2017 में हुई हिंसक घटनाओं की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को भारी चपत लगी है. इंस्टीट्यूट फॉर इकॉनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) की तरफ से जारी एक रिपोर्ट के आधार पर द टाइम्स आॅफ इंडिया ने लिखा है कि बीते साल हुई हिंसा की वजह से देश को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नौ प्रतिशत के बराबर का नुकसान उठाना पड़ा है. क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के लिहाज से देखें तो यह रकम 80 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा बैठती है. प्रति व्यक्ति के हिसाब आकलन किया जाए तो यह आंकड़ा करीब 40 हजार रुपये ठहरता है. क्रय शक्ति समता (पीपीपी) विभिन्न देशों की मुद्राओं की आपसी तुलना के लिए बनाई गई एक प्रणाली है. इसके तहत एक देश की मुद्रा और दूसरे देश की मुद्रा के बीच वास्तविक तुलना के लिए कुछ निश्चित वस्तुओं और उनके दामों में मौजूद अंतर को देखा जाता है.

163 देशों और क्षेत्रों के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में 2016 के मुकाबले 2017 के दौरान भारत में हिंसक घटनाओं में कमी आने की बात भी कही गई है. रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में 137वें पायदान से एक कदम चढ़कर शांति के लिहाज से भारत अब 136वें स्थान पर आ गया है. उधर रिपोर्ट में अफगानिस्तान और पाकिस्तान को दक्षिण एशिया के सबसे अशांत देशों में शामिल किया गया है. आतंकवाद, विस्थापन और शरणार्थियों की बढ़ती संख्या को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक बीते सात दशकों के दौरान अशांत देशों की अर्थव्यवस्था में कुछ हद तक स्थिरता भी देखने को मिली है. इसके अलावा कम शांत देशों के मु​काबले ज्यादा शांत देशों में प्रति व्यक्ति जीडीपी में तिगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस दौरान ऐसे देश ही निवेशकों की भी पसंद बने. 1980 के बाद से ज्यादा शांत देशों को अपने जीडीपी के दो प्रतिशत तक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने में सफलता मिली. उधर कम शांत देशों में यह दर 0.84 प्रतिशत ही रही.