लिए यूरोपीय देश इस डील के दूसरे प्रमुख सदस्य रूस के पास पहुंचे हैं. दूसरी तरफ, क्रीमिया मामले के बाद से तमाम तरह के प्रतिबंध झेल रहे रूस को भी यूरोप की कम जरूरत नहीं है.

हालांकि, कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि यूरोप के अपने कट्टर विरोधी रूस के पाले में जाने की वजह डोनाल्ड ट्रंप के अन्य फैसले भी हैं. इनमें पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के अलग होने के साथ-साथ यूरोप से आने वाले स्टील और एल्युमीनियम पर शुल्क लगाने का फैसला भी एक कारण है.

बात कितनी दूर तक जाएगी?

इस मामले पर नजर रखने वाले अधिकांश जानकारों की मानें तो अभी यह कहना, कि यूरोप या उसके कई बड़े देश पूरी तरह से रूस के पाले में जाना चाहते हैं, या उससे संबंध बहुत अच्छे बनाने के इच्छुक हैं, जल्दबाजी होगा. वरिष्ठ रूसी पत्रकार रोमन डोब्रोकोटोव इसके पीछे कई वजह भी बताते हैं.

डोब्रोकोटोव मध्य पूर्व से छपने वाले एक अखबार से बातचीत में कहते हैं कि इमैनुएल मैक्रों और अंगेला मेर्कल की हाल में पुतिन से हुई मुलाकात पर गौर करने की जरूरत है. उनका कहना है, ‘रूस में मैक्रों के भाषण से निश्चित ही यह लगता है कि वे रूस के साथ रिश्तों में गर्माहट लाना चाहते हैं और उसके साथ व्यापारिक रिश्ते बनाने के लिए आतुर हैं. लेकिन, गौर करने वाली बात यह है कि अपने दो दिन के इस रूस दौरे के दौरान वे उन मुद्दों पर बिलकुल चुप्पी साधे रहे जो यूरोप और रूस के बीच बनी खाई की सबसे बड़ी वजह हैं.’

फ्रांस के राष्ट्रपति ने क्रीमिया विवाद, पूर्व रूसी जासूस को जहर देने और सीरिया में रासायनिक हमलों जैसे मुद्दों पर कोई भी बयान नहीं दिया. साथ ही 2014 में यूक्रेन में दुर्घटना ग्रस्त हुए मलेशिया के यात्री विमान एमएच-17 मामले पर भी वे बोलने से बचते रहे. इस विमान हादसे की जांच कर रहे ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम और नीदरलैंड में से ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड ने कहा है कि उनकी जांच में पाया गया है कि मलेशियाई विमान रूसी सेना की 53वीं बिग्रेड ने राकेट के जरिये गिराया था. इस हादसे में सभी 298 यात्री मारे गए थे. इमैनुएल मैक्रों इस मामले में तब भी कुछ नहीं बोले जब व्लादिमीर पुतिन ने एक सवाल के जवाब में कहा कि इस हादसे में रूस की भूमिका नहीं है.

कुछ ऐसा ही रुख अंगेला मेर्कल का भी दिखा जब उन्होंने 18 मई को सोची में पुतिन से मुलाकात की. पिछले कुछ महीनों तक कई मुद्दों खासकर मानवाधिकारों और सीरिया मामले पर पुतिन को रह-रहकर कोसने वाली जर्मन चांसलर इस मुलाकात के दौरान बिलकुल शांत रहीं.

यूरोप मामलों के विशेषज्ञों की मानें तो जिन मुद्दों पर इन नेताओं ने चुप्पी साध रखी है या जिन पर बोलना बंद कर दिया है वे इतने बड़े मुद्दे हैं कि उन पर बात किए बिना रूस और यूरोप के बीच कुछ भी ठीक होने की उम्मीद नहीं की जा सकती. साथ ही ये मुद्दे ऐसे भी हैं जिन पर सभी यूरोपीय देशों की रजामंदी जरूरी है. जानकारों की मानें तो मैक्रों और मेर्कल, दोनों जानते हैं कि इन मामलों में सभी को एकमत करना नामुमकिन है क्योंकि पूर्वी यूरोप के कई देश ऐसे हैं जो पुतिन के कट्टर विरोधी हैं. साथ ही उन देशों पर ईरान डील टूटने जैसे मामलों का भी असर नहीं पड़ने वाला है. इसलिए ये कभी भी अमेरिका को छोड़कर रूस के साथ नहीं जाने वाले. उधर, ब्रिटेन भी पूर्व रूसी जासूस को जहर देने के मामले में अमेरिका के साथ खड़ा है.

पूर्व रूसी जासूस को ब्रिटेन में जहर देने के मामले में ब्रिटेन और अमेरिका साथ खड़े हैं
पूर्व रूसी जासूस को ब्रिटेन में जहर देने के मामले में ब्रिटेन और अमेरिका साथ खड़े हैं

यूरोप के कुछ पत्रकार यह भी बताते हैं कि इन सभी परिस्थितियों के चलते फ्रांस और जर्मनी रूस के पाले में जाने के बजाय केवल अपने छोटे-छोटे हित साधने के लिए उसके पास पहुंचे हैं. अमेरिका के ईरान डील से हटने के बाद इन्हें डर है कि ईरान भी न कहीं यह डील तोड़ दे. वह कई बार ऐसी धमकी भी दे चुका है. फ्रांस और जर्मनी सहित जिन देशों ने ईरान में बड़ा निवेश कर रखा है वे जानते हैं कि ईरान को ऐसा करने से केवल रूस ही रोक सकता है. इन देशों का अगला लक्ष्य रूस के जरिये सीरिया में शांति स्थापित करवाना भी है जिससे उन शरणार्थियों को वापस सीरिया भेजा सके जो अपने देश जाने को इच्छुक हैं. इसके अलावा जर्मनी काफी समय से रुकी उस गैस पाइप लाइन प्रोजेक्ट को भी शुरू करने की कोशिश में है, जो रूस से जर्मनी आनी है.

कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि यूरोपीय देश पूरी तरह से रूस के पाले में इसलिए भी नहीं जा सकते क्योंकि वे जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के शासन में अमेरिका के जो फैसले उनकी परेशानी बढ़ा रहे हैं, वे स्थायी नहीं हैं. अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत न रहने या फिर दो साल बाद ट्रंप के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद चीजें अपने आप बदल जाएंगी और यूरोप-अमेरिका के रिश्ते फिर पटरी पर होंगे. इसी साल नवंबर में अमेरिका में मध्यवधि चुनाव हैं जिसके बाद संसद में रिपब्लिकन की जगह डेमोक्रेटिक पार्टी का वर्चस्व होने की संभावना भी जताई जा रही है.