मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक जारी है. तीन दिन से चल रही इस बैठक के नतीजे आज सामने आएंगे. हाल में पेट्रोल-डीजल की ​कीमतों में हुई बढ़ोतरी के चलते ब्याज दरों के जल्द ही बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि इसकी टाइमिंग को लेकर अर्थशास्त्रियों की राय आपस में बंटी हुई है. एक ओर कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक जून से ही ब्याज दरें बढ़ा सकता है. वहीं कइयों की राय है कि ऐसा अगस्त से होने की संभावना है. मौद्रिक नीति समिति की ताजा बैठक की सबसे खास बात यह है कि पहली बार यह बैठक दो के बजाय तीन दिनों की हो रही है.

इससे पहले पिछले हफ्ते घोषित हुए वित्त वर्ष 2017-18 और जनवरी से मार्च की तिमाही की विकास दर के आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहे हैं. पिछले वित्त वर्ष में जहां 6.7 फीसदी का विकास हुआ है वहीं पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 7.4 फीसदी के अनुमान से कहीं ज्यादा 7.7 फीसदी रही है. ऐसे में माना जा रहा है कि ब्याज दरें बढ़ाए जाने से विकास के प्रभावित होने की आरबीआई की दुविधा अब लगभग खत्म हो गई है. इसलिए जानकारों की राय है कि बदले हालात में महंगाई घटाने के लिए आरबीआई आक्रामक फैसले ले सकता है.

उधर महंगाई के मोर्चे पर देखें तो अप्रैल में खुदरा महंगाई 0.30 फीसदी बढ़कर 4.58 फीसदी तक पहुंच गई है. वहीं खाद्य वस्तुओं और ईंधन को छोड़कर मापी जाने वाली कोर खुदरा महंगाई दर लगातार छह महीने तक बढ़ते हुए 5.9 फीसदी तक जा पहुंची है. यह पिछले चार साल में इसका सर्वोच्च स्तर है. इसके अलावा मई के मध्य से पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ने से सामानों की ढुलाई और परिवहन सेवाएं और महंगी हो गई हैं. खाने-पीने के उत्पादों के भी महंगे होने से अगले हफ्ते आने वाले मई के महंगाई आंकड़े भी पहले से बढ़ने की आशंका है. वहीं जून में भी किसानों की हड़ताल और बरसात के शुरू होने से फल-सब्जियों की आपूर्ति प्रभावित होने का अनुमान है.

जानकारों का कहना है कि डॉलर की तुलना में रुपये के लगातार कमजोर होने से भी आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बना है. अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में धीरे-धीरे ही सही पर वृद्धि करने से भी भारत की ब्याज दरों को बढ़ाए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं. इन सभी वजहों के चलते ज्यादातर अर्थशास्त्रियों की राय है कि मौद्रिक नीति समिति ब्याज दरें बढ़ाकर महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिश अब शुरू कर सकती है.

हालांकि ऐसे अर्थशास्त्रियों की संख्या ज्यादा है जिनका मानना है कि ब्याज दरों पर मौद्रिक नीति समिति का ‘तटस्थ’ रुख बदलकर ‘सख्त’ होने में अभी दो महीने का और वक्त लग सकता है. ऐसे लोग हालांकि यह मानते हैं कि कैलेंडर वर्ष 2018 में ब्याज दरें दो बार बढ़ सकती हैं लेकिन, ऐसा अगस्त से दिसंबर के बीच होने की संभावना है. इनका तर्क है कि अभी आने वाले हफ्तों में कच्चा तेल के सस्ता होने के आसार हैं. वहीं मानसून के भी इस साल सामान्य रहने की उम्मीद है जिससे दाल जैसे कई उत्पाद सस्ते हो सकते हैं.

मौद्रिक नीति समिति क्या निर्णय ले सकती है?

जानकारों के अनुसार सबसे ज्यादा जिस निर्णय की संभावना है वह यह कि मौद्रिक नीति समिति इस बैठक में ब्याज दरें तो न बढ़ाए लेकिन अपना रुख बदलकर ‘सख्त’ कर दे. इसका संकेत यही होगा कि निकट भविष्य में ब्याज दरें बढ़ाए जाने की संभावना बहुत ज्यादा होगी. दूसरी संभावना इस बात की है कि रुख भले ही ‘न्यूट्रल’ रहे लेकिन ब्याज दरें बढ़ा दी जाएं. तीसरी संभावना दरों के बढ़ाए जाने के साथ रुख के भी सख्त होने की बनती है. हालांकि जानकारों के अनुसार ऐसा होने की संभावना सबसे कम है.

आरबीआई गवर्नर की भूमिका निर्णायक होगी

बिजनेस दैनिक ‘मिंट’ ने अपने एक आलेख में मौद्रिक नीति समिति की ताजा बैठक में तय होने वाली नीति को ‘गवर्नर की नीति’ करार दिया है. अखबार का तर्क है कि मौजूदा आर्थिक माहौल में ब्याज दरें तय करने वाली छह सदस्यीय समिति अपने डेढ़ साल के इतिहास में अभी जितनी बंटी हुई कभी नहीं थी. रिपोर्ट का दावा है कि माइकल पात्रा, विरल आचार्य, चेतन घाटे जैसे सदस्य जहां दरों के बढ़ाने के समर्थक हैं तो रवींद्र ढोलकिया और पम्मी दुआ इसे घटाने या अभी रुकने के पक्षधर हैं. इसलिए अखबार के अनुसार ताजा हालात में आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई है. इसका मतलब यह हुआ कि यदि उर्जित पटेल भी ब्याज दरें बढ़ाने वाले कैंप में शामिल हो जाते हैं तो जून में दरों का बढ़ना तय है. वहीं आरबीआई मुखिया ने अभी यदि यथास्थिति बनाए रखने का समर्थन किया तो जून में ऐसा होने की संभावना खत्म हो जाएगी.