मुंबई के मातोश्री में बुधवार को बिताए करीब दो घंटे 20 मिनट का वक्त न अमित शाह जल्दी भूल पाएंगे और न ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस. यह एक ऐसी मुलाकात थी जिसके लिए वक्त अमित शाह ने मांगा था. इस दौरान उद्धव ठाकरे ने अपनी बातें कहीं, लेकिन उनकी बातें नहीं मानीं.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मुलाकात इस बार नए अंदाज़ और तेवर वाले उद्धव ठाकरे से हुई. अमित शाह मन बनाकर गए थे कि वे साथ लोकसभा चुनाव लड़ने का निमंत्रण उद्धव ठाकरे को देंगे और ठाकरे ना-ना करते करते हां कर देंगे. लेकिन इस बार शिवसेना का रुख बिल्कुल बदला हुआ दिखा.

जानकारों के मुताबिक धीरे-धीरे मातोश्री ने वही रवैया अपनाना शुरू किया है जो बाल ठाकरे के वक्त शिवसेना प्रमुख अपनाया करते थे. बताया जा रहा है कि उद्धव अब सिर्फ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से बात करेंगे. महाराष्ट्र के स्थानीय नेताओं से उद्धव के बेटे आदित्य ही संपर्क में रहेंगे. अगर भाजपा को मातोश्री प्रमुख से बात करनी होगी तो सीधे पहल प्रधानमंत्री और अमित शाह के स्तर पर ही होगी.

ऐसा नहीं है कि अमित शाह बहुत खुश होकर मातोश्री पहुंचे थे. अगर संघ का दबाव नहीं होता तो संभवत: यह मुलाकात भी नहीं होती. लेकिन नागपुर का नेतृत्व इस बात पर अड़ा हुआ है कि भाजपा को अपनी छवि बदलनी होगी और सबसे पुराने मित्र से दोस्ती का हाथ बढ़ाना होगा. इसी आदेश के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के साथ उद्धव से मिलने पहुंचे थे. करीब दो घंटे 20 मिनट तक वे मातोश्री में रुके. सुनी-सुनाई है कि इस दौरान देवेंद्र फड़णवीस सिर्फ 20 मिनट ही दोनों नेताओं के साथ रहे. इसके बाद अमित शाह और उद्धव ठाकरे ने अकेले बैठकर करीब दो घंटे लंबी बातचीत की. उधर, देवेंद्र फड़णवीस और आदित्य ठाकरे दूसरे कमरे में बैठे रहे.

सवाल उठता है कि इतनी लंबी बातचीत के बावजूद दोनों नेताओं के मन क्यों नहीं मिले. मुंबई और दिल्ली में दोनों ही दलों के नेताओं से बात करने पर इस सवाल का जवाब कुछ हद तक मिल जाता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 24 सीटों पर लोकसभा का चुनाव लड़ी थी और शिवसेना 20 सीटों पर. भाजपा ने 24 में से 23 सीटें जीतीं और शिवसेना ने 20 में से 18. लेकिन 2014 में ही जब विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा और शिवसेना का संबंध विच्छेद हो गया. भाजपा अलग चुनाव लड़ी और शिवसेना ने अलग रास्ता चुना. उस वक्त देश में मोदी लहर थी तो भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनी और शिवसेना दूसरे नंबर पर छिटक गई.

मातोश्री के अंदर की खबर रखने वाले एक सूत्र का कहना है, ‘करीब चार साल पुराना जख्म उद्धव ठाकरे अभी तक नहीं भूले हैं. इस बार बात सिर्फ लोकसभा चुनाव की नहीं होगी, बात विधानसभा चुनाव की भी होगी. अगर भाजपा को शिवसेना के साथ गठबंधन करना है तो ये वादा करना होगा कि विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री उम्मीदवार देवेंद्र फड़णवीस नहीं उद्धव ठाकरे होंगे. अगर भाजपा ने इस बार ठाकरे को मुख्यमंत्री बनने से रोका तो वे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में रोड़ा अटकाएंगे’. बताया जाता है कि उद्धव ठाकरे ने भी मातोश्री में हुई मुलाकात के दौरान अमित शाह को यह बात अपने अंदाज़ में बता दी है.

अब गेंद पूरी तरह भाजपा के पाले में है. दिल्ली में अमित शाह के करीबी एक नेता इस मुलाकात के बारे में बताते हैं, ‘भाजपा अभी सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनाव पर ध्यान देना चाहती है. बुधवार रात की मुलाकात भी इसी सिलसिले में थी. मुलाकात से पहले माहौल अच्छा रहे इसलिए अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कह दिया था कि लोकसभा चुनाव शिवसेना के साथ लड़ेंगे.’

सुनी-सुनाई पर जाएं तो भाजपा चाहती है कि लोकसभा चुनाव में वही 24-20 का फॉर्मूला कायम रहे. लेकिन अब शिवसेना उस पुराने फॉर्मूले पर नहीं लड़ना चाहती. अमित शाह के करीब यह नेता बताते हैं, ‘भाजपा के नेतृत्व ने शिवसेना के नेतृत्व को समझाने की कोशिश की कि अगर दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ेंगी तो दोनों को ही नुकसान होगा. इस नफा-नुकसान को समझाने के लिए अमित शाह मातोश्री जाकर उद्धव से मिले थे. लेकिन बात विधानसभा चुनाव पर जाकर टिक गई. शिवसेना ने इस बार साफ लहजे में बता दिया है कि अगर लोकसभा चुनाव साथ लड़ेंगे तो विधानसभा चुनाव भी साथ लड़ना होगा. भाजपा को पहले ही घोषणा करनी होगी कि विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री उम्मीदवार शिवसेना का होगा’.

अब भाजपा इस नए फॉर्मूले पर सोच रही है. आगे क्या होगा, इस सवाल के जवाब में भाजपा के महाराष्ट्र के एक बड़े नेता बताते हैं, ‘शिवसेना अलग रास्ता चुनेगी इसकी उम्मीद अब भी कम है. लेकिन एक बात तय है कि मातोश्री से वही पुराना रिश्ता बनाना होगा जो बाल ठाकरे के वक्त में दिल्ली में अटल-आडवाणी और मुंबई में प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे का था. इस वक्त उद्धव ठाकरे न मोदी के करीब हैं ना अमित शाह के. मुंबई में भी ठाकरे परिवार को सबसे ज्यादा शिकायत देवेंद्र फड़णवीस और महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष राव साहेब दानवे से है.’

ऐसे में संघ कार्यालय की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है है. नागपुर में संघ के एक प्रचारक आगे की सियासत की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, ‘अब मातोश्री और दिल्ली की सत्ता की बीच की चाबी नागपुर से ही निकलेगी और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की भूमिका इसमें अहम हो सकती है. आगे-आगे देखिए, दिल्ली की सियासत में मुंबई कितना अहम रोल निभाती है’.