अनन्या पाण्डेय इंजीनियरिंग की छात्रा हैं और भोपाल में रहती हैं.


यह किस्सा तब का है जब मैं अपने होमटाउन रीवा (मध्य प्रदेश) में स्कूलिंग कर रही थी और सेकंड क्लास में पढ़ती थी. घरवालों ने स्कूल आने-जाने के लिए ऑटो लगवा दिया था. ऑटो में कई बच्चे मेरे साथ स्कूल आते-जाते थे. ऑटो वाले उस ग्रुप में अधिकतर मेरे सीनियर यानी भैया-दीदी ही थे. तब होता यह था कि ऑटोवाले मंगल चाचा हमारे अलावा दूसरे स्कूल के बच्चों को भी लाते-ले जाते थे. हालांकि दोनों स्कूलों की टाइमिंग में लगभग एक घंटे का अंतर था, फिर भी अक्सर ऐसा होता कि मंगल चाचा हमें लेने आने में जरा लेट हो जाते. इसलिए छुट्टी के बाद भी हम लगभग आधे-पौन घंटे स्कूल में ही रहते. यह वक्त स्कूल में बिताने की वजह से ही मेरी अपने सीनियर दीदी-भैया से अच्छी दोस्ती हो गई थी. उस ग्रुप में सबसे छोटी और दुबली-पतली गुड़िया सी होने के कारण मुझे सबसे ज्यादा अटेंशन मिलती थी. मुझे भी इसमें मजा आता था और इसके अलावा भी मैं क्लास में इसका फायदा उठाती क्योंकि तब क्लासमेट्स के बीच सीनियर्स के टच में रहने का अपना एक अलग स्वैग था.

फिर जैसा कि अक्सर होता है, हर कॉन्वेंट या मिशनरी स्कूल वाले को कभी न कभी अपने स्कूल में किसी सिस्टर या नन की भटकती आत्मा के बारे में सुनने को मिलता ही है (पता नहीं क्यों हर बार औरत की ही आत्मा भटकती है, आदमी की नहीं!), हमें भी सुनने को मिला. बताया गया कि स्कूल के बगल वाले खंडहर में सिस्टर की आत्मा को भटकते देखा गया है. वैसे तो उस खंडहर में कोई नहीं जाता था, बस सड़क किनारे होने के चलते मजबूरी में कुछ लोग वहां पेशाब जरूर कर आते थे. हमें बताया गया था कि दिन में तो सिस्टर (आत्मा) कुछ नहीं करतीं, लेकिन रात में जाने वाला वहां से वापस नहीं आता. कुछ अपने लॉजिकल दिमाग के चलते और कुछ डर के मारे मैंने इन बातों को सुनकर भी अनसुना कर दिया था.

लेकिन एक दिन जब हम छुट्टी के बाद मंगल चाचा का इंतजार कर रहे थे तो मेरे सीनियर्स को इस बात की सनक सवार हुई कि क्यों न आज इस आत्मा के रहस्य का पर्दाफाश किया जाए. बचपन में ‘आहट’ और ‘श्श्श.. कोई है’ देख-देखकर हम सबके मन में भूत देखने की एक अलग ही जिज्ञासा थी. स्कूल तब तक खाली हो चुका था और बड़े तय कर चुके थे कि आज खंडहर के अंदर जाकर देखेंगे कि माजरा क्या है. सबसे छोटा होने के बावजूद मुझ पर भी यह डिसीजन थोपा गया. मेरे पास कोई और रास्ता था भी नहीं, गेट पर अकेले खड़े रहने से बेहतर यही लगा कि उनके साथ जाकर रोमांच का मजा लिया जाए.

फिर हम निकल पड़े. मन में ‘पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर’ वाला फील अपनी चरम सीमा पर था. लेकिन मेरे उन सीनियर दोस्तों में भी ज्यादा हिम्मत तो थी नहीं इसलिए कुछ देर यही डिस्कशन चलता रहा कि कहां से हमला किया जाए. तभी उनमें से सबसे इंटेलीजेंट शुभम भैया ने कहा कि मेनगेट से ना जाकर पीछे वाली खिड़की से जाते हैं. हमें यह विचार सही लगा क्योंकि हम मान रहे थे कि हो सकता है दरवाजे से जाने पर भूत-सिस्टर की नजर हम पर पड़ने के ज्यादा चांस हों.

इसके बाद सब लोगों ने अपने-अपने हाथों में पत्थर उठाए और मैंने भी सीनियरों को देखकर अपनी नन्ही मुट्ठियों में उनसे बड़े पत्थर उठा लिए. पत्थर लेकर हम खंडहर की ओर बढ़े और खिड़की के करीब पहुंचकर सबने बारी-बारी से पत्थर अंदर की ओर फेंकने शुरू कर दिए ताकि वहां कोई हो तो हमले से घबराकर बाहर आ जाए. पत्थरमार कार्यक्रम के बाद अगली कार्रवाई हुई जिसमें हममें से सबसे लंबे सिद्धार्थ भैया को कहा गया कि वे खिड़की से अंदर झांककर बताएं कि सिस्टर है या नहीं?

सिद्दार्थ को मस्ती सूझी और उन्होंने कहा कि सिस्टर की जली हुई बॉडी सामने पड़ी है और बगल की दीवार पर खून से लिखा है - यहां जो भी आएगा, मारा जाएगा. ये सुनते ही सारी इन्वेस्टीगेशन धरी की धरी रह गयी और हम सब अपना बैग लेकर दौड़ पड़े मानो बैल पीछे पड़ा हो. ये सब बातें तब मेरी समझ के परे थीं और उस पल किसी ने बताना भी ज़रूरी ना समझा, बस सबको भागते देख मुझे भी भागना ही सही जान पड़ा. सो मैं भी भागी, लेकिन मैं छोटी थी और बैग बहुत भारी. आधी दूरी तक सबकुछ संभालकर दौड़ते-दौड़ते शायद शू-लेस पैर में अटकने के कारण मैं रास्ते में गिर गई. न कुछ, सुना न समझा बस वहीं भूत-भूत बोलकर सड़क पर रोने लगी. तब मुझ में इतनी भी हिम्मत न थी कि अपनी बची हुई जान संभाल के भाग सकूं!

तभी सामने से एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया. लगा मानो इशारे करके मुझे बुला रहा हो. आंखों के सामने आंसुओं की ऐसी झड़ी लगी कि सब धुंधला सा दिख रहा था. मुझे और डर लगा, लेकिन तभी वह आदमी और पास आया और मुझे गोद में उठाकर मेरा बस्ता पकड़ा तब समझ आया कि ये मंगल चाचा हैं. अपने ग्रुप के पास पहुंची तो सब एकटक मुझे देखने लगे. मैं अभी भी कुछ कहने सुनने की स्थिति में नहीं थी. सबके चेहरे देखकर लग रहा था कि सिद्धार्थ भैया ने सबको बता दिया है कि उन्होंने मज़ाक किया था. भैया ने मुझे कुछ नहीं कहा और न माफ़ी मांगी, शायद इससे उनका ईगो हर्ट हो जाता लेकिन उन्होंने मुझे एक इक्लेयर्स दी और अपने बगल में बैठा लिया. टॉफी पाते ही मैं सब भूल गई, लेकिन उस दिन इतना ज़रूर समझ लिया कि किसी के भी कहने पर किसी अंजान जगह नहीं जाना है. और आज जब, लगभग पंद्रह साल बाद यह हैप्पनिंग किस्सा याद करती हूं तो मुझे बहुत मज़ा आता है.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)