2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के कुछ समय बाद ही मोदी के सबसे विश्वस्त माने जाने वाले अमित शाह को पार्टी की कमान सौंप दी गई थी. इसका संकेत स्पष्ट था कि पार्टी और सरकार में शक्ति का केंद्र एक ही होगा. अगर कोई और अध्यक्ष होता तो वह प्रधानमंत्री के अलावा एक और शक्ति केंद्र होता. लेकिन अमित शाह के अध्यक्ष बनने से यह स्पष्ट हो गया कि अब सरकार भी नरेंद्र मोदी के हाथ में है और पार्टी भी.

इसके बाद से अमित शाह ने एक कड़क पार्टी अध्यक्ष की छवि बनाई. वे जमीनी स्तर पर हर राज्य के चुनावों में जाकर परिश्रम करते दिखे. लेकिन उन्होंने यह सुनिश्चित भी किया कि पार्टी में कोई और सत्ता केंद्र न उभरे. उनकी कार्यशैली से यह संदेश गया कि अमित शाह के निर्णय के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब नरेंद्र मोदी का विरोध करना है. इसलिए टिकटों के बंटवारे से लेकर अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों के चयन और केंद्र में कौन मंत्री रहेगा और कौन नहीं, यह सब अमित शाह तय करते नजर आने लगे. कुल मिलाकर पार्टी में स्थिति यह बनी कि अमित शाह जो तय कर दें, वह अंतिम निर्णय है.

पार्टी के एक पदाधिकारी इस बारे में बात करने पर बताते हैं, ‘सामूहिकता से निर्णय लेने की बात तो होती है लेकिन, अधिकांश मामलों में अंतिम निर्णय लेने के लिए अमित शाह को अधिकृत कर दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर जब भी भाजपा किसी राज्य में चुनाव जीतती है तो संसदीय दल की बैठक बुलाई जाती है ताकि उस प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री का नाम तय किया जा सके. लेकिन संसदीय दल की बैठक में आम तौर पर यह होता है कि अमित शाह को इस बारे में निर्णय लेने के लिए अधिकृत कर दिया जाता है और बैठक समाप्त हो जाती है. इसके बाद अमित शाह मुख्यमंत्री चुनते हैं. आम तौर पर पार्टी के अंदर यह माना जाता है कि वे यह निर्णय प्रधानमंत्री की रजामंदी से लेते हैं.’

भाजपा के कुछ नेता इसे दबी जुबान में अमित शाह की निरंकुशता भी कहते हैं. इक्का-दुक्का नेताओं ने इस बारे में आवाज उठाने की कोशिश भी की. जब भाजपा 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव बुरी तरह से हार गई थी तो उसके बाद बेगूसराय के सांसद भोला सिंह ने पार्टी अध्यक्ष की कार्यशैली पर सवाल उठाया था. लेकिन पार्टी में उन्हें कोई समर्थन नहीं मिला और वे खुद हाशिये पर चले गए.

अमित शाह की कार्यशैली के बारे में बिहार के ही एक और भाजपा सांसद कहते हैं, ‘अमित शाह को लगता है कि वे पूरे देश की राजनीति की जमीनी बारीकियों को समझते हैं. उन्हें यह भी लगता है कि दूसरे दलों के जीतने वाले नेताओं को तोड़कर लाने और उन्हें भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ाने से भाजपा की प्रदेश में सरकार बन जाएगी. लेकिन उनका यह प्रयोग बार-बार नाकाम हो रहा है. वे स्थानीय नेताओं की राय को कोई खास तवज्जो नहीं देते हैं. इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ता है. इसके बावजूद उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता.’

लेकिन अब पार्टी के अंदर यह कानाफूसी चलने लगी है कि अमित शाह को अब अपनी इस छवि से बाहर निकलकर और सबको साथ लेकर चलने वाली कार्यशैली अपनाना होगा. इसकी कई वजहें बताई जा रही हैं. एक वजह तो यह बताई जा रही है कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश में सारी विपक्षी पार्टियां गोलबंद हो गई हैं उसमें भाजपा के लिए इस प्रदेश से 2014 वाला प्रदर्शन दोहरा पाना असंभव जैसा हो गया है. इसका संकेत हाल ही में उत्तर प्रदेश में तीन लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजों से मिल रहा है. ये तीनों सीटें भाजपा के पास हुआ करती थीं, लेकिन उपचुनाव में संयुक्त विपक्ष ने इन्हें छीन लिया.

दूसरी वजह यह बताई जा रही है कि विपक्ष की गोलबंदी को देखते हुए भाजपा के सहयोगी दलों ने भी भाजपा पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है. चंद्रबाबू नायडू तो भाजपा का साथ छोड़कर अलग हो ही गए और शिव सेना, लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता दल जैसी पार्टियां किसी ओर जाएंगी, इस बारे में अभी पक्के तौर पर पार्टी में कोई कुछ नहीं बता पा रहा. यही वजह है कि अमित शाह आजकल सहयोगी दलों के नेताओं से मिल रहे हैं. ऐसे में अब पार्टी के उन नेताओं को जिनकी प्रदेश में अपनी राजनीतिक हैसियत है और जिनके साथ जनसमर्थन है, लगता है कि अब अमित शाह के लिए उन्हें नाराज करके चलना मुश्किल हो गया है.

इस बारे में पार्टी के एक नेता बताते हैं, ‘जो माहौल बन रहा है, उसमें यह बात तो चल पड़ी है कि शायद भाजपा को अपने बूते स्पष्ट बहुमत न मिले. ऐसे में सहयोगियों पर उसकी निर्भरता बढ़ेगी. इस परिस्थिति में पार्टी के अंदर भी जो क्षत्रप हैं, उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. क्योंकि अगर इन लोगों ने अगले लोकसभा चुनावों में मन से साथ नहीं दिया तो भाजपा की सीटें और कम हो सकती हैं. ऐसे में अमित शाह के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे पार्टी के दूसरे प्रमुख नेताओं को भी तवज्जो दें और टिकटों के बंटवारे से लेकर अन्य मामलों में उनकी बात भी न सिर्फ सुनें बल्कि जहां तक संभव है, उसे मानें भी.’

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को अमित शाह की कार्यशैली में नरमी का संकेत सहयोगी दलों से लगातार उनके द्वारा की जा रही बैठकों से भी मिल रहा है. इन बैठकों के बारे में जो जानकारियां आ रही हैं, उनमें यही बताया जा रहा है कि बैठकों के दौरान अमित शाह सहयोगी दलों की बातों को बहुत नरमी से सुन रहे हैं. अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल के साथ बैठक के बाद अमित शाह की जो तस्वीर आई, उसमें वे बादल के सामने हाथ जोड़े और सिर झुकाए खड़े दिख रहे हैं. आम तौर पर अमित शाह की ऐसी तस्वीरें सामने नहीं आतीं.