मेरठ में रहने वाले 20 साल के नितिन चौधरी बीकॉम के छात्र हैं. बीते गुरुवार सात जून को वे परिवार के साथ देहरादून इसलिए नहीं गए कि उन्हें इंटरकॉन्टिनेंटल कप का भारत और न्यूजीलैंड का फुटबाल मुकाबला देखना था. फुटबाल के लिए उनकी इस नई दीवानगी से घरवाले हैरत में थे. यह स्वाभाविक ही था क्योंकि उन्होंने नितिन को क्रिकेट के अलावा कभी किसी खेल में दिलचस्पी लेते नहीं देखा था.

नितिन की फुटबाल में बढ़ी एकाएक दिलचस्पी की वजह सुनील छेत्री की वह भावुक अपील वाला वीडियो था जिसमें उन्होंने देश के लोगों से मैदान में आकर भारतीय राष्ट्रीय फुटबाल टीम का समर्थन करने की अपील की थी. नितिन कहते हैं, ‘मैंने वीडियो केन्या के उस मैच के बाद देखा जिसके लिए छेत्री ने अपील की थी. इसलिए वह मैच नहीं देख पाया. लेकिन अब फुटबाल जरूर देखूंगा’. छेत्री की सादगी और उनकी विनम्रता से खासे प्रभावित नितिन कहते हैं, ‘क्या बंदा है. कहता है आप मैदान में आकर हमारे सामने गाली दीजिए, हमें अच्छा लगेगा. लेकिन मैच देखने जरूर आइये’.

माना जा रहा है कि यह वीडियो भारतीय फुटब़ाल में बदलाव की शुरूआत है. सोशल मीडिया पर इसकी खूब चर्चा हुई. सिर्फ आम लोग ही नहीं, सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसे दिग्गजों ने भी जोरदार तरीके से छेत्री की अपील का समर्थन किया. लेकिन क्या इससे ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस वीडियो ने भारतीय खेल प्रेमियों पर कितना असर डाला है? क्या सुनील छेत्री का ट्विटर पर शेयर किया गया एक वीडियो भारत में फुटबाल की किस्मत बदल देगा?

दूसरे सवाल का जवाब हां में देना शायद कुछ ज्यादा हो जाएगा. लेकिन यह तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि छेत्री की एक साधारण सी अपील ने असाधारण असर डाला है. खेल विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस वीडियो ने फुटबाल के लिए एक सकारात्मक माहौल तो बनाया है. उनके मुताबिक अगर चीजें सही दिशा में चलें तो छेत्री भारतीय फुटबाल के कपिल देव साबित हो सकते हैं.

फुटबाल में कोई खिलाड़ी अपने देश के लिए 100 मैच खेल ले, यह कोई मामूली बात नहीं होती. एक जून को सुनील छेत्री इंटरकॉन्टिनेंटल कप में जब अपना 99वां मैच खेल रहे थे तो उन्होंने चीनी ताइपे के खिलाफ शानदार हैट्रिक जमाई. लेकिन 10,000 की क्षमता वाले मुंबई फुटबॉल एरिना में दर्शकों की आधिकारिक संख्या सिर्फ 2569 थी. उसमें भी बड़ा हिस्सा ब्लू पिलग्रिम्स का था जो भारतीय नेशनल टीम का समर्थन करने वाला एक समूह है.

फुटबाल जैसे जज्बाती खेल में खाली मैदान में खेलने का दर्द क्या होता है, छेत्री से बेहतर इसे कौन समझ सकता है. इसके बाद उन्होंने अपने 100वें मैच से पहले ट्वीटर पर एक वीडियो शेयर किया. इसमें उन्होंने कहा, ‘मुझे पता है कि आप में से बहुत से लोग यूरोपियन क्लब फुटबाल के प्रशंसक हैं और आपको लगता है कि हमारा स्तर उनके जैसा नहीं है. हमारा स्तर उनके जैसा वाकई नहीं है, हम उनके करीब भी नहीं हैं. लेकिन हममें इच्छाशक्ति है. हम आपका वक्त खराब नहीं करेंगे. ...स्टेडियम आइये और हमें हमारे सामने गालियां दीजिए. हो सकता है हम आपको बदल दें और आप हमें गालियां देने के बजाय चीयर करना शुरू कर दें.’

लंबे समय में इस वीडियो का स्थायी प्रभाव क्या रहेगा, यह तो बाद की बात है, लेकिन इसका तात्कालिक असर चमत्कारिक था. केन्या के खिलाफ मैच में मुंबई का अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स (मुंबई फुटबॉल एरेना) का स्टेडियम खचाखच भरा था. वीडियो का ही असर था कि इस मैच में भारत की केन्या पर जीत को कहीं ज्यादा सुर्खियां मिलीं. देश-विदेश के मीडिया में छेत्री की अपील के बाद मैच के सारे टिकट बिक जाने के चर्चे थे.

खेल से ज्यादा एक भावुक अपील की चर्चा को खेल के लिहाज से बहुत सुखद नहीं माना जा सकता. लेकिन छेत्री की अपील दूर और देर तक असर करने वाली है, यह न्यूज़ीलैंड के साथ भारत के अगले मैच में दिखा. उस दिन मौसम विभाग ने चेतावनी जारी की थी कि मुंबई में भारी बारिश हो सकती है और संभव हो तो लोग घरों में ही रहें. लेकिन खराब मौसम और चेतावनी के बाद भी लोग निकले और अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स खचाखच भर गया. भारत 2-1 से मैच हार गया, लेकिन मैदान में हार के सन्नाटे के बजाय सुनील छेत्री और उनकी टीम के लिए जोरदार तालियां बजीं. मुंबई जैसे शहर में, जहां का खेल पर्यावरण सिर्फ क्रिकेट के अनुकूल है, यह बड़ी बात थी. सुनील छेत्री का दर्शकों को विनम्र अभिवादन और संतोष से भरा उनका चेहरा बता रहा था कि भारत की खेल संस्कृति में फुटबाल भी अपनी जगह बना सकता है.

लेकिन क्या महज एक वीडियो और इसके बाद दो मैचों में उमड़े दर्शकों की संख्या से इतनी उम्मीद लगाना ठीक है? क्या मुंबई के स्टेडियम में जुटे दर्शक फुटबाल के सच्चे प्रशंसक थे? या यह सिर्फ एक भावनात्मक लहर थी जो वक्त के साथ उतर जाएगी? इस सवाल पर फुटबाल के शौकीन ताइक्वांडो के राज्यस्तरीय खिलाड़ी रह चुके सुनील कहते हैं, ‘1983 में भारत ने जब क्रिकेट का विश्व कप जीता था तो एकाएक पूरे देश में कपिल देव और बैट-बल्ला छा गया था. जाते हुए 80 और आते हुए 90 के दशक के बीच क्रिकेट कॉमेंट्री सुनने वाले और टीवी पर मैच देखने वाले क्या सभी लोग क्रिकेट की बारीकी समझते थे? बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए मैच देखते थे कि वो ऐसा करने से खुद को एक राष्ट्रीय उत्सव का हिस्सा पाते थे. बहुतों के लिए क्रिकेट की चर्चा सिर्फ स्टेटस का हिस्सा होती थी. लेकिन आज भारत का हर क्रिकेट देखने वाला उसे समझता है और अपनी राय भी रखता है.’ उनके मुताबिक ऐसा फुटबाल के साथ भी हो सकता है. बाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ी आते रहें तो फुटबाल भी भारत में क्रिकेट जैसी अहमियत हासिल कर सकता है. वे कहते हैं, ‘आखिर भारतीय क्रिकेट के मुहावरे को भी सुनील गावस्कर, कपिल देव और सचिन तेंदुलकर ने ही बदला.’

शौकिया फुटबाल खेलने वाले मेरठ के आयुष श्रीवास्तव कहते हैं कि ऐसा भी नहीं है कि भारत में फुटबाल को समझने वाले लोग बिल्कुल नहीं हैं. लेकिन खेल तभी आगे बढ़ेगा, जब चर्चा में रहेगा. उनकी शिकायत मीडिया से भी है. वे कहते हैं, ‘राष्ट्रीय टीम से लेकर स्थानीय स्तर तक फुटबाल टूर्नामेंट की कवरेज में उपेक्षा की जाती है. लोकल लेवल के क्रिकेट टूर्नामेंट की खबर आप सिर्फ प्रेस रिलीज देकर अख़बारों में छपवा सकते हैं, लेकिन फुटबाल की बड़ी प्रतियोगिता तक को एक कॉलम जगह भी नसीब नहीं होती.’

लखनऊ के एक पब्लिक स्कूल में शारीरिक प्रशिक्षक अनंत यादव ने विश्वविद्यालय स्तर तक फुटबाल खेला है. वे कहते हैं, ‘यह क्या कम है कि सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ियों ने मरते भारतीय फुटबाल में सांस फूंक रखी है. वरना भारत में फुटबाल को सिर्फ सामान्य ज्ञान के सवालों का हिस्सा भर बना दिया गया था कि नेहरू कप किस खेल से संबंधित है और डूरंड कप किस खेल से.’ क्रिकेट कोच महेश मित्तल मानते हैं कि छेत्री के वीडियो का असर जरूर होगा,लेकिन वह हाल-फिलहाल क्रिकेट जैसा रुतबा हासिल कर लेगा यह कहना जल्दबाजी है.

जानकारों के मुताबिक महेश की बात गलत नहीं है. खेल संस्कृति धीरे-धीरे बदलती है. किसी खेल का राष्ट्रीय स्तर पर चमक जाना तब ही संभव होता है जब वह देश के सामुदायिक जीवन में नज़र आने लगता है. आप इसका उल्टा भी कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर चमक जाने के बाद खेल देश की सामुदायिक जिंदगी में भी उतर आता है. दोनों बातें आपस में जुड़ी हुई हैं और यह आपस में घुलमिल कर ही किसी खेल को आगे बढ़ा सकती हैं. भारत के मोहल्लों में सिर्फ मनोरंजन और आनंद के लिए क्रिकेट खेलने वाले कुछ बच्चे अगर शाम को फुटबाल खेलने लगें तो समझिए बदलाव आ रहा है.

बीते कुछेक सालों में फुटबाल के लिए अच्छी बातें भी हुई हैं. मसलन भारत फीफा रैंकिंग में 173वें नंबर से 97 नंबर पर पहुंच चुका है. सुनील छेत्री ने दुनिया के सक्रिय अंतरराष्ट्रीय फुटबालरों में गोल करने के मामले में लियोनेल मेसी की बराबरी कर ली है. दोनों के खाते में 64 अंतरराष्ट्रीय गोल हैं. छेत्री फिलहाल भारतीय फुटबाल के नायक हैं. जानकार मानते हैं कि अगर देश फुटबाल में अपने नायक तलाशने का सिलसिला जारी रखेगा तो ही यह खेल भारत में आगे बढ़ेगा और मुंबई फुटबाल एरेना में जुटी एक भावुक भीड़ सच्चे प्रशंसकों में बदल जाएगी.

फिलहाल ताजा खबर यह है कि भारतीय फुटबॉल टीम हीरो इंटरकॉन्टिनेंटल कप में शानदार खेल दिखाते हुए केन्या को 2-0 से हराकर खिताब अपने नाम कर चुकी है. भारत की इस यादगार जीत के हीरो सुनील छेत्री ही रहे. दोनों गोल उन्होंने किए. खबर यह भी है कि रूस में हो रहे विश्व कप में विदेशियों के लिए रखे गए टिकटों की जो बिक्री हो रही है उसमें भारतीयों की भी खासी भागीदारी है. फीफा की रैंकिंग में भारत का नंबर भले ही 97वां हो, लेकिन विश्व कप के सबसे ज्यादा टिकट खरीदने वालों की सूची में वह पहले 20 देशों में है.