भारतीय रिजर्व बैंक के नेतृत्व में इस वित्त वर्ष की दूसरी समीक्षा बैठक में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने ब्याज दरें चौथाई फीसदी बढ़ाने का ऐलान कर लोगों को चौंका दिया है. ऐसा इसलिए कि ब्याज दरों में अगस्त तक वृद्धि होने का अनुमान था लेकिन महंगाई पर काबू पाने के लिए आरबीआई ने दो माह पहले ही यह कदम उठा लिया है.

आरबीआई के ताजा फैसले के साथ ही रेपो दर (बैंकों के कर्ज पर आरबीआई द्वारा वसूले जाने वाले ब्याज की दर) छह फीसदी से बढ़कर अब 6.25 फीसदी हो गई है. वहीं रिवर्स रेपो दर (बैंकों के जमा पर आरबीआई से मिलने वाली ब्याज दर) पहले के 5.75 से बढ़कर अब छह फीसदी तक चली गई है.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के बीते चार सालों के कार्यकाल में यह पहली बार है जब ब्याज दरें बढ़ाई गई हैं. वैसे इस फैसले से अब लोगों को बैंकों से लिए गए कर्ज के बदले पहले से ज्यादा बड़ी किश्तें चुकानी होंगी. जानकारों का कहना है कि बदले हालात में अब 20 लाख रुपये के कर्ज पर हर महीने बैंकों को लगभग 400 रुपये ज्यादा देने पड़ेंगे. जाहिर है कि आम चुनाव के कुछ महीने पहले आरबीआई का यह फैसला आमलोगों के बीच सरकार की नाराजगी और बढ़ा सकता है. लेकिन एमपीसी ने अपने सभी छह सदस्यों की सहमति से सख्ती वाला यह फैसला लेकर साफ कर दिया है कि महंगाई पर काबू पाना उसकी पहली प्राथमिकता है. एमपीसी के पौने दो साल और 14 बैठकों के इतिहास में अभी तक हो यह रहा था कि केवल एक या दो सदस्य ही ब्याज दरें बढ़ाने का समर्थन करते थे.

महंगाई और बढ़ने का अनुमान

महंगाई को लेकर आरबीआई की चिंता इस तथ्य से भी जाहिर होती है कि इस बैठक में उसने मौजूदा वित्त वर्ष के अपने महंगाई अनुमानों को बढ़ा दिया है. आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के अनुसार पहली छमाही में खुदरा महंगाई दर के 4.8-4.9 फीसदी के बीच रहने का अनुमान है जबकि दूसरी छमाही में यह 4.4 फीसदी तक जा सकती है. इससे पहले अप्रैल की बैठक में आरबीआई ने पहली और दूसरी छमाही में महंगाई के अपने अनुमानों को घटाते हुए इन्हें 4.7-5.1 और 4.4 फीसदी कर दिया था.

उधर, नए वित्त वर्ष के पहले माह यानी अप्रैल में खुदरा सामानों की महंगाई 0.30 फीसदी बढ़कर 4.58 फीसदी तक पहुंची थी. खाद्य वस्तुओं और ईंधन को छोड़कर मापी जाने वाली कोर खुदरा महंगाई भी छह महीने के उच्चतम स्तर 5.9 फीसदी तक चली गई थी. पेट्रोल-डीजल और सब्जियों के महंगे होने से मई में भी महंगाई के और चढ़ने का अंदाजा लगाया जा रहा है. उधर, जून के महंगाई के आंकड़े पर किसानों की हड़ताल और बरसात का प्रभाव पड़ने की आशंका है. डॉलर की तुलना में रुपये के कमजोर होने से भी चिंता बनी हुई है. इसके अलावा खरीफ फसलों की एमएसपी को बढ़ाने के निर्णय का असर भी भविष्य में दिख सकता है. हालांकि कइयों को उम्मीद है कि सामान्य मानसून और कच्चे तेल के सस्ता होने की संभावना से महंगाई पर लगाम लग सकता है.

तटस्थ रुख बरकरार

यह खबर हालांकि राहत देने वाली है कि भविष्य की महंगाई दर के बारे में केंद्रीय बैंक का अनुमान पहले की तरह ‘न्यूट्रल’ (न सख्त, न नरम) ही रहा है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार इसका मतलब यह है कि ब्याज दरों पर आरबीआई का आगे का रुख महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर करेगा. लेकिन पिछले कई महीनों में कच्चा तेल के लगातार महंगा होने और वैश्विक तनावों के चलते महंगाई को लेकर अभी कई तरह की आशंकाएं हैं. आशंका इस बात की भी है कि 2018 के दौरान अमेरिका में ब्याज दर में दो बार की संभावित बढ़ोतरी से भारत में आया विदेशी निवेश ज्यादा तेजी से वापस जा सकता है. जानकारों के अनुसार चौथाई फीसदी की ताजा वृद्धि से विदेशी धन की इस वापसी पर थोड़ा लगाम लग सकता है.

आरबीआई का विकास अनुमान स्थिर

आरबीआई ने उधर वित्त वर्ष 2018-19 में विकास दर का अपना अनुमान लगभग स्थिर (7.45 फीसदी) ही रखा है. केंद्रीय बैंक की मानें तो चालू वित्त वर्ष की सभी चारों तिमाहियों में विकास दर क्रमश: 7.5, 7.6, 7.3 और 7.4 फीसदी रह सकती है. हालांकि मोदी सरकार का दावा है कि यह आंकड़ा 7.5 फीसदी तक जा सकता है. वैसे पिछले हफ्ते आए आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 की विकास दर 6.7 फीसदी थी जो 6.6 फीसदी के उसके अनुमान से थोड़ा ज्यादा थी. जनवरी-मार्च 2018 के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था ने तो 7.7 फीसदी की गति से विकास किया है.

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक विकास के इन आंकड़ों ने ही महंगाई के मोर्चे पर आरबीआई को और आक्रामक होने की वजह मुहैया करवाई है. माना जाता है कि विकास की गति ज्यादा तेज न होने से आरबीआई पर अभी तक महंगाई कम करने के साथ-साथ विकास को गति देने का दोहरा दबाव था. सत्याग्रह ने भी अपने एक आलेख में बताया था कि विकास दर के पिछले हफ्ते के आंकड़ों ने आरबीआई की यह उलझन लगभग खत्म कर दी है.

और अंत में

बहरहाल मौद्रिक नीति समिति की इस बार की बैठक की खासियत यह रही कि यह दो दिनों के बजाय तीन दिनों तक चली है. आरबीआई के अनुसार ऐसा कुछ प्रशासनिक जरूरतों के मद्देनजर किया गया है. हालांकि अगली बैठक फिर से दो दिनों की ही होगी जो 31 जुलाई से एक अगस्त तक चलेगी. अगली नीतिगत दरों का ऐलान एक अगस्त को ही किया जाएगा.