कुछ वक्त पहले ही ‘लस्ट स्टोरीज’ का ट्रेलर रिलीज हुआ है. नेटफ्लिक्स की इस फिल्म में चार मुख्तलिफ कहानियां हैं, जिसे अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी और जोया अख्तर जैसे प्रबुद्ध निर्देशकों के साथ करण जौहर ने निर्देशित किया है. ये लस्ट और सेक्स की थीम से आपस में बंधी हैं और महिलाओं के नजरिए से इन विषयों को टटोलती हैं. ऐसी फीचर फिल्मों को सिनेमा की भाषा में ‘ऐंथॉलजी’ फिल्में कहा जाता है. इनमें चार-छह-आठ या कुछ ज्यादा लघु फिल्में आपस में एक थीम से बंधी होती हैं और इसके अलावा न कहानियों में आपसी कोई जुड़ाव होता है न किरदार किसी का इधर का उधर आता-जाता है.

बॉलीवुड में सन् 2000 के बाद से ही ऐसी कई कंटेम्पररी फिल्में बनती रही हैं (‘डरना मना है’, ‘दस कहानियां’, ‘आई एम’, ‘मुंबई कटिंग’), लेकिन मुख्यधारा के सिनेमा का इस सब-जॉनर की फिल्मों से कभी याराना नहीं रहा. हाल के वक्त में दिबाकर बनर्जी की ‘लव सेक्स और धोखा’ (2010) व ऊपर वर्णित निर्देशकों की ‘बॉम्बे टाकीज’ (2013) ने ही इस तरह की हिंदी फिल्मों को थोड़ा-बहुत मशहूर किया है और अब उम्मीद है कि नेटफ्लिक्स की मदद लेकर ‘लस्ट स्टोरीज’ भी ज्यादा संख्या में हिंदुस्तानी दर्शकों तक इस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात जॉनर के सिनेमा को पहुंचाएगी.

दुनियाभर के सिनेमा लंबे अरसे से इस विधा का प्रयोग नायाब कहानियां कहने के लिए कर रहे हैं. 1930 के ही दशक से इस सब-जॉनर की फिल्मों का निर्माण हो रहा है, लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत से लेकर अब तक बनी फिल्मों को देखना ज्यादा दिलचस्प अनुभव है. इस समय में मुख्यधारा की कई दिलचस्प फिल्मों के अलावा ज्यादातर इंडिपेंडेंट, प्रयोगधर्मी और मुखर फिल्मों ने इस सब-जॉनर को सलीके से अपनाया है. ‘पेरिस, आई लव यू’ (2006), रोमानिया की ‘टेल्स फ्रॉम द गोल्डन एज’ (2009), ‘इरोस’ (2004), ‘वी/एच/एस’ (2012), ‘कॉफी एंड सिगरेट्स’ (2003) और ‘टू ईच हिज ओन सिनेमा’ (2007) जैसी फिल्में ऐंथॉलजी सब-जॉनर के प्रशंसनीय उदाहरण हैं.

लेकिन एक फिल्म है जो ऊपर वर्णित और न वर्णित ढेरों ऐंथॉलजी फिल्मों से एकदम हटकर है. हिंसा और बदले की थीम से बंधी छह लघु कहानियों वाली इस फिल्म में कुछ भी वह नहीं होता जो आपको लगेगा कि होगा. आम जीवन की सामान्य-सी घटनाओं को लेकर निर्देशक की कल्पनाशीलता उस पहाड़ पर चढ़ जाती है जिस पहाड़ को आपने आज तक देखा ही नहीं होगा! लेकिन बिना मेलोड्रामा के, बिना व्यर्थ की अतिरंजना के, कहानियां इस यथार्थवादी अंदाज में आगे बढ़ती हैं कि आपको लगेगा कि ऐसा बिलकुल हो सकता है. कभी-कभी यहां तक लगेगा कि ऐसा ही होना चाहिए, क्योंकि असल में फिल्म के भेष में ये कहानियां विषमतम परिस्थितियों में मनुष्य के व्यवहार का मूल्यांकन है. और इन्हें देखकर आप अपना भी आकलन कर सकते हैं.

अर्जेंटीना में 2014 में बनी इस फीचर फिल्म ‘वाइल्ड टेल्स’ की दूसरी खासियत है कि इसकी कुछ लघु कहानियां आपको नितांत भारतीय लगेंगी. एक अंजान देश का सिनेमा होने के बावजूद – जिस देश को आप माराडोना और मैसी के अलावा शायद ही किसी चीज के लिए जानते होंगे – आप इनसे तुरंत कनेक्ट कर पाएंगे और कभी ब्लैक ह्यूमर, कभी विस्फोटक हिंसा, और कभी ड्रामा व थ्रिलर के मेलजोल से पैदा हुए एक क्लाइमेक्स को देखकर विस्मित रह जाएंगे.

सबसे ज्यादा यही ‘वाइल्ड टेल्स’ करती है, और इसी वजह से ऐंथॉलजी फिल्मों में ये सबसे खास और अलग भी है, कि आपको अति का चौंकाते चलती है. इसकी सबसे छोटी लघु फिल्म कुछ वक्त पहले हमारे हिंदुस्तान में व्हाट्सएप पर खूब शेयर की गई थी लेकिन ज्यादातर लोगों को पता नहीं था कि इसकी उत्पत्ति कहां से हुई और ये किसी फिल्म का हिस्सा भी है. चूंकि ये पूरी लघु फिल्म वीडियो के रूप में पब्लिक डोमेन में पहले से मौजूद है, इसलिए उसे दोबारा यहां साझा करना शायद गलत नहीं है. लुत्फ उठाइए.

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यकीन जानिए, जो अभी आपने देखा वो कुछ भी नहीं है! आगे जो लघु कहानियां ‘वाइल्ड टेल्स’ में आपका इंतजार कर रही हैं वो आपका संडे ‘सुखडे’ में बदल देंगी, अगर आपने लेख खत्म करते ही दो घंटे की इस फिल्म को फटाफट देखना शुरू कर दिया तो! देखने के बाद फिर आप भी हमारी तरह सवाल करेंगे कि ‘बॉम्बे टाकीज’ और ‘लस्ट स्टोरीज’ तो ठीक है, लेकिन क्या हमारे प्रबुद्ध निर्देशक भी कभी इस स्तर की होशियार और सोशल सटायर करने वाली लघु फिल्में बनाकर एक फीचर फिल्म में समेट पाएंगे?

देखने में ‘वाइल्ड टेल्स’ थोड़ी मुश्किल भी है. हर बात पर आहत होने वाले तो इससे दूर ही रहें, लेकिन उस तरह का सिनेमा देखने के शौकीन दर्शक, जिसमें चीजों को एक्स्ट्रीम पर ले जाकर इंसानी व्यवहार को मापा जाता है, इसे जरूर देखें. हिंसा का अतिरेक कभी-कभी आपको अतिरिक्त समझ दे जाता है, इसलिए थोड़ा-बहुत असहज होना तो चलता है.

स्पेनिश भाषी इस फिल्म में उस स्तर की विचित्रता और पागलपन भी मौजूद है जो टेरेंटिनो और सर्बियन फिल्ममेकर एमिर कुस्तुरिका की फिल्मों में ही नजर आता है. दूल्हे पर शक करने वाली दुल्हन की आखिरी लघु फिल्म में तो इस कदर पागलपन तारी है कि लगता है जैसे निर्देशक, कुस्तुरिका की महान फिल्म ‘अंडरग्राउंड’ (1995) को ट्रिब्यूट दे रहे हों. जहां एक लघु फिल्म गाड़ी चलाते वक्त दूसरों को भला-बुरा कहने वाली आम आदत को अकल्पनीय अंत की तरफ ले जाती है और टेरेंटिनो की याद आती है, वहीं एक में सिस्टम से परेशान नायक की सही जगह खड़ी कार को ट्रैफिक पुलिसवाले उठाकर ले जाते हैं और आगे जो-जो होता है उसे देखकर ट्रैफिक पुलिस की मार खाए हर भारतीय को अपनी याद आने लगती है!

एक तीसरी कथा सड़क दुर्घटना के बारे में है जिसे देखकर न जाने कितने जाने-पहचाने और मशहूर हिंदुस्तानी नाम आपको याद आने लगेंगे और पलभर के लिए लगेगा कि किसी भारतीय ने ही अर्जेंटीना जाकर यह लघु फिल्म लिखी होगी! आगे किसी भी लघु फिल्म के बारे में थोड़ा और बताना आपके लिए पूरी फिल्म का मजा खराब कर देगा इसलिए हम यहीं रुककर आखिरी पैरा लिखकर आपसे विदा लेते हैं.

कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित ‘वाइल्ड टेल्स’ को दमियन सीफ्रॉन ने निर्देशित किया है जिनके बारे में विकिपीडिया दिलचस्प अंदाज में यह जानकारी देता है - ‘अर्जेंटीना के इतिहास की सबसे सफल टीवी सीरीज ‘द प्रिटेंडर’ के क्रिएटर, और अर्जेंटीना के इतिहास की सबसे सफल फीचर फिल्म ‘वाइल्ड टेल्स’ के लेखक-निर्देशक!’ वो यह भी लिख देता तो बेहतर होता – शॉर्ट फिल्मों को जोड़-जोड़कर बनने वाली तमाम फीचर फिल्मों में अब तक की सबसे अनोखी और सबसे विचित्र ऐंथॉलजी फिल्म के रचियता!

(‘वाइल्ड टेल्स’ को आप इन दिनों नेटफ्लिक्स पर भी देख सकते हैं.)

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