मायावती जी, मध्य प्रदेश, छत्तीगढ़ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों में क्या बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी?

देखिए, ब्लैक होल में तो बड़े-बड़े तारे और रौशनी तक गुम हो जाते हैं फिर हमारे हाथी की क्या बिसात!

ब्लैक होल! मायावती जी मैं कांग्रेस के साथ आपके गठबंधन की संभावनाओं की बात कर रही हूं.

आज के समय में कांग्रेस किसी ब्लैक होल से कम है क्या! उत्तर प्रदेश में उसका हाथ थामने वाली समाजवादी पार्टी (सपा) पिछले विधानसभा चुनाव में साइकल समेत ही उस ब्लैक होल में समा गई थी. जब हाथी ने खींचा तब जाकर साइकल थोड़ी बाहर निकली है. वैसे मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि मनमौजी हाथी कब किस तरफ मुड़ जाए, पहले से बताना मुशिकल है.

आपके साथ गेस्ट हाउस कांड जैसी घटना के पीछे सपा जिम्मेदार थी, लेकिन आपने फिर इस पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया. ऐसा क्यों

देखिए, बड़े कांडियों से लड़ने के लिए छोटे कांडियों को तो साथ लेना ही पड़ेगा! मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में सबसे ज्यादा कर्मकांडी सिर्फ एक ही पार्टी में है और वो है भाजपा. इस देश को और बड़े कांडों और कर्मकांडों से बचाने के लिए छोटे-छोटे कांड-कर्मकांड करने ही पड़ेंगे!

सुनने में आ रहा है कि अगले आम चुनाव के लिए बसपा ने विपक्षी गठबंधन से उत्तर प्रदेश की 80 में से 40 लोक सभा सीटें मांगी हैं. इस बात में कितनी सच्चाई है?

देखिए, आप भी जानती हैं कि एक मजबूत गठबंधन के लिए ज्यादा ताकत की जरूरत है और हाथी सबसे ताकतवर जानवरों में से एक है. ज्यादा हाथी, मतलब ज्यादा ताकतवर गठबंधन. इसलिए 80 जानवरों में 40 हाथी... मेरा मतलब कि प्रत्याशी तो हमारे होने ही चाहिए.

लेकिन यदि विपक्षी गठबंधन ने बसपा को आधी सीटें न दी तब आप क्या करेंगी?

(खीजते हुए) बैठके पकौड़े तो कतई नहीं तलूंगी!

क्या अगले लोक सभा चुनाव में आप विपक्ष की तरफ से खुद को देश के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहेंगी?

हां बिल्कुल. मेरे पास चाय वाले से ज्यादा डिग्रियां हैं, चाहो तो निकलवा के देख लेना!

लेकिन मायावती जी, प्रधानमंत्री पद के लिए सिर्फ डिग्रियां होना ही पर्याप्त नहीं है. आप तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहुत बार सवालों के जवाब भी पढ़कर देती हैं. क्या एक प्रधानमंत्री को यह शोभा देगा?

वो मैं इसलिए करती हूं ताकि आप लोग यह न समझें कि मुझे पढ़ना नहीं आता! अब्ब्ब... मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि मैं कम से कम प्रेस कॉन्फ्रेंस में आती तो हूं, प्रधानमंत्री पद का दूसरा दावेदार तो मीडिया के सामने आने और मुंह खोलने से भी डरता है! और रही प्रधानमंत्री पद की शोभा की बात, तो क्या बिना पढ़े, गलत ऐतिहासिक तथ्यों से भरे जवाब देना और झूठ पर झूठ बोलना प्रधानमंत्री को शोभा देता है! (खीजते हुए)

मायावती जी, आप टिकट बांटने में जातिगत समीकरण बेहतरीन तरीके से साधती हैं. क्या इस बार भी आप सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखकर टिकट बांटेंगी?

हां बिल्कुल. वैसे इस देश को इंजीनियरों से ज्यादा सोशल इंजीनियरों की जरूरत है! बाकि पार्टियां सिर्फ एमपी-एमएलए बनाने में यकीन रखती हैं, जबकि बसपा देश को सोशल इंजीनियर देती है. मेरा तो कहना है कि देश के सारे इंजीनियरिंग कॉलेजों को सोशल इंजीनियरिंग कॉलेज में बदल देना चाहिए, क्योंकि सोशल इंजीनियर साधारण इंजीनियरों से ज्यादा बेहतर इमारतें बना सकते और अपने लिए बनवा सकते हैं!

दलित समुदाय आपकी पार्टी का मुख्य वोट बैंक है. लेकिन लोग कहते हैं कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए आपने इस समुदाय के लिए कोई खास काम नहीं किया. इस पर क्या कहेंगी?

‘हाथी के पांव में सबका पांव’ की सोच रखते हुए, मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने अपना सबसे ज्यादा विकास किया था. लेकिन आप मीडिया वाले और तमाम राजनीतिक दल तो आज तक देश के सिर्फ एक ही दलित का विकास हजम नहीं कर पा रहे हैं. तो यदि मैं बाकि दलितों का भी विकास करती तब क्या इस देश में भूचाल नहीं आ जाता! दलितों के आर्थिक विकास के लिए पहले सवर्णों को अपना मानसिक विकास करना पड़ेगा, लेकिन अफसोस कि सारे मनुवादी लोग अपने मानसिक विकास की जगह सिर्फ आर्थिक विकास में ही लगे हुए हैं.

आपके ऊपर चुनावों में टिकट के बदले पैसे लेने का आरोप लगाया जाता है. इसपर क्या कहेंगी?

(खीजते हुए) हाथी मैं पालूंगी तो उसके चारे का इंतजाम भी मैं ही करूंगी न! ... मेरा मतलब कि ये सारे आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं, यह सब मनुवादी मीडिया की मुझे बदनाम करने की घिनौनी कोशिश है, लेकिन कुत्तों के भौंकने से हाथी अपना रास्ता नहीं बदलता.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब सरकारी नौकरी में एससी/एसटी समुदाय के लोगों को पदोन्नति में भी आरक्षण मिलेगा. इसे आप किस तरह देखती हैं?

सिर्फ सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण से भला क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट को राजनीति में भी इस तरह का आरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए ताकि कोई दलित मुख्यमंत्री भी प्रमोशन पाकर प्रधानमंत्री या उपप्रधानमंत्री के पद तक पहुंच सके. आखिर एमपी-एमएलए भी तो सरकारी आदमी ही होते हैं!

देश के 19 राज्यों में आज भाजपा की या उसके सहयोग से बनी सरकारें हैं. फिर आप किस आधार पर दावा करती हैं कि भाजपा की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है?

(व्यंग्य से) क्या अब सवालों का भी आधार से लिंक होना अनिवार्य कर दिया गया है! क्या आप नहीं जानतीं कि दीया बुझने से पहले भभकता है.

लखनऊ का सरकारी आवास मीडिया को दिखाते हुए आपने दावा किया था कि आप वहां बहुत ही सादगी से रहती थीं. आप इतनी ही सादगी पसंद हैं तो आपको इतने बड़े आवास की जरूरत ही क्या थी?

इतने बड़े सरकारी आवास की जरूरत मुझे नहीं, माननीय कांशीराम जी की स्मृतियों को थी. मैं तो सिर्फ उन स्मृतियों की केयरटेकर थी!