शिलॉन्ग में स्थानीय खासी समुदाय के लोगों द्वारा मज़हबी सिखों (वे दलित हिंदू जो अतीत में कभी सिख बन गए थे) के खिलाफ की जा रही हिंसा यहां इस तरह का पहला वाकया नहीं है. इससे पहले 1979 में बंगाली स्थानीय लोगों का निशाना बने थे और 1987 में अपने खिलाफ हिंसक घटनाओं के चलते नेपालियों और बिहारियों को यह शहर छोड़कर जाना पड़ा था.

ताजा हिंसा का यह सिलसिला आज से सात दिन पहले एक खासी बस ड्राइवर और सिख महिला के बीच झड़प के बाद शुरू हुआ था. हालांकि पुलिस ने इस झगड़े का अपने स्तर पर निपटारा कर दिया था, लेकिन इसके बाद यहां वॉट्सएप पर यह मैसेज वायरल हो गया कि एक खासी लड़के की हत्या कर दी गई है. इसके चलते सिखों के खिलाफ हिंसा भड़क गई और फिर यहां सेना को बुलाना पड़ा. फिलहाल शिलॉन्ग के 14 क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा हुआ है और हालात तनावपूर्ण हैं.

इस बीच यहां पंजाबी समुदाय के कब्जे वाली एक जमीन फिर चर्चा में आ गई है. 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने इस समुदाय को लाकर यहां बसाया था और तब से ज्यादातर सिख परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी यहीं रह रहे हैं. स्थानीय लोग इस बसाहट का विरोध करते हैं. इनके मुताबिक पंजाबियों ने इस जमीन पर अवैध कब्जा जमाया है.

पंजाबियों की यह आबादी अपनी कड़ी मेहनत बूते काफी हद तक समृद्ध हो चुकी है. वहीं स्थानीय लोगों में यह भावना है कि इन कथित बाहरी लोगों ने उनके रोज़ी-रोज़गार के अवसर छीन लिए हैं और इसके चलते इनके मन में पंजाबियों प्रति पहले से ही एक रोष का भाव रहा है. मेघालय की अर्थव्यवस्था छोटी है और इसमें बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं. इस स्थिति ने भी स्थानीय लोगों में आक्रोश को और बढ़ाया है. यहां सिंधी और मारवाड़ी समुदाय के लोग भी कई पीढ़ियों से रह रहे हैं, लेकिन ये इतने चुपचाप तरीके से अपना कारोबार कर रहे हैं कि स्थानीय लोगों के निशाने पर नहीं आ पाते.

वहीं पंजाबियों के साथ स्थिति यह है कि उनका शहर के बीचों-बीच एक बड़ी जमीन पर कब्जा है. स्थानीय लोगों के एक बड़े वर्ग को यह बात खटकती है और ये लंबे समय से मांग भी उठाते रहे हैं कि इन्हें और किसी दूसरी जगह पर स्थानांतरित कर दिया जाए.

कथित बाहरी और स्थानीय आबादी का यह टकराव भारत में सिर्फ शिलॉन्ग तक सीमित नहीं है. पूरे देश में ऐसे कई उदाहरण हैं. मुंबई को ही लें तो यहां भी स्थानीय लोग उत्तर भारतीयों पर उनकी आजीविका के अवसर छीनने और कई सामाजिक बुराइयों फैलाने के आरोप लगाते हैं. कुल मिलाकर कई राज्यों में नागरिक समूहों के बीच ऐसे टकराव की स्थितियां बन सकती हैं, लेकिन सरकारों को हर कीमत पर यह रोकना चाहिए.

शिलॉन्ग की बात करें तो यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा जाएगा कि जब यहां रोज़गार पैदा करने वाला पर्यटन उद्योग उभार पर आ रहा है, तभी ये हिंसक घटनाएं शुरू हो गई हैं. यहां के हालात इस वजह से और खतरनाक बन गए हैं कि यहां कोई नागरिक संगठन नहीं हैं. ऐसा होता तो लोग आपस में मिल-बैठकर सुलह समझौते की कोशिश करते. फिलहाल ये स्थितियां कोनराड संगमा सरकार की परीक्षा की घड़ी हैं, हालांकि अब तक दोनों पक्षों के बीच उसकी मध्यस्थता की कोशिशें कुछ खास कारगर साबित होती नहीं लग रही हैं. (स्रोत)