सुशीला शर्मा शिक्षिका हैं और मध्य प्रदेश के रीवा जिले में रहती हैं.


मेरा बचपन मध्य प्रदेश के अलग-अलग शहरों में घूमते हुए बीता है. पिताजी सरकारी अधिकारी थे, सो उनके तबादले होते रहते थे. इसके चलते सीहोर, इंदौर, ग्वालियर, भोपाल, शहडोल यानी एमपी के लगभग हर हिस्से में हम रहे. खुद अपने मुंह से कहना थोड़ा अजीब है, लेकिन इतनी जगह घूमकर, घाट-घाट का पानी पीकर, आने वाली चतुराई जाने क्यों मुझमें कभी नहीं आ पाई. जब मैं छोटा बच्चा थी, तो कह सकते हैं कि मैं एक भोंदू बच्चा थी. इतनी सीधी कि स्कूल में अक्सर लोग मुझे डरा-धमकाकर मेरा टिफिन खा जाते थे, यहां तक कि मेरी किताब-कॉपी भी छीन लेते थे. एक बार तो मैं पूरा का पूरा बस्ता ही गुमाकर आ गई थी. और ऐसा नहीं था कि यह सिलसिला सिर्फ बचपन में रहा, किताबें तो मेरी ग्यारहवीं में पहुंचकर भी चोरी होती रहीं या मैं ही उन्हें गुमाती रही.

शैतानी करने पर पिटना किसे कहते हैं, मुझे नहीं पता. हां, थोड़ा बड़े होने पर जब कभी मेरी पिटाई हुई भी तो रोटी गोल न बनाने के लिए, वह भी मजे-मजे में. रोटी गोल न बनने पर मां मेरी ही बनाई आड़ी-टेढ़ी रोटी से पीटने का नाटक करती थीं. किसी दोस्त के घर जाने और मस्तियां करने का भी कोई हिसाब-किताब नहीं था क्योंकि मुझे घर पर रहना ही ज्यादा पसंद था.

उस दौर की सबसे मजेदार जो बात मुझे याद आती है वो यह कि पापाजी से मिलने जो लोग आया करते थे वो हमें भी ‘बेबी नमस्ते - बेबी नमस्ते’ बोलकर अभिवादन किया करते थे. सत्तर-अस्सी के उस दशक में शायद यह वो दौर था जब नेताओं-अफसरों की चापलूसी करने का रिवाज अपने चरम पर था और उसका असर मेरे घर पर भी देखने को मिलता था. मुझे इससे सख्त चिढ़न होती थी. खैर ये तो विषय से हटकर बात हो गई पर ये सब बताने का मकसद यही है कि डीडीए (डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर) साहब की बेटी होने और घर से कभी अकेले नहीं निकलने के कारण मुझे बाकी दुनिया का पता ज्यादा नहीं रहता था.

मेरे बचपन का यह यादगार किस्सा तब का है जब मैं पांचवीं या छठी क्लास में पढ़ती थी. तब हम नए-नए ही ट्रांसफर होकर सीहोर पहुंचे थे. वैसे तो हमें यहां आए छह महीने हो गए थे, लेकिन मेरे लिए यह वक्त बहुत ही कम था. अब तक मुझे सिर्फ स्कूल से घर आने का रास्ता याद हो पाया था. इसी दौरान एक बार हुआ यह कि स्कूल की तरफ से हमें शहर में लगने वाले मेले में ले जाया गया. जब तक मेला घूमना था तब तक तो दोस्त और टीचर्स साथ में रहे, लेकिन मेला घुमाने के बाद सबको अपने-अपने घर जाने की छुट्टी दे दी गई. ज्यादातर बच्चे अपने घर का रास्ता जानते थे सो वे अपना-अपना रास्ता लेने लगे. लेकिन मुझे तो सिर्फ स्कूल से घर जाने का रास्ता पता था! मेले वाली जगह से घर किस तरफ पड़ता है, मुझे इसका अंदाजा भी नहीं था.

हालांकि इस बीच मैंने साथियों से अपने घर के रास्ते का कुछ अंदाजा लिया और कुछ अपना भी दिमाग चलाया. इस तरह मैं भी घर की दिशा में बढ़ चली. रास्ते में जो भी गली जानी-पहचानी लगती मैं उसमें मुड़ जाती. यह सिलसिला करीब दो-तीन घंटे तक चला होगा. रास्ता खोजने वाली मैं, गलियों में मुड़ते-मुड़ते असल में गुम हो चुकी थी और इसका नतीजा यह हुआ कि अब मैं अपने घर जाने वाले रास्ते की ठीक उल्टी दिशा में चल रही थी.

चलते-चलते थोड़ा और वक्त बीता तो घबराहट होने लगी कि मेरी कॉलोनी आ क्यों नहीं रही है! कुछ देर तो ढांढस बांधे चलती रही लेकिन जरा देर बाद रुलाई भी छूटने लगी कि हाय मैंने यह बेवकूफी क्यों की और अब घर कैसे पहुंचूंगी? यही सब सोचते-विचारते मैं चली जा रही थी कि एक चौराहे पर किसी ने मुझे आवाज लगाई, पलटकर देखा तो भइया थे. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्होंने पूछा कि कहां जा रही थी, मैंने पूरा कॉन्फिडेंस दिखाते हुए कहा - घर. उनका जवाब मिला - लेकिन घर तो दूसरी तरफ है. इतना सुनने और डांट पड़ने की आशंका से मेरा समेटा हुआ डर बह निकला. मैंने रो-रोकर उनको बताया कि मेरे सब दोस्त मुझे छोड़कर चले गए, टीचर भी चले गए और मुझे घर आने का रास्ता भी नहीं मिल रहा था. भइया ने मुझे शांत करवाया और स्कूटर पर बिठाकर जल्दी से घर ले आए. इस तरह उस दिन अच्छी किस्मत ने मुझे उल्टे रास्ते पर भेजकर भी भटकने से बचा लिया था.

आज भी घर पर इस बात के लिए मेरा मजाक बनाया जाता है और मैं भी सबके साथ मिलकर इस घटना पर हंसती हूं. लेकिन अब भी सोचती हूं कि अगर मैं उस दिन गुम हो गई होती तो? मेरा क्या-क्या हाल हो सकता था, ये सोचकर आत्मा कांप जाती है. इस घटना का मुझपर ये असर हुआ कि आज भी मैं अकेले ट्रैवल करने में डरती हूं. घर से बाहर निकलते हुए ज्यादातर मौकों पर कंपनी तलाशती हूं और अकेले उन्हीं रास्तों पर जाती हूं जहां से सैकड़ों बार गुजर चुकी हूं. मुझे पता है कि मेरे इस डर के लिए स्कूल वालों की लापरवाही के साथ-साथ मेरा बुद्धूपन भी जिम्मेदार था और शायद अपने आप को दोष देने की वजह से ही यह डर मुझ में कायम है. स्वीकारना मुश्किल है, लेकिन उम्र के पांच दशक पूरे करने के बाद भी मुझे खो जाने से सबसे ज्यादा डर लगता है. इस चक्कर में कई बार मैं खुद को और परिवार वालों को हलाकान कर चुकी हूं, लेकिन यह जानते हुए भी कि इससे निजात पाने के लिए मुझे कोशिश करने चाहिए, इस कोशिश के लिए जरूरी हिम्मत अब तक नहीं बटोर पाई हूं.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)