फ्रेंच कवि इव बोनफुआ ने कहा था कि कविता स्वप्न की बहन होती है. ये स्वप्न कई बार सौभाग्य से सिर्फ़ भाषा तक यानी कविता की काया तक सीमित नहीं रहते. वे उससे बाहर भी अपनी जगह बनाते हैं. यह जगह कल्पना में कम, सच्चाई में अधिक होती है. आज भी संसार में ऐसे कवि हैं जो अपने स्वप्नों को कविता की सीमाओं के बाहर ले जाने की कोशिश में लगे हैं. उनकी संख्‍या दुर्भाग्य से कम है. ओमेरो एरिजीस ऐसे ही मैक्सिकन कवि हैं, जो लगभग अाधी सदी से प्रकृति को बचाने के एक सुनियोजित-सुविचारित अभियान में लगे हैं. 1989 में वे भारत भवन में आयोजित विश्व कविता समारोह में आये थे. तब भी उनकी बातचीत पर्यावरण पर मंडरा रहे संकटों पर एकाग्र थी. स्वयं भारत में ऐसी कवि-सक्रियता के उदाहरण बहुत कम हैं. हिंदी में कोई याद नहीं आता. एक मित्र से जब मैंने इस अभाव का ज़िक्र किया तो उन्होंने मज़ाक बनाते हुए कहा कि हिंदी में कवि कविता बचाने में लगे हैं, पर्यावरण बचाने के लिए उनके पास फुरसत और शक्ति कहां. मलयालयम में सुगत कुमारी, बांग्ला में कथाकार महाश्वेता देवी आदि कुछ नाम याद आते हैं.

एरिजीस ने कुछ वर्षों पहले अपनी पत्नी के साथ मिलकर, प्रकृति को मनुष्य के आक्रमण से बचाने के लिए प्रयत्न करने के उद्देश्य से ‘सौ का समूह’ गठित किया. इस समूह ने हर माध्यम का उपयोग पर्यावरण के पक्ष में करने की कोशिश की है. उसने प्रेस में लिखने, जनमत जगाने और जानकारी फैलाने के लिए बैठकों का आयोजन करने जैसे काम किए. पत्रकारों द्वारा मज़ाक बनाये जाने और राजनेताओं के सक्रिय विरोध की परवाह न करते हुए इस कवि ने मैक्सिको के जंगल बचाने, समुद्र के कछुओं को सुरक्षित करने के लिए, आणविक लाबी का जब़रदस्त प्रतिरोध करते हुए अपना अभियान चलाया है. इसमें मूलतत्वों को उनकी मौलिक पवित्रता में बचाये रखने का दिवास्वप्न शामिल है.

मैक्सिको की एक सुप्रतिष्ठित परंपरा में एरिजीस अपने देश के स्विटरज़रलैंड, नीदरलैंड और यूनेस्को में राजदूत भी रहे हैं. हम याद कर सकते हैं कि ऐसे ही एक मैक्सिकन महाकवि आक्‍तावियो पाज़ भारत में मैक्सिको के विख्यात राजदूत रहे हैं. भारत से कभी एक भी साहित्यकार को कभी राजदूत बनाते योग्य नहीं पाया गया. याद आती है बोरिस पास्तरनाक की एक पंक्ति जिसमें कवि को अनंत का राजदूत कहा गया है जिसे समय ने बंदी बना रखा है.

कविता कई अर्थों में बचाने की कार्रवाई होती है. भाषा, स्मृति, प्रकृति आदि को बचाने की वह एक लगभग स्वाभाविक विधा है. वह कई जकड़बंदियों के बरक़्स मुक्ति को बचाती है. वह समय की निरंतरता के बोध की भी रक्षा करती है. वह सच्चाई की कठोर ज़मीन के बरक़्स सपनों का आकाश तानती है. याद यह भी किया जाना चाहिये कि एरिजीस के एक कविता संग्रह का शीर्षक है ‘सपनों की डायरी’. कोलरिज ने कभी कहा था कि हमारी दुनिया में देवदूत बहुत कम हैं, जबकि स्वर्ग में वे भरे पड़े हैं. कई बार कुछ कवि स्वर्ग से निष्कासित देवदूत लगते हैं.

अद्भुत स्त्रियांं

कहावत आम है कि हर सफल व्यक्ति या पुरुष के पीछे कोई न कोई स्त्री होती है. उनमें से कभी कोई सामने आ जाती है और उसे वैसी मान्यता मिल जाती है, जैसे उससे जुड़े सफल पुरुष को. पर अधिकांश मान्यता के दायरे से बाहर ही रहती हैं. हम अकसर जब सफल कलाकारों और उनके जीवन पर विचार करते हैं तो इस सच्चाई का ख्याल नहीं करते. यह कई बार नैतिक चूक के बराबर होता है.

हाल में मूर्धन्य चित्रकार रामकुमार के निधन पर बहुत लोगों को उनकी पत्नी विमलाजी की याद आयी, जो राम की कलासाधना अबाध चलती रहे इसका सुनिश्चय करने के लिए स्वयं एक नौकरी करती थीं. उनका देहावसान पहले हुआ और उसके बाद राम बहुत अकेले हो गये थे. विमला जी का स्नेहिल स्वभाव और आतिथ्य बहुतों को याद आता होगा. राम के मित्र रज़ा की पत्नी मानीन मोंजीला स्वयं फ्रेंच कलाकार थीं और घर-बार भी वही सम्हालती थीं. वे अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थीं. बहुत कुछ उन्हीं के कारण रज़ा छः दशक फ्रांस में रह गये. उनकी मृत्यु के बाद वे ख़ासे बिखरने लगे थे. राम के मित्र तैयब मेहता भी अपने अंतिम दिनों में बीमार रहते थे. तब और पहले भी उनकी देखभाल उनकी पत्नी सकीना बहुत मनोयोग और निष्ठा से करती रहीं. जगदीश स्वामीनाथन की पत्नी भवानी उनके अपने साम्यवादी दिनों में सहकर्मी की तरह मिली थीं, पर वे फिर जीवन भर उनके साथ रहीं और स्वामी की लगभग स्वाभाविक अराजकता घातक न हो जाये इसका सुनिश्चय बहुत सर्तकता से करती थीं. एक तरह से उन्होंने स्वामी के दो बेटों कालिदास और हर्ष को पाला-पोसा और संस्कारित किया. वे एक तमिल परिवार में ग़ैरतमिल थीं पर पूरे कुनबे में उनकी गहरी पैठ और जगह थी. हमने उन्हें बीसियों बार स्वामी को झगड़े या रसरंजन के अतिरेक से विरत करते देखा है.

कलाकार अपनी कलासाधना के लिए कई बार दूसरों पर (जिनमें परिवार भी शामिल है) कुछ अन्याय भी कर बैठते हैं. ऐसे शोषण का शिकार अकसर पत्नियों को होना पड़ता है. प्रायः ऐसी पत्नियां अपने पति की कई ज़्यादतियां बरदाश्त करते हुए गाड़ी आगे और रास्ते पर चलाये रखती हैं. कलाकारों की ओर से निश्चय ही कला के हित में ऐसी चीजों का बचाव किया जा सकता है और शायद कुछ कलात्मक औचित्य भी खोजा जा सकता है. पर शुद्ध मानवीय संवेदना के कोण से उनका कोई बचाव संभव नहीं है. कलाकार को कला में अपना जीवन होम कर देने का अधिकार है, पर उसमें वह औरों का जीवन भी होम कर दे, इसे नैतिक ठहराना कठिन है.

अपनी कला का श्रेय तो निश्चय ही कलाकार को मिलता है और मिलना चाहिये. पर उस प्रक्रिया में कुछ श्रेय संस्थाओं, गैलरियों, कला समीक्षकों को भी मिलता है. यह काफ़ी नहीं है. खुले मन से इन अद्भुत स्त्रियों को भी श्रेय मिलना चाहिये. उनका होना, लगभग अदृश्य ढंग से सारे आधार जुटाना और समर्थन की बुनियादी व्यवस्था किये रहना कला और कलाकार दोनों के लिए ज़रूरी होते हैं. उनके अवदान को खुले मन से स्वीकार करना मानवीय, नैतिक और कलात्मक एक साथ है. उनकी कहानी बिलकुल अनकही नहीं रह जानी चाहिये.

पाठक की तलाश में

साहित्य को रसिकों-पाठकों की तलाश सदियों से रही है. भवभूति जैसे महाकवि को सदियों पहले शिकायत थी कि उन्हें कोई समानधर्मा न मिला. पाठक लेखक का समानधर्मा होता है. भक्ति-साहित्य का युग छोड़ दें जहां के कवियों को पाठक-रसिक तत्काल मिल गये और लाखों की संख्या में आज तक मिलते रहते हैं जबकि भक्ति-युग समाप्त हुए कई सदियां बीत चुकी हैं. पर खड़ी बोली की कविता को पाठकों का हमेशा अभाव रहा है. हमारे सबसे बड़े कवियों के पाठक कम ही रहे हैं. इस अभाव के कारणों में जाया सकता है. बहुत से कई बार दुहराये गये हैं पर कोई विशेष अंतर नहीं आया है.

इधर कैटलन कवि जोसेप लुई अगीलो की एक कविता ‘पाठक’ पर ध्यान गया-

पहली पंक्ति दरवाज़ा है जो तुम्हारे लिए खुलता है

कविता का घर। वह जो तुम्हें न्योतता है

अन्दर आने और अपने को सुस्थ बनाने के लिए।

पहला हिस्सा वह है जो

तुम्हारा स्वागत करता और तुम्हें अन्दर खींचता है,

तुम्हारी बांह गहकर थोड़ा झिड़कते हुए

वह जो तुमसे गरमाहट और भरोसे से बात करता है

जब तुम्हें दूसरे हिस्से की आरामकुर्सी पर बैठाता है।

जहां तुम्हें कविता के अर्थ की प्रतीक्षा करना है

तुम्हें काफ़ी लाता है, गर्म और मीठी, तुम्हें कुछ देता है

ताकि तुम्हारे हाथ व्यस्त रहें और तुम्हारा ध्यान न बंंटे

या तुम रैक से कोई अख़बार न उठा लो।

जल्दी ही अन्त आ जायेगा

पिछले दरवाज़े से

चुपचाप दबे पाँव,

जबकि संगीत ऊंचा उठेगा

और तुम्हें आखि़रकार लगेगा कि हर कोई

पहले से ही जानता है कि उसकी पीठ के पीछे छुपा हाथ

एक प्रेमपत्र लिये है

या कि एक छुरा।

कविता से प्रेम या उसकी हत्या से दो विकल्प हैं पाठक के सामने. यह उस पर है कि वह क्या करता है. कविता अपनी नियति के लिए सांस रोककर प्रतीक्षा करती है. कई कविताएं सदियों से ऐसी प्रतीक्षा में हैं.

जहां तुम्हें कविता के अर्थ की प्रतीक्षा करना है

तुम्हें काफ़ी लाता है, गर्म और मीठी, तुम्हें कुछ देता है

ताकि तुम्हारे हाथ व्यस्त रहें और तुम्हारा ध्यान न बंंटे

या तुम रैक से कोई अख़बार न उठा लो।