अगर ‘नीतिशस्त्र’ जैसी लघु फिल्म विस्तार पाकर 80 और 90 के दशक में फीचर फिल्म का रूप अख्तियार करती तो उसे ‘खून भरी मांग’ (1988) जैसा कोई नाटकीय टाइटल मिलता. ‘बहन का बदला’ या ‘रिश्ता बड़ा या सच’ जैसे नाम के साथ वो रिलीज होती और उत्पीड़न पर उस दौर में बनने वाली अतिनाटकीय बी-ग्रेड मसाला फिल्मों में उसकी गिनती होती. लेकिन चूंकि आज का वक्त नए धारदार विचारों को सिनेमा में समाहित करने का है, तो कई लोग नायिका प्रधान ‘नीतिशस्त्र’ को फेमिनिस्ट लघु फिल्म मानने की गलती अवश्य करेंगे.

है ये असल में सिनेमा का अवसरवाद जो एक सलीके के ‘वाद’ को सलीके से अपनी कहानी में पिरोना नहीं जानता. इसलिए इस बदला लेने की साधारण कहानी में नारीवाद के गुण डालते-डालते उम्दा निर्देशन का गुड़ डालना भूल जाता है. वो तो भला हो तापसी पन्नू का, कि हम अंत तक उनके अभिनय व शारीरिक श्रम से इस कदर अभिभूत रहते हैं कि ‘नीतिशस्त्र’ को सिरे से खारिज करने से बचते रहते हैं.

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‘नीतिशस्त्र’ 80-90 के दशक के कई लोकप्रिय बॉलीवुड स्टीरियोटाइप ट्राय करके त्रास देती है. तरह-तरह की इंसानी आवाजें निकालता बेवजह का लाउड पार्श्व संगीत, क्लाइमेक्स में उत्तेजना से भरा गीत, बरामदे में रखा मृत शरीर व उसी वक्त बारिश में हीरो की एंट्री, और फोटोफ्रेम्स में अतीत ढूंढ़ने की कोशिश. इन तकनीकों से गढ़े गए थकेले दृश्य-विन्यास कथानक के आड़े आते हैं और जो इस लघु फिल्म में अच्छा है उसकी तीव्रता भी कम करते हैं.

अच्छा ये कि रेप-रिवेंज फिल्मों के टेंपलेट में थोड़ा-सा बदलाव कर ‘नीतिशस्त्र’ बहन और भाई के बीच के फ्रिक्शन को केंद्र में रखती है. इसलिए जितनी फिल्मी होनी चाहिए उससे ज्यादा फिल्मी होने के बावजूद पहली बार देखने पर तुरंत आपको छूती है क्योंकि इस तरह के डायनामिक्स की आप हिंदी फिल्मों से अपेक्षा नहीं करते. टाइट क्लोजअप में होने और फटाफट कैमरा एंगल बदलने की चालाकी करने के बावजूद फाइट-सीक्वेंस अच्छे लगते हैं क्योंकि भाई और बहन को इतनी नफरत के साथ लड़ते देखने का मौका कम ही हिंदी फिल्मों में नसीब होता है.

रेप रिवेंज जॉनर के इसी चश्मे से देखने पर आपको इस लघु फिल्म का अंत भी सही लगेगा. नायिका रोशनी, गीता में पढ़ी नीति का शस्त्र थामे अपने ही भाई का कत्ल कर देती है और अपनी स्टूडेंट गौरी पर हुए रेप का रिवेंज ले लेती है. बदला लेने वाली फिल्मों में हमेशा से यही अंत निश्चित होता है, इसलिए सही लगता है. लेकिन अगर आप सही और गलत के चश्मे से देखेंगे तो समझ आएगा कि यही अति नाटकीयता इस लघु फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है. जिस अपराधी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया जाना चाहिए था, उसे मार कर फिल्म अपनी नायिका को ‘मॉब जस्टिस’ वाले तरीके का नायकत्व देती है. इसे ऐसी किसी फिल्म में सही नहीं ठहराया जा सकता जो खुद सदियों से होते आ रहे गलत की मुखालफत करने के लिए खड़ी हुई है और खुद ही – पूरी तरह बेवजह और बेतमलब भी – गलत करने लगती है. हमारी लघु फिल्मों को वैसे भी अंत में आकर चौंकाने की आदत लग गई है – लगभग सभी शॉर्ट फिल्मों में आप ये ‘एंड ट्विस्ट’ देख सकते हैं – और ‘नीतिशस्त्र’ में ऐसा करना उसी ट्रेंड की खातिरदारी लगता है.

तापसी पन्नू लेकिन क्या दुर्लभ अभिनेत्री हैं! सच में. अक्षय कुमार जैसे बलिष्ठ एक्शन-हीरो का एकदम विलोम लेकिन शायद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे कमाल एक्शन-हीरोइन. इतनी रियल कि हीरोइन होने का तत्व मात्र भी उनमें नजर नहीं आता जब वे फाइट करती हैं और उस फाइट के लिए तैयार होने से पहले उस संशय को चेहरे पर ओढ़ लेती हैं जिसे इंडस्ट्री की तमाम हीरोइन पहली स्क्रिप्ट रीडिंग में ही ओढ़ने से मना कर देती होंगी. कि फाइट जीत पाऊंगी या नहीं जीत पाऊंगी. क्योंकि वो एक्शन-हीरोइन ही क्या जिसे पहले से मालूम न हो कि वो जीतने वाली है और इसलिए हर दम आत्मविश्वास को चेहरे पर बिखेरे चलती हो!

‘पिंक’ की नायिका अगर एक्शन अवतार में लौटती तो बिलकुल ‘नीतिशस्त्र’ की रोशनी बनकर लौटती. तापसी पन्नू के उसी ताप से दोबारा परिचित होने के लिए ‘नीतिशस्त्र’ देखी जानी चाहिए.