नरेंद्र मोदी सरकार ने देश की नौकरशाही में प्रवेश पाने के तरीके में एक एेतिहासिक बदलाव किया है. अब बड़ा अधिकारी बनने के लिए संघ लोकसेवा अायोग की भारतीय सिविल सेवा परीक्षा पास करना जरूरी नहीं होगा. निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी लैटरल एंट्री के जरिये प्रशासनिक सेवा में जा सकेंगे.

रविवार को डिपार्टमेंट अॉफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने इस बारे में औपचारिक अधिसूचना जारी की. देश के प्रमुख समाचार पत्रों में जारी विज्ञापन के मुताबिक 40 साल का कोई भी स्नातक जिसके पास सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में काम करने का कम से कम 15 साल का अनुभव हो वह इन नियुक्तियों के लिए अावेदन कर सकता है. चयनित लोगों को विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्त किया जाएगा. फिलहाल 10 पदों के लिए यह विज्ञापन दिया गया है.

खबरों के मुताबिक संयुक्त सचिव के पदों पर इस तरह की नियुक्तियां तीन साल के लिए की जाएंगी. अच्छे प्रदर्शन पर कार्यकाल पांच वर्ष तक भी किया जा सकता है. पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, ‘यह उपलब्ध लोगों में से सर्वश्रेष्ठ प्राप्त करने का प्रयास है. यह हर भारतीय नागरिक को उनकी क्षमता के अाधार पर विकास का मौका देने से प्रेरित है.’

हालांकि विपक्ष ने सरकार के इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने सरकार पर यूपीएससी और एसएससी की अनदेखी करने का आरोप लगाया है. उधर, राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया, ‘इस तरह का प्रस्ताव संविधान और अारक्षण का घोर उल्लंघन है. कल को ये बिना चुनाव प्रधानमंत्री और कैबिनेट बना लेंगे.’

पूूूूर्व आईएएस और कांग्रेस नेता पीएल पुनिया ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैैं. उन्होंने कहा, ‘सरकार बैकडोर सेे भाजपा और संघ के लोगों को नौकरशाही में लाना चाहती है. सरदार पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा को स्टील फ्रेम कहा था. उनका मानना था कि सरकारें अाती जाती रहेंगी,लेकिन इस श्रेणी के अधिकारियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. यह उनकेे विजन के साथ भी खिलवाड़ है.’

नौकरशाही में लैटरल एंट्री का पहला प्रस्ताव 2005 में पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में अाया था.2010 में भी इसकी सिफारिश की गई. लेकिन 2014 में मोदी सरकार के अाने के बाद इस दिशा मेें गंभीर प्रयास शुरु हुए.