निर्देशक : पा. रंजीत

कलाकार : रजनीकांत, नाना पाटेकर, ईश्वरी राव, हुमा कुरैशी, अंजली पाटिल,मणिकंदन,पंकज त्रिपाठी, रवि काले, सयाजी शिंदे

रेटिंग : 3/5

‘काला’ की पॉलिटिक्स बेहद दिलचस्प है. आंबेडकरवादी और नास्तिक निर्देशक पा. रंजीत अपनी राजनीतिक विचारधारा को फिल्मों में पिरोने के लिए जाने जाते रहे हैं (‘कबाली’, ‘मद्रास’), लेकिन इस बार जिस खूबसूरती के साथ उन्होंने अन्याय और सामाजिक ऊंच-नीच की मुखालफत कभी प्रतीकों से, कभी काले व नीले रंगों के प्रयोग से, और कभी एक खास पौराणिक कथा को सर के बल उलटकर की है (ऐसा एक बार मणिरत्नम भी कर चुके हैं), वो काबिलेतारीफ है. खास बात है कि ऐसा करते वक्त उनका पॉलिटिकल डिस्कोर्स ठूंसा हुआ नहीं लगता, बल्कि लंबी और इधर-उधर फैली होने के बावजूद मनोरंजक इस फिल्म को एक ठोस आधार देता है.

यह भी कहना जरूरी है कि ‘काला’ रजनीकांत की राजनीति का अक्स नहीं है, जैसा कि कई लोग कह रहे हैं कि उन्हें इससे राजनीतिक फायदा मिलेगा. यह पूरी तरह पा. रंजीत की समझ से उपजी जागरूक फिल्म है जिसमें रजनीकांत ने कई बरस बाद अच्छा काम किया है.

इस फिल्म की कहानी धारावी में रहने वाले एक प्रभावशाली तमिलभाषी व्यक्ति काला करिकालन की है जो धारावी की जमीन को व्यावसायिक ताकतों के हाथों में जाने देना नहीं चाहता. पुलिस-नेताओं-कॉर्पोरेट के नेक्सस से जन्मी ये पूंजीवादी ताकतें धारावी के गरीब लोगों को वहां से हटाकर चंद खड़ी इमारतों में ठूंस देना चाहती हैं (वर्टिकल गेटो) और धारावी की सोने के भाव वाली जमीन का अंतरराष्ट्रीय स्तर का विकास करना चाहती हैं.

कहने को यह कहानी बेहद साधारण है. ‘गरीबों का मसीहा’ बनने वाले सुपरस्टार रजनीकांत की ही कई पुरानी फिल्मों में हम ऐसी कहानियां देख चुके हैं, लेकिन इस बार अंतर ये है कि राजनीतिक रूप से सचेत होने के अलावा इसमें ‘एक्टर’ रजनीकांत देखने को मिलते हैं, और फिल्म उनको सेलिब्रेट करने की जगह सधे हुए निर्देशन के साथ अपनी कहानी को सेलिब्रेट करती है. (यानी पा.रंजीत और रजनीकांत की पिछली फिल्म ‘कबाली’ में किए का एकदम विलोम काम करती है.)

इसीलिए ‘काला’ में अनेक किरदार होने के बावजूद कई सारे अच्छे से परिभाषित हैं. रजनी का एक बड़ा परिवार है जिन्हें सिर्फ काला के आजू-बाजू खड़े होने का काम नहीं मिलता बल्कि सभी की अपनी सोच है जिससे ‘जमीन की राजनीति’ पर आधारित यह कहानी आगे बढ़ती है. काला की जिंदादिल पत्नी सेल्वी के रोल में ईश्वरी राव खासा प्रभावित करती हैं और उनकी पुरानी प्रेयसी बनी हुमा कुरैशी फर्स्ट हाफ तक तो लुभाती हैं – वरुण ग्रोवर के लिखे गाने ‘सजना’ के फिल्मांकन में दोनों के बीच की रुमानियत खासी पसंद आती है – लेकिन फिल्म के दूसरे भाग में उनके किरदार को आउट ऑफ फोकस कर दिया जाता है. अक्सर होता भी है कि जिन फिल्मों में ढेर किरदार होते हैं उनमें हर किरदार को एक मुकम्मल अंत देना बहुत मुश्किल होता है और ‘काला’ में भी ऐसा कुछ किरदारों के साथ होता है.

जिनके साथ नहीं हो सकता, उनमें नाना पाटेकर सबसे प्रभावशाली काम करते हैं. उनका भी यह हालिया समय का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है और रजनी व उनके बीच के टकराव वाले दृश्यों में वे अभिनय का गगन छू लेते हैं. काले रंग पर लांछन लगाने और काली चमड़ी वालों को कमतर दिखाने वाले एक दृश्य में तो आपको अंदर तक हिलाकर रख देते हैं और शिव सेना से प्रभावित पार्टी के क्रूर नेता हरि दादा बनकर फिल्म को वो खलनायक देते हैं जिस पर क्लाइमेक्स में जब नायक विजय पाता है तो उसका नायकत्व देखकर आप अल्हादित होते हैं. फिल्म में ‘डिजिटल धारावी’ व ‘क्लीन एंड प्योर कंट्री’ का नारा लगाने वाले नाना का मुंह फाड़े हंसने वाला एक पोस्टर पूरे शहर में लगा हुआ है, जिसकी याद फिल्म देखने के बाद आपके साथ घर लौटकर जरूर आने वाली है.

‘काला’ में कमियां भी कम नहीं हैं. एक तो पौने तीन घंटे की यह फिल्म अपनी लंबाई को जस्टीफाई नहीं करती. भले ही पा. रंजीत की ख्वाहिश इसे तीन घंटे लंबी ‘द गॉडफादर’ (1972) की तरह बनाने की थी, और इसलिए इसमें रजनी और उनके परिवार के बीच के डायनामिक्स को लंबा वक्त दिया गया, ठीक ‘द गॉडफादर’ के इतावली माफिया डॉन और उसके परिवार की तरह, लेकिन तकरीबन सारे ही तरह के डायनामिक्स पहले से देखे हुए हैं. ये उबासी भले नहीं पैदा करते लेकिन चुस्त एडीटिंग से कई ऐसे दृश्यों को हटाकर फिल्म बेहतर की जा सकती थी. फिल्म में बेवजह के गाने भी बहुत हैं, और चार बाल सफेद कर प्रौढ़ दिखने की कोशिश करने वालीं हुमा कुरैशी का ट्रैक भी बहुत लंबा. बहुत कुछ कहने की चाहत रखने वाले पा.रंजीत सब कुछ सलीके से भी नहीं कह पाते और काफी कुछ इधर-उधर बिखरा रहता है. पटकथा भी नायाब नहीं है, सब कुछ पहले हमने देख रखा है, इसलिए भी कमियां बराबर नोटिस में आती रहती हैं.

रजनीकांत जरूर, अपने अभिनय के दम पर इन कमियों के पार देखने पर मजबूर कर देते हैं. (भूलने पर नहीं.) उनको लेकर पिछले कुछ वर्षों से जो शिकायतें आम रही हैं – जिन पर हमने ‘कबाली’ के वक्त विस्तार से लिखा भी – उनमें से कई ‘काला’ दूर करती है. बहुत दिनों बाद वे एक ‘यथार्थवादी’ मसाला फिल्म में नजर आए हैं और अपनी ढलती उम्र को दर्शाने वाले जमीनी किरदार में सहजता से डूबे हैं. उनको चिरयुवा दिखाने के लिए हर फिल्म में गढ़े जाने वाले उनके युवा वक्त के फ्लैशबैक सीन भी इस बार एनीमेशन से रचकर फटाफट निपटा दिए गए हैं और ये देखकर बहुत अच्छा लगता है कि यहां वे फिल्म से ऊपर खुद को नहीं रखते.

यहां उनकी स्टाइल जरूर बरकरार है, लेकिन वो कभी भी अतिश्योक्ति के रथ पर बैठकर धारावी के चक्कर नहीं लगाती. हाथ की उंगलियां घुमाने का पुराना पड़ चुका तरीका भूलकर (ज्यादातर!) रजनी इस बार मूंछों और दाढ़ी से खेले हैं, उन पर फबने वाले काले कुर्ते व लुंगी से स्टाइल पैदा की है, और काले चश्मे को बिना हाथ से घुमाए सीधे-सीधे पहना भी है!

दो-तीन रजनी मार्का शानदार एक्शन-दृश्य भी फिल्म में हैं, लेकिन उनके इतर कुछ और भी मौकों पर जब आप उनकी उम्मीद करते हैं तो वो आपको नहीं मिलते. ये कमाल बात है, कि रजनी थोड़े कम रजनी बनकर काला में नजर आए हैं. शुरुआती सीन में पहली ही बॉल पर आउट होने से लेकर बाइक पर सवार एक सीन में उनका ‘सुपरस्टार रजनी’ वाला रूप नहीं नजर आना खासतौर पर भाता है. चेहरे पर कई सारे इमोशन्स वे सहजता से धारण करते हैं जैसा कि उनके करियर की शुरुआती फिल्मों में नजर आता था और उनकी लंबी टेढी मुस्कान मुंबई के पुराने दो तमिल डॉन (हाजी मस्तान के वक्त के वरदराजन और नादर) से प्रेरित उनके किरदार पर खूब फबती है. वे अपने घर के बरामदे में प्लास्टिक कुर्सी पर बैठकर सिर्फ दुश्मनों को नाकों चने चबाने पर मजबूर नहीं करते बल्कि बच्चों के साथ खेलते और पत्नी से नोक झोंक करते वक्त भी आपका दिल जीतते हैं.

सौ तारीफों की एक तारीफ, ‘काला’ में ‘सुपरस्टार’ रजनीकांत कम और पा. रंजीत की वजह से ‘एक्टर’ रजनीकांत ज्यादा नजर आते हैं. ऐसी दुर्लभ फिल्म को नहीं देखना आपके लिए कतई मुनासिब न होगा!