बिहार में भारतीय जनता पार्टी पर उसके सहयोगी दलों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. इस दबाव के बीच बिहार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की बैठक आज पटना में हो रही है. बिहार में एनडीए में भाजपा के अलावा जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और राष्ट्रीय लोक समता दल (आरएलएसडी) हैं. पिछले साल एनडीए में नीतीश कुमार की वापसी के बाद पूरे एनडीए की यह पहली बैठक होगी. इस बैठक में हर दल के जिला स्तर तक के पदाधिकारी भी शामिल होंगे.

लंबे समय तक चुप रहने के बाद बिहार में भाजपा के तीनों सहयोगी दलों ने अलग-अलग ढंग से भाजपा पर दबाव बनाना शुरू किया है. जेडीयू का कहना है कि बिहार में एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार को ही होना चाहिए और अगले लोकसभा चुनावों में पार्टी को सम्माजनक सीटें मिलनी चाहिए. बीते दिनों बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार के आवास पर पार्टी ने जो बैठक की उसमें चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी शामिल हुए. इस बैठक के बाद जेडीयू नेताओं के हवाले से ये खबरें आईं कि पार्टी लोकसभा चुनावों में 25 सीटों की मांग के साथ बातचीत की शुरुआत कर सकती है.

इससे संकेत मिलता है कि बिहार में एनडीए का कुनबा बचाने में लगे अमित शाह के लिए इधर कुआं और उधर खाई वाली स्थिति है. 2014 के पहले जब भाजपा और जेडीयू मिलकर चुनाव लड़ते थे तो जेडीयू के खाते में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से अधिक सीटें जाती थीं. लेकिन अब भाजपा के साथ लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता दल के होने की वजह से भाजपा के लिए नीतीश कुमार की पार्टी को अधिक सीटें दे पाना संभव नहीं होगा. इस पृष्ठभूमि में यह भी माना जा रहा है कि जेडीयू 25 सीटों की मांग यह जानते हुए कर रही है कि उसे इतनी सीटें नहीं मिलेंगी लेकिन, ऐसा करके वह अधिक से अधिक सीटें अपने खाते में डालना चाहती है.

वहीं उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसडी का कहना है कि बिहार में भाजपा को सिर्फ अपने हितों की नहीं बल्कि एनडीए के हितों की चिंता करनी चाहिए. कुशवाहा बार-बार यह कह रहे हैं कि सीटों के बंटवारे का काम अंतिम समय पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए बल्कि जल्दी से जल्दी इस पर निर्णय होना चाहिए. उनका कहना है कि जिस तरह से विपक्षी पार्टियां अभी से बिहार में चुनावी तैयारी में जुट गई हैं, वैसे ही एनडीए को भी सीटों का बंटवारा तय करके तैयारियों में जुट जाना चाहिए.

वैसे कहा तो यह भी जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के संपर्क में भी हैं और अगर एनडीए में उन्हें अपेक्षित ‘सम्मान’ नहीं मिला तो अगले लोकसभा चुनावों के पहले वे आरजेडी के साथ भी जा सकते हैं. सीटों के बंटवारे में जल्दी से जल्दी स्पष्टता की उनकी मांग को भी कई लोग बिहार में उनके दूसरा विकल्प खुला रखने की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं.

यही बात रामविलास पासवान की एलजेपी के लिए भी कही जा रही है. लोजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हमने भाजपा का 2014 में उस वक्त साथ दिया था जब नीतीश भी नरेंद्र मोदी के नाम पर अलग हो गए थे. बिहार की राजनीति के जातिगत समीकरणों को जो लोग भी समझते हैं, वे यह स्वीकार करते हैं कि रामविलास पासवान के वोट जब उस वक्त के एनडीए के साथ जुड़े तब ही वहां एनडीए को बड़ी कामयाबी मिली. हमारी पार्टी को 2014 के योगदान को ध्यान में रखते हुए सीटें मिलनी चाहिए. अगर नीतीश कुमार के दबाव में भाजपा हमारी सीटों को कम करती है तो हम दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं.’

दरअसल, चंद्रबाबू नायडू की तेलगूदेशम पार्टी के एनडीए से अलग होने और उपचुनावों में मिल रही लगातार हार के बीच भाजपा के लिए बिहार में 2014 वाला प्रदर्शन दोहराना बेहद जरूरी हो गया है. खास तौर पर ऐसे माहौल में जब उत्तर प्रदेश में सारे धुर विरोधी भाजपा के खिलाफ एकजुट हो गए हैं. कहा जा रहा है कि इसी वजह से एनडीए बिहार में भाजपा के सहयोगी दल उसके खिलाफ मुखर हो रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि भाजपा यह बिल्कुल नहीं चाहेगी कि चुनावों के पहले कोई भी दल उससे दूर जाए. ऐसी स्थिति में इन दलों को लगता है कि अगले चुनावों के लिए भाजपा से अच्छा मोलभाव किया जा सकता है.

बिहार की तीनों सहयोगी दलों ने भाजपा पर जो दबाव बना दिया है, उससे निपटना अमित शाह के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है. यह चुनौती इसलिए भी बड़ी हो गई है क्योंकि इसका समाधान तीनों दलों को स्वीकार्य होना चाहिए और कोई नाराज नहीं होना चाहिए. क्योंकि अगर भाजपा नीतीश को खुश रखती है और इससे पासवान और कुशवाहा या इन दोनों में से कोई एक भी नाराज होता है तो इसकी संभावना बहुत अधिक रहेगी कि वह राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस गठबंधन में शामिल हो जाए. ऐसे स्थिति में भाजपा को अगले लोकसभा चुनावों में नुकसान हो सकता है. वैसे भी नीतीश कुमार के एनडीए में आने के बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी एनडीए के पाले से निकलकर आरजेडी के खेमे में चली गई है.

अमित शाह के लिए यह चुनौती और मुश्किल इसलिए है कि अगर वे सहयोगी दलों को संतुष्ट रखते हैं तो भाजपा के अंदर असंतोष पैदा हो सकता है. अभी बिहार में भाजपा के 22 लोकसभा सांसद हैं. शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद के असंतोष को अगर दरकिनार भी कर दें तो भाजपा के पास 20 सांसद बचते हैं. इन​में से अगर किसी का भी टिकट कटता है और उसकी सीट किसी सहयोगी दल को जाती है तो इससे असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है. इन चुनौतियों से भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह के लिए निपटना आसान नहीं होने जा रहा है.