कर्नाटक में जेडीएस (जनता दल- धर्मनिरपेक्ष) के नेता एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए एक महीना बीत चुका है. बीते महीने की 23 तारीख को उन्होंने दूसरी बार राज्य की बागडोर संभाली थी. कुमारस्वामी दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं. इससे पहले भी वे गठबंधन सरकार के ही मुखिया थे. उन्होंने फरवरी 2006 में भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. अबकी उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई है.

हालांकि पिछली बार की तुलना में इस बार दो अंतर भी हैं. पहला- कुमारस्वामी की पहली सरकार उनके अपने फैसले के नतीजे में सामने आई थी. उस वक़्त उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा भाजपा के साथ जाने के फैसले में उनके साथ नहीं थे. जानकारों के मुताबिक इस बार कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का फैसला देवेगौड़ा का ही है. इस पर कुमारस्वामी ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह अमल किया है.

दूसरा अंतर यह कि 2006 में भाजपा से जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक शुरू के 20 महीने गुजरने के बाद मुख्यमंत्री बदला जाना था. कुमारस्वामी को भाजपा के बीएस येद्दियुरप्पा के लिए जगह खाली करनी थी. पर उन्होंने इससे इंकार कर दिया. इससे नाराज़ भाजपा ने जेडीएस सरकार से समर्थन वापस ले लिया. यह अक्टूबर 2007 की बात है. इसके बाद कुछ समय राष्ट्रपति शासन लगा रहा. फिर नवंबर में जैसे-तैसे दोनों दलों में सुलह-सफाई हुई. येद्दियुरप्पा ने 12 नवंबर 2007 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ली. मगर मामला ज़्यादा चला नहीं और जेडीएस ने तो येद्दियुरप्पा सरकार में शामिल हुई और न ही उसे समर्थन ही दिया. नतीज़ा एक हफ़्ते ही येद्दियुरप्पा सरकार गिर गई.

हालांकि इस पिछले अनुभव से सीख लेते हुए देवेगौड़ा ने कांग्रेस से यह हामी पहले ही भरवा ली है कि कुमारस्वामी पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री रहेंगे. लेकिन यहीं से यह सवाल भी उठता है कि इस बंदोबस्त के बावज़ूद क्या वाक़ई ऐसा हो पाएगा? कुमारस्वामी की सरकार बनने-बनाने और बनाए रखने की प्रक्रिया में बीते एक-सवा महीने से जो संकेत-संदेश निकलकर सामने आए हैं, उनसे तो ज़वाब सकारात्मक क़तई नहीं मिलता. मिसाल के तौर पर 19 मई को जब यह तय हो गया कि इस मर्तबा येद्दियुरप्पा सरकार नहीं बना पाएंगे और अगली सरकार जेडीएस-कांग्रेस की ही होगी तब भी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने में चार दिन लग गए.

इतना वक़्त तो कांग्रेस-जेडीएस को यह सहमति बनने में लग गया कि कुमारस्वामी के साथ एक उपमुख्यमंत्री की शपथ होगी या दो की. हालांकि भाव-ताव एक उपमुख्यमंत्री पर ठहरा और कांग्रेस के डॉक्टर जी परमेश्वरा को यह ज़िम्मेदारी मिली. फिर बारी सरकार बनाने की. इस प्रक्रिया में भी खूब माेलभाव चला. किसके कितने मंत्री होंगे. किस मंत्रालय को कौन संभालेगा. इन मसलों पर फैसला लेने में ही 13 दिन लग गए. अंत में कांग्रेस को 22 और जेडीएस को 12 मंत्री पद मिले लेकिन शपथ इनमें से 25 ले सके. कांग्रेस ने अपने आठ और जेडीएस ने तीन पद खाली छोड़े ताकि ‘असंतुष्ट’ सधे रहें पर वे भी मान नहीं रहे हैं. सो आकलन की शुरूआत यहीं से.

सरकार के साथी नाराज़ हैं

कुमारस्वामी मंत्रिमंडल के पहले विस्तार के बाद से ही जेडीएस और कांग्रेस दोनों में असंतोष के सुर बुलंद हुए हैं. कांग्रेस ने एचके पाटिल, एमबी पाटिल, रामलिंगा रेड्‌डी, आर राेशन बेग, शमनूर शिवशंकरप्पा, बीसी पाटिल, बीके संगमेश्वर, एमटीबी नागराज, सतीश जरकीहोली, एसआर पाटिल, दिनेश गुंडूराव और तनवीर सैत जैसे बड़े नेताओं को मंत्री नहीं बनाया. इसलिए इनके समर्थक लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. एमबी पाटिल तो लिंगायत समुदाय के बड़े नेताओं में शुमार होते हैं. पिछली सिद्धारमैया सरकार में वे जलसंसाधन मंत्री रहे हैं. और उनके बारे में तो ख़बर यहां तक आई है कि वे देर-सबेर जेडीएस में दोफाड़ करा सकते हैं.

ऐसे ही सतीश जरकीहोली कुरुबा समुदाय के नेता हैं जिससे पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ख़ुद ताल्लुक़ रखते हैं. सतीश के बारे में भी ख़बर यही आई है कि अगर अगले मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया तो वे कांग्रेस छोड़ सकते हैं. बताया जाता है कि इस असंतोष को थामने के लिए कांग्रेस ने रोटेशन की जुगत निकाली है. यानी वह हर दो साल में अपने मंत्री बदलेगी. इस बदलाव का आधार मंत्रियों का प्रदर्शन होगा. जो बेहतर काम नहीं करेंगे उन्हें हटाकर नए लोगों को मौका दिया जाएगा.

इस जुगत से कद्दावर नेताओं का असंतोष थमेगा या बढ़ेगा यह तो बाद की बात है पर फिलहाल आलम यह है कि मुख्यमंत्री कुमारस्वामी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से आग्रह करना पड़ा है कि वे राज्य कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को शांत करें. ख़बरों की मानें तो इस आग्रह की वज़ह यह है कि कर्नाटक कांग्रेस के तीन बड़े नेता- सिद्धारमैया, मल्लिकार्जुन खड़गे और केके वेणुगोपाल नाराज़ कांग्रेसियों को शांत करने में अब तक नाकाम रहे हैं. कुमारस्वामी ने ख़ुद भी कोशिश की थी लेकिन वे भी सफल नहीं हुए.

कुमारस्वामी तो अपनी ही पार्टी जेडीएस के असंतुष्टों को शांत करने की भी अभी मशक्क़त ही कर रहे हैं. मसलन- हफ़्ते भर के भीतर ही उन्हें जेडीएस दो मंत्रियों के विभाग बदलने पड़ गए. इनमें एक हैं- जीटी देवेगौड़ा जिन्होंने चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट के प्रतिष्ठापूर्ण मुकाबले में तब के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को हराया था. उन्हें उच्च शिक्षा मंत्रालय दिया गया था. लेकिन अपनी कम शैक्षणिक योग्यता के कारण उनकी इसमें दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए उन्हें सहकारिता मंत्रालय दे दिया गया. यह मंत्रालय पहले बंडेप्पा कासिमपुर संभाल रहे थे. उन्हें उच्च शिक्षा मंत्रालय दे दिया गया. साथ ही आबकारी विभाग भी. यानी शिक्षा नीति और शराब नीति दोनों कासिमपुर तय करेंगे.

यह मामला अभी ठीक से संभला भी नहीं था कि जेडीएस के एक पुराने और वरिष्ठ नेता बासवराज होरट्‌टी पार्टी से अलग हाेने की सोचने लगे हैं. बासवराज 35 साल से जेडीएस के साथ हैं. लेकिन फिलहाल इसलिए नाराज़ बताए जाते हैं कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें ‘उनके हिस्से का सम्मान’ नहीं दिया. बासवराज लिंगायत नेता और विधान परिषद के सदस्य हैं. उनके समर्थकों की तादाद भी काफी है.

विरोधी छींका टूटने के इंतज़ार में हैं

सरकार के साथियों में उमड़-घुमड़ रहे असंतोष की वज़ह से ही शायद विरोधी (भाजपा) छींका टूटने के इंतज़ार में हैं. लेकिन सिर्फ भाग्य से नहीं कोशिश से भी. कैसे, यह देखें. कर्नाटक कांग्रेस के एक दिग्गज नेता हैं डीके शिवकुमार. कई बार मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जता चुके हैं. अब तक बन नहीं पाए. बल्कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व के आदेश पर उन्हें अपने विरोधी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनवाने अहम भूमिका निभानी पड़ी. वह भी ऐसे जैसे कोई कड़वी गोली निगल रहे हों और यह बात इन्हीं शब्दों में उन्होंने स्वीकार भी की है. फिर जब सरकार बनी तो उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम उपमुख्यमंत्री पद तो उन्हें बतौर इनाम दिया ही जाएगा. लेकिन वह भी नहीं हुआ. इसीलिए बीच में उनकी नाराज़गी की भी ख़बरें आईं. हालांकि वे इन्हें लगातार ख़ारिज़ करते रहे. फिलहाल वे कुमारस्वामी सरकार में सिंचाई मंत्री हैं.

शिवकुमार धनी-मानी हैं. यानी धन-संपत्ति से तो समृद्ध हैं ही अपने वोक्कालिगा समुदाय में उनका जनाधार भी मज़बूत है. दूसरी तरफ़ भाजपा के पास इस हैसियत का कोई बड़ा वोक्कालिगा नेता नहीं है. पार्टी पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा को लाई थी. लेकिन वे ज़्यादा मददग़ार हो नहीं पाए क्योंकि उम्र के साथ उनका राजनैतिक करियर भी ढलान पर है. इसीलिए भाजपा हर तरह से इस कोशिश में है कि शिवकुमार को अपने पाले में ले आया जाए. इसका एक उदाहरण तब मिला जब येद्दियुरप्पा ने विधानसभा में शिवकुमार से सीधे कहा, ‘आप मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. लेकिन वहां (कांग्रेस में रहकर) कैसे बन पाएंगे. कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के लिए आप एक दिन पछताएंगे.’

सिर्फ यही नहीं ख़बरों की मानें तो शिवकुमार पर केंद्रीय एजेंसियों की जांच का दबाव भी बनाया जा रहा है. पहले ख़बर आ चुकी है कि आयकर विभाग के अधिकारी शिवकुमार को यह पेशकश कर चुके हैं कि उन्हें जांच से बचना है तो भाजपा का दामन थाम लें. अब तक कथित तौर पर की गई इस पेशकश को उन्होंने स्वीकार नहीं किया. सो अब ताज़ा ख़बर. आयकर विभाग ने उनके ख़िलाफ़ कर चोरी जैसे आरोपों के संबंध में अंतिम रिपोर्ट तैयार कर ली है. इसमें उन पर हवाला के जरिए लेन-देन के आरोप हैं. साथ ही कांग्रेस को काली कमाई से वित्तीय मदद देने के भी. जल्द ही उनके ख़िलाफ़ इन आरोपों के आधार पर मुक़दमा शुरू हो सकता है. हालांकि शिवकुमार इस दबाव में झुकेंगे या नहीं यह तो वक़्त ही बताएगा.

जानकारों के मुताबिक भाजपा नेतृत्व को उनके अलावा कांग्रेस-जेडीएस के असंतुष्टों से भी उम्मीद है. ख़ास तौर पर एमबी पाटिल और जरकीहोली जैसे नेताओं से. पार्टी को लगता है कि यही हालात रहे तो देर-सबेर ये असंतुष्ट उसके साथ आ मिलेंगे और उसकी सरकार बन जाएगी. संभवत: इसीलिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कह भी चुके हैं, ‘कांग्रेस और जेडीएस ने अगर अपने विधायकों को बंधक बनाकर नहीं रखा होता तो वे बहुमत साबित नहीं कर पाते.’

इसीलिए ‘सरकार’ ख़ुद आशंकित हैं

ऐसे और भी तमाम कारण हैं जिन्होंने ‘सरकार’ यानी ख़ुद मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी को भी आशंकित कर रखा है. मुख्यमंत्री बनने के दिन से लेकर आज तक एक महीने में कुमारस्वामी कई मर्तबा कह चुके हैं, ‘मैं इस तरह मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहता था. मैं जनता का मुख्यमंत्री नहीं हूं. कर्नाटक के 6.5 करोड़ लोगों की नहीं बल्कि कांग्रेस की कृपा पर निर्भर हूं. कांग्रेस नेतृत्व से अनुमति लिए बिना मैं कुछ नहीं कर सकता. कांग्रेस ने ही मुझे ज़ोर देकर मुख्यमंत्री बनाया.’

उनकी ये बातें उनके अब तक के तौर-तरीकों से भी ज़ाहिर होती हैं. मसलन- उनके मंत्रिमंडल की शपथ तभी हो पाई जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सभी नामों पर मुहर लगा दी. फिर जब बतौर वित्त मंत्री वे (कुमारस्वामी ने यह मंत्रालय अपने पास ही रखा है) राज्य का बजट दोबारा पेश करना और किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा करना चाहते थे तब भी पहले राहुल गांधी से इजाज़त ली. जब अनुमति मिली तभी इस दिशा में तैयारी शुरू हुई है.

इसके बावज़ूद वे कांग्रेस की तरफ़ से पूरी तरह आश्वस्त नहीं लगते. इसके भी कारण हैं. पहला तो यही कि जब कुमारस्वामी ने विधानसभा में बहुमत भी साबित नहीं किया था तभी कांग्रेस नेता और उन्हीं के डिप्टी यानी उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वरा ने कह दिया, ‘ यह अभी तय नहीं है कि हम जेडीएस को कब तक समर्थन देंगे.’ फिर जैसे-तैसे घोषणा हुई कि कुमारस्वामी को बतौर मुख्यमंत्री कांग्रेस पांच साल तक समर्थन देगी और 2019 का चुनाव भी मिलकर लड़ेगी. लेकिन इसमें भी पेंच यह कि कांग्रेस के मौज़ूदा सांसद इस घोषणा से फ़िक्रमंद बताए जाते हैं.

शायद यही वे सब कारण हैं कि कुमारस्वामी अब यह भी कहने लगे हैं, ‘अभी 2019 तक तो कोई मुझे छू भी नहीं सकता. कम से कम लोक सभा के चुनाव तक तो बिल्कुल नहीं.’ साथ ही ऐसा कुछ करने भी लगे हैं जिससे उनकी भविष्य की राह का भी संकेत मिलता है. मसलन- कुछ समय जब वे दिल्ली गए तो राहुल गांधी से पहले अरविंद केजरीवाल से मिलने पहुंच गए. केजरीवाल दिल्ली के अफसरों की कथित हड़ताल के विरोध में उपराज्यपाल के दफ़्तर में धरना दे रहे थे. कांग्रेस इस धरने के विरोध में थी. लेकिन ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, पिनराई विजयन के साथ कुमारस्वामी भी उनके समर्थन में खड़े दिखाई दिए. तो क्या इसका मतलब यह है कि वे ग़ैरभाजपा-ग़ैरकांग्रेस मोर्चा में जा रहे हैं?

बहरहाल, ऐसे सवालों का जवाब तो समय के साथ ही सामने आ पाएगा. फिलहाल ताजा खबर यह है कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी और दोबारा राज्य का बजट पेश किए जाने के मसले पर कुमारस्वामी और कांग्रेस-जेडीएस (जनता दल-धर्मनिरपेक्ष) गठबंधन की समन्वय समिति के मुखिया सिद्धारमैया के बीच टकराव की स्थिति बन गई है. पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया नहीं चाहते कि कुमारस्वामी सरकार नया बजट पेश करे. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से हरी झंडी मिलने के बाद कुमारस्वामी पांच जुलाई को राज्य का नया बजट पेश करने की तैयारी कर रहे हैं. राज्य विधानसभा का सत्र तीन जुलाई से शुरू हो रहा है.

उधर, भारतीय जनता पार्टी में भी हलचल है. द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा सोमवार को अचानक अहमदाबाद रवाना हो गए. बताया जाता है कि दोनों पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिलने अहमदाबाद गए हैं और उन्होंने शाह से राज्य में सरकार बनाने की एक और कोशिश करने की इजाज़त मांगी है.