नरेंद्र मोदी सरकार ने शनिवार को केंद्र के 10 मंत्रालयों और विभागों में ‘लैटरल एंट्री’ के जरिए 10 संयुक्त सचिवों (सभी में एक-एक) की बहाली का विज्ञापन निकाला है. इसमें बताया गया है कि इस पद के लिए 40 साल या उससे ज्यादा उम्र के वे लोग योग्य होंगे जिनके पास निजी या सरकारी क्षेत्र में काम करने का कम से कम 15 साल का अनुभव होगा. लैटरल एंट्री का मकसद स्पष्ट करते हुए विज्ञापन में कहा गया है कि इससे न केवल शासन व्यवस्था में नए विचार आएंगे बल्कि उसकी मानवशक्ति (मैनपावर) में भी इजाफा हो सकेगा.

प्रस्ताव में यह भी बताया गया है कि योग्य अधिकारियों के चुनाव के लिए प्रत्याशियों को सरकार की एक समिति के समक्ष साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुजरना होगा. इसका मतलब साफ है कि इन नियुक्तियों में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की कोई भूमिका नहीं होगी जैसा कि आईएएस और अन्य केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों के मामले में होता है. इसके चलते अधिकारियों के चयन में निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता को लेकर अभी से शक जाहिर किया जाने लगा है.

इस प्रस्ताव का विरोध तेज हुआ

विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध इसलिए शुरू कर दिया है क्योंकि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का भी पालन नहीं किया जाएगा. राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने मोदी सरकार के इस फैसले को संविधान और आरक्षण विरोधी करार दिया है. उनका कहना है कि केंद्र का यह निर्णय यूपीएससी जैसी एक और सांविधानिक संस्था को बर्बाद करने की साजिश है, इसलिए उनकी पार्टी इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोलेगी.

कांग्रेस का भी आरोप है कि मोदी सरकार इस फैसले के जरिए आरएसएस और भाजपा के लोगों को पिछले दरवाजे से ब्यूरोक्रेसी में बैठाने की कोशिश कर रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व आईएएस पीएल पुनिया का कहना है कि सरदार वल्लभाई पटेल का नाम जपने वाली मोदी सरकार शायद नहीं जानती कि खुद सरदार पटेल नौकरशाही में लैटरल एंट्री के पुरजोर विरोधी थे. उनके अनुसार सरदार पटेल ने कहा था कि तय प्रक्रिया (यूपीएसी के द्वारा नियुक्ति) से चुनकर आए अफसरों की तुलना में दूसरे लोगों को प्रभावशाली बनाना गलत होगा.

इसके अलावा माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने भी सरकार के इस फैसले को आरक्षण टालने की कवायद करार दिया है.

ऐसा नहीं है कि विरोध के ऐसे सुर केवल विपक्षी दलों के ही हैं. आईएएस सहित दूसरी प्रशासनिक सेवाओं के अफसर भी दबी जबान में इस फैसले की मुखालफत कर रहे हैं. सत्याग्रह से हुई बातचीत में कई अ​धिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आईएएस, आईपीएस जैसी सेवाएं दूसरी नौकरियों से अलग हैं क्योंकि यहां चयन का आधार मेधा और अनुभव के अलावा संवेदनशीलता भी होती है. इनके अनुसार सिविल सेवा की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में संवेदनशीलता की गहन परीक्षा के बाद ही नियुक्ति हो पाती है. लेकिन लैटरल एंट्री में ऐसे लोग आ सकते हैं जिनमें इस गुण का अभाव हो. इसके अलावा नियुक्ति में जवाबदेही और पारदर्शिता के कम होने की आशंका के चलते भी सरकार के ताजा फैसले का विरोध हो रहा है.

लैटरल एंट्री की शुरुआत मनमोहन सरकार ने की थी

वैसे अफसरशाही के शीर्ष पदों पर लैटरल एंट्री कोई नया मामला नहीं है. पहले भी ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जब सरकारों ने समय-समय पर दूसरे पेशे के लोगों को उन पदों पर बिठाया है जो आईएएस या अन्य समकक्ष सेवाओं के अधिकारियों के पद माने जाते हैं. हाल के दिनों में शशांक शेखर सिंह इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं. वे 2007 से 2012 के बीच उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के समय राज्य के कैबिनेट सचिव थे. हालांकि पेशे से वे आईएएस अधिकारी होने के बजाए एक पायलट थे.

उधर कांग्रेस द्वारा ताजा फैसले के विरोध के बीच एक तथ्य जानना जरूरी है कि लैटरल एंट्री का विचार बीते कुछ सालों में मजबूत बनकर उस मनमोहन सिंह सरकार के समय ही उभरा था जिसको राजद का समर्थन भी हासिल था. यूपीए के पहले कार्यकाल में अगस्त 2005 में गठित दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) को प्रशासन में सुधार के विस्तृत उपाय सुझाने के लिए बनाया गया था. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री एम वीरप्पा मोइली इसके अध्यक्ष थे. मनमोहन सरकार को नवंबर 2008 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में उन्होंने सिफारिश की थी कि नौकरशाही के शीर्ष पदों पर लैटरल एंट्री से अधिकारियों को नियुक्त किया जाए. अपनी 10वीं रिपोर्ट के पैराग्राफ 9.8 (अध्याय नौ के आठवें पैराग्राफ) में आयोग ने सिफारिश की थी कि केंद्र सरकार ‘केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण (सीसीएसए)‘ का गठन करे जो बाकी कामों के साथ-साथ उन पदों की भी पहचान करेगा जहां पर लैटरल एंट्री के जरिये अधिकारियों की बहाली की जा सकती है.

आईपीएस में लैटरल एंट्री की कोशिश नाकाम हो चुकी है

इसके बाद इस विचार को अमलीजामा पहनाते हुए मनमोहन सरकार के गृह मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता पी चिदंबरम ने सबसे पहले आईपीएस में लैटरल एंट्री को आजमाने का फैसला लिया. आईपीएस के सैकड़ों पदों के खाली होने और प्रचलित तरीके से इन पदों को भरने में कई सालों का समय लगने का तर्क देते हुए मार्च 2012 में लैटरल एंट्री का विज्ञापन निकाला गया था. आईपीएस लिमिटेड कॉम्पटीटिव एक्जामिनेशन-2012 नामक इस परीक्षा में 255 पदों पर भर्ती किए जाने का प्रस्ताव था. इसके विज्ञापन में बताया गया था कि इसमें वे लोग ही आवेदन दे सकते हैं जो पहले से सेना में कैप्टन या मेजर या अर्द्धसैनिक बलों में सहायक कमांडेंट या राज्य पुलिस सेवाओं में डीएसपी के पदों पर कार्यरत होंगे. लेकिन बहाली की यह प्रक्रिया कभी पूरी न हो सकी.

इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि यूपीएससी सहित कई पक्षों ने लैटरल एंट्री में परखे जाने वाले योग्यता मानकों को सिविल सेवा के परीक्षा मानकों से कमतर होने का आरोप लगाया. इसके बाद इस परीक्षा के औचित्य को अदालतों में चुनौती दी गई. अंतत: छह साल की जद्दोजहद के बाद जनवरी 2018 में केंद्र सरकार ने इस बहाली को रद्द करने का फैसला लिया. इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार का यह फैसला मान लिया. ऐसे में आलोचकों की राय है कि लैटरल एंट्री को लेकर उठ रहीं तमाम आशंकाओं को दूर किए बिना मोदी सरकार का प्रयास भी इस माले में नाकाम साबित हो सकता है.