लचर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर उत्तर प्रदेश एक बार फिर चर्चा में है. बीती आठ जून को कानपुर के लाला लाजपत राय अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में एसी न चलने की वजह से पांच मरीजों की मौत हो गई. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो एसी प्लांट गुरुवार तड़के सुबह ही खराब हो गया था लेकिन, रात तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई. उधर, अस्पताल प्रशासन का कहना है कि मरीजों की मौत का एसी न चलने से कोई संबंध नहीं है बल्कि, उनकी मौत गंभीर बीमारी की वजह से हुई है. इससे पहले भी बीते साल गोरखपुर स्थित एक सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडरों की कमी से 50 से अधिक बच्चों की मौत की खबर सामने आई थी.

देश में खस्ता स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से मरीजों की स्थिति खराब होने या फिर उनकी मौत होने का यह अकेला मामला नहीं है. सरकारों द्वारा स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता में बताने के बाद भी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति सुधरती हुई नहीं दिखती. बीते साल केंद्र सरकार ने नई स्वास्थ्य नीति जारी की थी. इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र पर कुल सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी खर्च करने की बात कही गई है. फिलहाल यह आंकड़ा केवल 1.2 फीसदी है. इस साल के बजट में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का ऐलान किया है. क्रांतिकारी बताई जा रही इस योजना के दायरे में देश के करीब 10 करोड़ परिवारों को लाने का ऐलान किया गया है. इसके लाभार्थी परिवार के सदस्यों के इलाज लिए पांच लाख रुपये तक का बीमा किया जाएगा.

हालांकि अब तक इस योजना को लागू करने को लेकर पूरी तस्वीर सामने नहीं आ पाई है. इसे किस तरह लागू किया जाएगा और इसके लिए पैसे कहां से आएंगे, इस पर बड़ा सवालिया निशान बना हुआ है. एक तबके का मानना है कि इस योजना के साथ सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र के निजीकरण का एक बड़ा रास्ता खोलना चाहती है. उनके मुताबिक इस योजना के बाद सरकार लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारियों से भी बच सकती है. इससे पहले से खस्ताहाल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और बदतर हो सकती है.

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना के लागू होने के बाद देश में निजी अस्पतालों की एक बड़ी चेन खुलने की बात कही है. यह बात उन्होंने हाल में लंदन में आयोजित ‘भारत की बात सबसे साथ’ नाम के कार्यक्रम में कही थी. जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री की इस बात का संदेश यह है कि इस योजना के बाद निजी अस्पताल छोटे शहरों में अपना विस्तार कर सकते हैं.

हैदराबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के शिक्षक पुरेंद्र प्रसाद ने देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर एक समाचार एजेंसी के साथ बातचीत में विस्तार से चर्चा की है. ‘इक्विटी एंड एक्सेस : हेल्थ केयर स्टडीज इन इंडिया’ नाम की एक किताब का संपादन करने वाले पुरेंद्र प्रसाद का मानना है कि जब तक स्वास्थ्य सुविधाओं को बाजार से दूर करने के साथ इन्हें जनहित में विकसित नहीं किया जाता तब तक इस क्षेत्र में असमानताओं को दूर नहीं किया जा सकेगा. इसके साथ ही उन्होंने मोदी सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने और सरकारी क्षेत्र को कमजोर करने को लेकर कठघरे में खड़ा किया है.

संविधान में देश की जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार के कंधे पर ही डाली गई है. लेकिन अब जानकारों की मानें तो सरकार इस जिम्मेदारी का भार निजी कंधों पर डालने को तैयार है जिन पर अक्सर ही आरोप लगते हैं कि उन्हें मरीज की स्थिति बेहतर होने से अधिक अपनी कमाई की चिंता रहती है. दिल्ली-एनसीआर स्थित कई निजी अस्पताल अपने अनाप-शनाप बिलों को लेकर हालिया दिनों में सुर्खियों में रह चुके हैं.

दूसरी ओर, सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की बात करें तो पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने साल 2016 में इस ओर ध्यान दिलाया था. उन्होंने कहा था कि देशभर में 24 लाख नर्सों की कमी है. साथ ही, प्रणब मुखर्जी ने सवा अरब से अधिक आबादी के लिए केवल 1.53 लाख स्वास्थ्य उपकेंद्र और 85,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने पर चिंता जाहिर की थी. जहां तक डॉक्टरों की बात है तो खुद सरकार मानती है कि देशभर में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है. इसके बावजूद हर साल केवल 5500 डॉक्टर ही तैयार हो पाते है. देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 50 फीसदी से भी ज्यादा कमी है.

सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और मरीजों की भागदौड़ की स्थिति को नई दिल्ली स्थिति देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान (एम्स) के जरिए समझा जा सकता है. बताया जाता है कि इस अस्पताल में देशभर से प्रतिदिन 10,000 तक मरीज आते हैं. इनमें कइयों से बात करने पर पता चला कि इन्होंने सीधे ही एम्स का रुख नहीं किया. इससे पहले वे स्थानीय अस्पतालों के चक्कर लगा चुके थे. लेकिन एम्स में भी अपनी बारी के लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ता है.

चार महीने की त्रिशा का ही उदाहरण लें. अमर उजाला की एक खबर की मानें तो उसे दिल के ऑपरेशन के लिए सितंबर, 2023 तक का इंतजार करना पड़ेगा. एम्स स्थित कई विभागों में इलाज के लिए मरीजों को तीन साल तक का इंतजार करना पड़ता है. इसके पीछे की वजह मरीजों की बड़ी संख्या के साथ डॉक्टरों की कमी और सीमित संसाधन भी हैं. अस्पताल में कई तरह की जांचों के लिए भी मरीजों को तीन से छह महीने तक का इंतजार करना पड़ता है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इंतजार का यह वक्त और लंबा हो सकता है.

आईजीआईएमएस स्थित शौचालय
आईजीआईएमएस स्थित शौचालय

यही स्थिति राज्यों की राजधानियों में स्थित बड़े अस्पतालों में है. पटना स्थित इंदिरा गांधी इस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (आईजीआईएमएस) में पूरे राज्य के साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी लोग इलाज करवाने पहुंचते हैं. लेकिन, यहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव दिखता है. साफ-सफाई तक के मामले में स्थिति बहुत खराब है. अस्पताल प्रशासन इसके लिए मरीजों को जिम्मेदार बताता है. दूसरी ओर, मरीजों का कहना है कि कई बार सफाईकर्मी जानबूझकर कूड़ेदान हटा देते हैं और ऐसी स्थिति में वे कचरे को इधर-उधर फेंकने के लिए मजबूर हो जाते हैं. अस्पताल परिसर में शौचालय की पर्याप्त सुविधा न होने की वजह से कई मरीजों ने खुले में शौच जाने की बात भी स्वीकार की. आईजीआईएम में मरीजों के रहने के लिए भी पर्याप्त सुविधा मौजूद नहीं है सो बहुत से लोगों को खुले आसमान के नीचे ही सोना पड़ता है.

नवजात शिशु के साथ आईजीआईएमएस परिसर में सोने के लिए मजबूर मरीज
नवजात शिशु के साथ आईजीआईएमएस परिसर में सोने के लिए मजबूर मरीज

एम्स और आईजीआईएम के उदाहरण बताते हैं कि मरीजों का अपने इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहना कितनी बड़ी परीक्षा है. इन परिस्थितियों को देखते हुए अधिकांश मरीज निजी अस्पतालों की ओर रूख करते हैं. एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक दो-तिहाई से अधिक मरीज इलाज के लिए निजी अस्पतालों की उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं. 2016 में आई स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट भी बताती है कि भारतीय, सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों पर आठ गुना अधिक खर्च करते हैं. 2013-14 में लोगों ने सरकारी अस्पतालों पर 8,193 और निजी अस्पतालों पर 64,628 करोड़ रुपये खर्च किए. माना जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू होने के बाद इस आंकड़े में बेतहाशा बढ़ोतरी हो सकती है.

कहा जा रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित रकम का एक बड़ा हिस्सा इस योजना पर खर्च हो सकता है. इससे यह आशंका बढ़ती दिखती है कि सरकारी अस्पतालों पर पहले से ही कम खर्च की जा रही रकम और घट सकती है. वैसे इस योजना के सामने आने से पहले ही गुजरात, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार सहित 14 राज्यों ने बाल स्वास्थ्य संबंधी वित्तीय आवंटन में तीन से 55 फीसदी तक की कमी कर दी है.