क्या भारतीय टेलिकॉम सेक्टर अब स्थिरता की तरफ बढ़ रहा है? विलय और अधिग्रहण की कई कवायदों के बाद इस सवाल पर बहस तेज हो गई है. हाल ही में दूरसंचार सचिव अरुणा सुंदरराजन का बयान आया कि वोडाफ़ोन और आइडिया सेलुलर के बीच होने वाले विलय से टेलिकॉम सेक्टर में स्थिरता आयेगी. वोडाफ़ोन और आइडिया सेलुलर ने इस विलय पर पिछले साल हामी भरी थी जिसे तेज़ी से मूर्त रूप दिया जा रहा है. विलय के बाद नयी कंपनी को वोडाफ़ोन आइडिया लिमिटेड कहा जाएगा. ऐसा होते ही वोडाफ़ोन आइडिया लिमिटेड एयरटेल को पछाड़ कर देश की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी बन जाएगी. तीसरे नंबर पर रिलायंस जिओ होगी , फिर बीएसएनएल और आखिर में एमटीएनएल. वोडाफ़ोन आइडिया लिमिटेड के पास संयुक्त रूप से 42, एयरटेल के पास 24.85 और जिओ के पास लगभग 14 फीसदी की बाज़ार हिस्सेदारी होगी.

पिछले एक या डेढ़ साल में टेलिकॉम सेक्टर अभूतपूर्व रूप से बदल गया है. दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के आंकड़ों पर जाएं तो जहां पहले 80 फीसदी कंपनियों की कमाई कालिंग के ज़रिये होती थी वहीं अब डाटा मुख्य आधार बन गया है. मोबाइल ग्राहकों की संख्या एक अरब 10 करोड़ पार कर गयी है और एक्टिव बेस (ऐसे ग्राहकों की संख्या जो एक महीने में कम से कम एक बार सक्रिय होते हैं) की बात करें तो लगभग एक अरब है.

लेकिन इस अभूतपूर्व बदलाव का मतलब यह नहीं है कि सब कुछ ठीक है. जहां एक समय पर हर सर्कल में अमूमन सात-आठ कंपनियां भिड़ रही थीं वहां अब महज़ चार कंपनियां रह गई हैं. रिलायंस कम्युनिकेशंस, एयरसेल, सिस्टेमा श्याम (एमटीएस) और वीडियोकॉन जैसी कंपनियों पर ताले लग चुके हैं. ग्राहकों की संख्या में बढ़ोतरी तो हो रही है पर दूरसंचार मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट बताती है कि 2017-18 में इस क्षेत्र के सकल राजस्व में लगभग नौ फीसदी की गिरावट गई है. यह गिरकर 2.5 लाख करोड़ रह गया है. पिछले साल, यानी 2016-17 में यह आंकड़ा क़रीब 2.8 लाख करोड़ था. ऐसे में दूरसंचार सचिव का स्थिरता वाला बयान दूर की कौड़ी लगता है.

कई यह भी कह रहे हैं कि इस बाजार में आई अस्थिरता को थामने के लिए सरकार ने भी पर्याप्त प्रयास नहीं किया. किसी भी सरकार से इस बात की उम्मीद की जाती है कि वह व्यापार की शर्तों को सरल बनाये और प्रतिस्पर्धा का मैदान सबके लिए एक जैसा रखे. लेकिन कई जानकारों के मुताबिक दूरसंचार मंत्रालय यह सुनिश्चित कर रहा है कि अमुक कंपनी पहले नंबर पर रहे और फलां कंपनी का दूसरा स्थान हो. उनकी दलील है कि जब लाइसेंस देने की शर्तें ही समान नहीं थीं तो बाकी क्या बात की जाए. कुछ समय पहले जब आईयूसी (वह शुल्क जो किसी ऑपरेटर को दूसरे का नेटवर्क इस्तेमाल करने पर देना होता है) की दरें कम की गईं तो मंत्रालय पर किसी एक ऑपरेटर को फ़ायदा देने के आरोप लगे थे.

पिछले साल स्टेट बैंक की तत्कालीन मुखिया अरुंधती भट्टाचार्य ने अरुणा सुंदरराजन को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने बताया था कि नए खिलाड़ियों के आने के बाद से टेलिकॉम कंपनियों की ख़राब हो चुकी हालत के चलते बैंक की बैलेंस शीट्स पर दबाव आ गया है. जाहिर है नए खिलाड़ियों से उनका मतलब रिलायंस जिओ से था. उन्होंने लिखा था, ‘कुछ टेलिकॉम कंपनियां इस दबाव को शायद न झेल पाएं. सब टेलिकॉम कंपनियों पर बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों का करीब चार लाख करोड़ रुपये क़र्ज़ है.’ उन्होंने आगे लिखा था कि इस चार लाख करोड़ रुपये के ब्याज़ की भरपाई और मूल रकम की वसूली पर प्रश्न चिन्ह लग गया है. आज कई सारे बैंकों पर एनपीए का दबाव टेलिकॉम कंपनियों के लिए हुए कर्ज़ की वजह से भी है. इसकी वसूली की दिशा में अगर कुछ काम हुआ भी है, तो बेहद कम.

बंद हो चुकीं कंपनियों जैसे रिलायंस कम्युनिकेशंस और एयरसेल ने अपने देनदारों और वितरकों के हिसाब अभी तक नहीं किये हैं. रातों-रात बंद हुई कंपनियों के खातों में वितरकों ने रिचार्ज लेने के लिए रुपये डाले थे. वे सुबह उठे तो कंपनी बंद हो चुकी थी. उनका पैसा अभी तक वापस नहीं किया गया है. उधर, जिओ की वजह से मचे हाहाकार से दसियों हजार कर्मचारी बेरोज़गार हो गए थे. जानकार बताते हैं वोडाफ़ोन और आइडिया के विलय से इन दोनों कंपनियों के लगभग 5000 कर्मचारियों की छंटनी हो जाएगी. इन सभी समस्याओं को लेकर सरकार का रवैया लीपापोती जैसा दिखता है. पिछले महीने अरुणा सुंदरराजन ने कहा था कि दूरसंचार विभाग टेलिकॉम कंपनियों के बंद होने से निकाले गए निचले तबके के कर्मचारियों को दोबारा नौकरी दिलाने का प्रयास कर रहा है. पर इस दिशा में अब तक कुछ नहीं हुआ है. पिछले दिनों ख़बर आई थी कि बंद हो चुकी एयरसेल के कर्मचारी मुश्किल हालात में हैं और एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं.

फिर वहीं पर आते हैं जहां से हमने बात शुरू की थी. यानी वोडाफ़ोन और आइडिया के विलय पर. यह कवायद कोई रणनीतिक कदम नहीं है बल्कि मज़बूरी में लिया गया निर्णय है. इसका कारण यह है कि जिओ के प्राइस वॉर ने इन दोनों कंपनियों की ही नहीं बल्कि बाजार की अगुवा एयरटेल की भी बैलेंस शीट बिगाड़ कर रख दी है. पिछली कई तिमाहियों के परिणाम इस बात के गवाह हैं कि जिओ के अलावा अन्य कंपनियों का मुनाफ़ा लगातार गिरता जा रहा है. वोडाफ़ोन और आइडिया, दोनों पर कुल मिलाकर 1.25 लाख करोड़ का कर्ज़ है. लिहाज़ा, दोनों ने साझा लड़ाई का निर्णय लिया है.

हांगकांग स्थित सैनफोर्ड सी बर्नस्टीन निवेश संबंधी विषयों पर शोध करने वाली चर्चित फर्म है. इसकी विश्लेषक क्रिस लेन ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि जिस तरह के हालात आज भारत के टेलिकॉम बाज़ार में हैं उससे तो यही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कई कंपनियां बंद हो जायेंगी या फिर विलय कर लेंगी. जिओ ने अभी भी कोई संकेत नहीं दिए हैं कि भविष्य में वह कॉल या डेटा की दरें गिराएगी. उसका मकसद बाज़ार पर वर्चस्व कायम करने का है. ऐसे में तीसरे नंबर का दर्ज़ा मुकेश अंबानी को बेचैन करेगा और वे जल्द से जल्द उस खाई को पाटने की कोशिश करेंगे जो जिओ और बाकी प्रतिस्पर्धियों के बीच है.

कुल मिलाकर समर शेष है इसलिए स्थिरता दूर की कौड़ी जान पड़ती है. जानकारों के मुताबिक आखिर में स्थिरता आएगी यह तय है, पर कितने नुकसान के बाद यह सोचने वाली बात है.