राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ (आरकेएमएस) के नेतृत्व में देश के 130 किसान संगठनों ने 10 जून तक ‘गांवबंदी’ का आह्वान किया. क़र्ज़माफ़ी और स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की मांग को लेकर किसानों ने दूसरे राज्यों में अनाज, फल-सब्ज़ी और दूध की आपूर्ति रोक दी. कई जगहों पर किसानों ने इन चीज़ों को ज़रूरतमंदों में बांटा. वहीं, रोज़मर्रा की ज़रूरत का यह सामान विरोधस्वरूप सड़कों पर फेंका भी जा रहा है. नतीजतन देश के कई राज्यों में दूध की कमोबेश किल्लत हो गई है और सब्ज़ियों के दाम भी बढ़ गए हैं. इससे सरकारों और किसानों के बीच तनाव भी बढ़ा है.

अभी तक के घटनाक्रम में किसी भी राज्य में कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं हुई है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी किसानों ने शांतिपूर्ण तरीक़े से सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है. यह वही जगह है जहां पिछले साल हुए किसान आंदोलन में पुलिस की गोलीबारी से छह लोगों की मौत हो गई थी. देश के जिन राज्यों के किसानों ने गांवबंदी का आह्वान किया है उनमें मध्य प्रदेश की सरकार विशेष रूप से परेशान है. एक जून से शुरू हुआ यह आंदोलन अभी तक तो शांत ही रहा है. लेकिन अब इसके खत्म होने में दो ही दिन बचे हैं और सरकारी रवैये और पुलिस की कार्रवाई से किसानों का ग़ुस्सा बढ़ा है. जानकारों का कहना है कि ऐसे में किसी अप्रिय घटना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

‘मीडिया में आना चाहते हैं किसान’

इस आंदोलन को लेकर किसान केंद्र सरकार के रवैये से भी ख़ासे नाराज़ हैं. उनका कहना है कि नरेंद्र मोदी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा कर प्रधानमंत्री बने थे लेकिन, अब यह उनके लिए कोई मुद्दा नहीं रह गया है. वहीं, कुछ दिन पहले केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के एक बयान ने उन्हें और नाराज़ करने का काम किया. किसान आंदोलन को लेकर किए गए सवाल पर सिंह ने कहा कि किसान मीडिया में आने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि मध्य प्रदेश के किसानों के लिए जितना काम शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने किया उतना किसी सरकार ने नहीं किया. हालांकि किसान संगठन इससे इनकार करते हैं. वहीं, बीते शनिवार को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि किसान बेवजह हड़ताल कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अपनी फ़सल न बेचने से उन्हें ही नुकसान होगा.

‘क़र्ज़माफ़ी असंभव है’

हाल के सालों में जो भी किसान आंदोलन हुए हैं उनमें क़र्ज़माफ़ी का मुद्दा प्रमुख रूप से शामिल रहा है. लेकिन इस बारे में किसान संगठनों और सरकार की सोच में क्या अंतर है, यह आरकेएमस के प्रवक्ता सुनील गौर और मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री गौली शंकर बिसेन के बयानों से साफ़ हो जाता है. सुनील गौर का कहना है कि क़र्ज़माफ़ी तो विकल्प है. किसानों की असल मांग यह है कि उन्हें 1972 से अब तक उनकी लागत का डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए. सत्याग्रह से बातचीत में सुनील गौर कहते हैं, ‘1972 के मंडी अधिनियम के मुताबिक़ कोई भी अनाज समर्थन मूल्य से कम क़ीमत पर नहीं बिकना चाहिए. अगर ऐसा होता है तो संबंधित व्यापारी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए. लेकिन 1972 से इन अधिनियम का उल्लंघन हो रहा है. अगर आज सरकार उस अंतर का भुगतान कर दे जो अधिनियम के उल्लंघन की वजह पैदा हुआ तो हमें क़र्ज़माफ़ी नहीं चाहिए. और अगर ऐसा नहीं है तो आपकी (सरकार) ग़लत नीतियों की वजह से किसानों पर जो क़र्ज़ हुआ है उसे माफ़ कर दीजिए.’

वहीं, किसानों की इस मांग को लेकर सरकार क्या सोचती है इसे मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री गौरी शंकर बिसेन के पिछले साल के एक बयान से समझा जा सकता है. जून 2017 में उन्होंने साफ़ कह दिया था कि किसानों का क़र्ज़ माफ़ करना असंभव है. गौरी शंकर बिसेन ने क़र्ज़माफ़ी की मांग को यह कहते हुए सीधे ख़ारिज कर दिया कि उनकी सरकार ने राज्य के किसानों को एक से शून्य प्रतिशत की ब्याज दर क़र्ज़ दिलवाया है. उन्होंने कहा था कि जब कोई ब्याज नहीं लिया जा रहा तो माफ़ करने का सवाल ही नहीं उठता. कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि वे किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने के पक्ष में न पहले थे और न अब हैं.

यह बात उल्लेखनीय है कि गौरी शंकर बिसेन का यह बयान मंदसौर हिंसा के बाद आया था. उस समय इस घटना से ग़ुस्साए किसानों को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बाक़ायदा उपवास करना पड़ रहा था. ऐसी स्थिति में भी कृषि मंत्री का ऐसा बयान देना बताता है किसानों की मांगें पूरी नहीं होने वालीं. अब इस अंसभावना के होते वे कब तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे यह देखने वाली बात है, क्योंकि आंदोलन के ख़िलाफ़ पुलिसिया कार्रवाई ने उनके ग़ुस्से को बढ़ा दिया है.

आंदोलन से दूर रहने को भरवाए जा रहे बॉन्ड

आंदोलन पर नज़र रखने वालों का कहना है कि सरकार, उसके विरोधियों, पुलिस और किसानों की गतिविधियों पर ग़ौर करने पर मंदसौर जैसी घटना दोबारा होने की संभावना दिखती ज़रूर है. ख़बरों के मुताबिक़ मध्य प्रदेश में पुलिस ने किसानों से बॉन्ड भरवाए हैं और कहा है कि अगर उन्होंने किसान आंदोलन में भाग लिया तो छह महीने की सज़ा भुगतनी होगी. किसानों ने इस चेतावनी को धमकी के रूप लिया है. उनका कहना है कि वे इन बॉन्डों को चुनौती भी नहीं दे सकते क्योंकि इस काम के लिए वकील की ज़रूरत है जिसकी फ़ीस भरने में वे असमर्थ हैं. वहीं, कुछ किसानों को हिरासत में लिए जाने के बाद 20-20 हज़ार रुपये के मुचलकों पर छोड़ा गया है. मध्यप्रदेश के इंदौर में शुक्रवार को भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व में एक ट्रैक्टर रैली का आयोजन किया गया. उन्होंने मौजूदा किसान आंदोलन को कांग्रेस का भ्रामक प्रचार करार दिया. विजयवर्गीय के मुताबिक उनकी रैली में हजारों किसानों की मौजूदगी बता रही है कि किसानों को कोई समस्या नहीं है.

सरकार और पुलिस-प्रशासन के इस रवैय्ये से किसान और उनके नेता नाराज़ हैं और उग्र प्रदर्शन की बात कर रहे हैं. आरकेएमएस के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी का कहना था कि सरकार किसानों आंदोलन की चेतावनी से डर कर इस तरह की कार्रवाई करवा रही है. उन्होंने कहा कि ऐसा करना असंवैधानिक है. बकौल शिवकुमार अगर किसानों से बॉन्ड भरवाना बंद नहीं किया गया तो राज्य के हर विकासखंड में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुतले फूंके जाएंगे.

शिवकुमार कक्काजी के इस बयान पर आरकेएमएस के प्रवक्ता सुनील गौर ने कहा, ‘यह (उग्र प्रदर्शन) स्वाभाविक है. बैंककर्मियों ने दो दिन की हड़ताल की थी. क्या उनसे बॉन्ड भरवाए गए थे? अध्यापकों ने हड़ताल की तो क्या उनसे बॉन्ड भरवाए गए? लोकतंत्र में अपने हक़ के लिए आंदोलन करने की स्वतंत्रता है. अब किसान (विरोधस्वरूप) अपना अनाज, दूध नहीं बेचना चाहता तो आप क्या उससे बॉन्ड भरवाएंगे. जिस आदमी ने कोई अपराध नहीं किया उसे आप नोटिस भेज रहे हैं. हम लोग शांतिपूर्ण तरीक़े से आंदोलन करना चाह रहे हैं. लेकिन हमको उकसाने वाली कार्रवाई के ज़रिये बाध्य किया जाएगा तो जैसा हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी ने कहा हम निश्चित रूप से उग्र प्रदर्शन करेंगे.’

उधर, राज्य सरकार का कहना है कि मुचलके भरवाना सामान्य प्रक्रिया है और कलेक्टर और पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर इन्हें अंजाम देते हैं. राज्य के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह के मुताबिक़ सरकार की तरफ़ से ऐसी कार्रवाई के आदेश नहीं दिए गए हैं. जानकारों का कहना है कि सरकार ने यह बयान किसी संभावित अप्रिय घटना होने की स्थिति में सारा दोष पुलिस-प्रशासन के सिर मढ़ने के लिए दिया है.

दूसरी तरफ़ किसान आंदोलन का कार्यक्रम देखकर लगता है कि संगठनों की कोशिश विरोध प्रदर्शन को और बड़ा करने की रहेगी. कार्यक्रम के मुताबिक़ किसान संगठन अलग-अलग दिवस मना रहे हैं. मंगलवार पांच जून को धिक्कार दिवस मनाया गया. छह जून को शहादत दिवस. आठ जून को असहयोग दिवस और दस जून को भारत बंद का ऐलान किया गया है.

भारत बंद के दिन हालात ज़्यादा संवेदनशील हो सकते हैं. हिंसा की संभावना इसलिए भी है क्योंकि कई जगहों पर आंदोलन को ज़बरदस्ती उग्र बनाए जाने की कोशिशें की जा रही हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो लगातार शेयर हो रहे हैं जिनमें आंदोलन में भाग नहीं लेने वाले किसानों का सामान छीनकर उसे सड़क पर फैलाया जा रहा है. मध्य प्रदेश समेत पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और अन्य राज्यों से ऐसी ख़बरें आ रही हैं. भाजपा का आरोप है कि आंदोलन को उग्र बनाने के लिए कांग्रेस के लोग ऐसा कर रहे हैं. आरकेएमएस के सुनील गौर ने भी कहा कि आंदोलन को बदनाम करने के लिए कुछ लोग ऐसा कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ किसान अति उत्साह में आकर दूध, अनाज आदि चीज़ें फेंक रहे हैं जबकि वे लगातार अपील कर रहे हैं कि ऐसा न किया जाए.