मध्य प्रदेश समेत देश के कई किसान संगठन क़र्ज़माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू किए जाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. इस बार ये संगठन विधानसभा या लोकसभा का घेराव करने नहीं निकले हैं. उन्होंने नए तरीक़े के तहत अनाज, फल-सब्ज़ी और दूध की सप्लाई बंद कर दी है. इसके अलावा उन्होंने अलग-अलग दिवस (जैसे धिक्कार दिवस, असहयोग दिवस और आख़िरी दिन भारत बंद) मनाने का ऐलान किया है.

बीती एक जून से शुरू हुए इस आंदोलन ने मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को ज़्यादा परेशान किया हुआ है. इसकी वजह है पिछले साल मंदसौर में हुए किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसा. छह जून, 2017 को हुए आंदोलन में पुलिस की गोलीबारी में छह लोग मारे गए थे. इस घटना की पहली बरसी पर किसान संगठन इन सभी को श्रद्धांजलि दे रहे हैं. आज उन्होंने शहादत दिवस का आह्वान किया है.

लेकिन जब यह घटना हुई थी तब मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिये सवाल किया गया था कि क्या मारे गए किसान सचमुच किसान थे या किसानों की भीड़ में घुसे ‘कांग्रेसी गुंडे’ जो उपद्रव करते हुए पुलिस की गोली से मारे गए थे. यह जानने के लिए उस वक़्त की इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट देखने की ज़रूरत है. वैसे तो रिपोर्ट में मृतकों और उनके व्यवसाय को लेकर जानकारी दी गई थी लेकिन, सोशल मीडिया पर यह रिपोर्ट अलग तरह से पेश की गई. अख़बार की हेडिंग के आधार पर दावा कर दिया गया कि पुलिस की गोलीबारी में मारे गए छह व्यक्तियों के नाम खेती की कोई ज़मीन नहीं थी लिहाज़ा ‘वे किसान नहीं थे बल्कि कांग्रेसी गुंडे थे.’

जांच-पड़ताल करने पर पता चला कि सरकार के समर्थकों ने अख़बार की हेडिंग को पूरी ख़बर का लुब्ब-ए-लुबाब मान कर पोस्ट कर दिया था. हालांकि हेडिंग में कहीं नहीं लिखा था कि वे गुंडे थे. फिर भी भाजपा व सरकार समर्थकों ने दावा किया कि वे वही थे. यह भ्रामक जानकारी फैलाने में कई वजहों की भूमिका रही. जैसे अपनी विचारधारा के लोगों की बातों पर बिना सोचे-समझे यक़ीन करना, पूरी ख़बर न पढ़ना आदि. इन वजहों के चलते अभी तक प्रचार किया जा रहा है कि मंदसौर हिंसा में मारे गए लोग एक दल विशेष के कार्यकर्ता थे. लिहाज़ा यह जानना ज़रूरी है कि इन लोगों की कहानी क्या थी.

अभिषेक दिनेश पाटीदार

मंदसौर हिंसा में पुलिस की गोली से मारा गया अभिषेक दिनेश पाटीदार (19) 11वीं का छात्र था. उसे जीव विज्ञान में ख़ासी रुचि थी. वह खेती नहीं करता था लेकिन उसे ‘कांग्रेस गुंडा’ कहा जाना भी सही नहीं था. उसके पिता दिनेश 28 बीघा ज़मीन पर खेती करते थे, हालांकि वह ज़मीन उनके नाम नहीं हुई थी. बेटे के आंदोलन में शामिल होने को लेकर दिनेश का कहना था कि उनका बेटा केवल आंदोलन में नारे लगा रहा था. वह ख़ुद हिंसा में शामिल नहीं हुआ था.

पूनमचंद उर्फ बबलू जगदीश पाटीदार

पिछले साल हुई हिंसा में टकरावाड़ गांव के पूनमचंद (22) की भी मौत हो गई थी. वे बीएससी की पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन किसान पिता की मृत्यु के बाद उन्हें कॉलेज की पढ़ाई छोड़ कर अपनी अपनी सात बीघा ज़मीन की देखभाल रखनी पड़ी. हालांकि वह ज़मीन उनके नाम नहीं थी. लेकिन वे उस पर खेती करते थे.

पूनमचंद इस बात से परेशान थे कि वे अपनी सोयाबीन, लहसुन और गेहूं की पैदावार में लगी लागत भी नहीं निकाल पा रहे थे. सोशल मीडिया पर उन्हें भी कांग्रेसी गुंडा कहा गया था. लेकिन उनके रिश्तेदारों ने इससे इनकार किया था. उनका कहना था कि पूनमचंद को उस समय सीने पर गोली मारी गई जब वे पानी पी रहे थे. उनके मुताबिक़ वे और दूसरे किसान बातचीत कर रहे थे. तभी पुलिस का एक वाहन वहां से गुज़रा और पूनमचंद को गोली मार दी. पूनमचंद किसान होने के साथ अपने परिवार के एकमात्र पुरुष सदस्य भी थे. उनकी मृत्यु के बाद रिश्तेदारों का कहना था कि वे नहीं जानते उनकी ज़मीन की देखभाल अब कौन करेगा.

चैनराम गणपत पाटीदार

मंदसौर हिंसा में मारे गए चैनराम गणपत (23) सैनिक बनना चाहते थे. उस समय की रिपोर्ट के मुताबिक़ उनके पिता दो बीघा ज़मीन पर खेती करते थे. उन्होंने और परिवार के दूसरे सदस्यों ने बताया था कि चैनराम ने मऊ, भोपाल और ग्वालियर में लगे सेना के भर्ती कैंपों में हिस्सा में लिया था. हालांकि आंख की समस्या की वजह से वे पास नहीं हो पाए थे. परिवार ने बताया था कि एक समय उनके पास खेती के लिए काफ़ी बड़ी ज़मीन थी. लेकिन 1970 में एक बांध बनाने के लिए तत्कालीन सरकार ने ज़मीन का बड़ा हिस्सा उनसे ले लिया था. उनके मुताबिक़ इसके बदले उन्हें उचित मुआवज़ा भी नहीं मिला था जिसके चलते उन्हें काफ़ी मुश्किल वक़्त से गुज़रना पड़ा.

सत्यनारायण मांगीलाल धांगड़

लोध गांव के सत्यनारायण (30) भी मंदसौर हिंसा में मारे गए थे. वे दिहाड़ी मज़दूर थे. उनके परिवार के पास छह बीघा ज़मीन थी लेकिन उसका मालिकाना हक़ नहीं था. सत्यनारायण का कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं था. उनके भाई ने बताया था कि वे परिवार के एकमात्र सदस्य थे जो रोज़ मज़दूरी करके घर में पैसे देते थे. बाक़ी समय अपनी ज़मीन पर खेती करते थे. घटना के दिन उन्होंने अपने भाई से कहा था कि वे केवल रैली देखने जा रहे हैं. लेकिन जाने के बाद वे दोबारा नहीं लौटे.

कन्हैयालाल धुरीदार

चिल्लोड़ पिपलिया गांव के कन्हैयालाल (44) और उनके तीन भाइयों के पास तीन बीघा ज़मीन थी. उनकी मौत की ख़बर के बाद उनके पड़ोसी सुरेश चंद्र पाटीदार ने बताया था कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि पुलिस गोलीबारी कर देगी. सुरेश ने कहा था, ‘विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण था. इसलिए वे (कन्हैयालाल) बेख़ौफ़ थे. उन्हें विश्वास था कि पुलिस उन्हें कुछ नहीं करेगी. लेकिन उन्हें गोली मार दी गई.’

इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से साफ़ था कि सोशल मीडिया पर इन छह लोगों को लेकर किया गया दावा भ्रामक था. इनमें से सब किसान नहीं थे. लेकिन उनके सरकार विरोधी दल का कार्यकर्ता होने की बात भी सही नहीं थी. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं पर भीड़ को उकसाने के आरोप ज़रूर लगे थे. हिंसा को लेकर कांग्रेस की भूमिका पर सवाल करता एक वीडियो भी बतौर ‘सबूत’ कुछ मीडिया चैनलों पर दिखाया गया था. लेकिन बाद में पता चला कि वीडियो मंदसौर की घटना से पहले का था. वहीं पुलिस ने घटना के बाद कम से कम 60 लोगों को गिरफ़्तार किया था, लेकिन अधिकारियों का कहना था कि उनमें से एक भी कांग्रेस का कार्यकर्ता नहीं था.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ भाजपा और उसके समर्थक इस हिंसा को कांग्रेस पार्टी से इसलिए जोड़ रहे थे क्योंकि मारे गए लोगों में से अधिकतर पाटीदार समुदाय के थे. उस समय भाजपा गुजरात में पाटीदारों की नाराज़गी के चलते परेशान थी. वहीं, मंदसौर का किसान आंदोलन पाटीदार समुदाय के नेतृत्व में ही किया जा रहा था. यही बड़ी वजह रही कि एक तरफ़ मृतकों को कांग्रेसी गुंडा बताया जा रहा था और दूसरी तरफ़ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उन्हीं के परिवारों को एक करोड़ रुपये का मुआवज़ा दे रहे थे.

यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि किसान का मतलब खेती की ज़मीन का मालिक होना नहीं है. ऐसी कोई परिभाषा नहीं है जिसके मुताबिक़ कोई व्यक्ति तब किसान कहलाएगा जब उसके पास खेती की ज़मीन होगी. अगर ऐसा होता तो ‘भूमिहीन किसान’ जैसा कोई शब्द होता ही नहीं.