ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने के बाद इस मुद्दे पर भारत ने अपना रुख साफ़ कर दिया है. बीते हफ्ते ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ की भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि भारत की विदेश नीति किसी देश के दबाव में नहीं चलती. उनका यह भी कहना था कि भारत केवल उन्हीं प्रतिबंधों का पालन करेगा जो संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर लगाए थे. स्वराज के मुताबिक अमेरिका के प्रतिबंधों के बाद भी भारत ईरान से व्यापार करता रहेगा.

अमेरिका की भारत से जिस तरह की करीबियां हैं उसे देखते हुए भारत का यह रुख हैरान करने वाला है. साथ ही अगर व्यापार के लिहाज से भी देखें तो भारत का अमेरिका से 115 अरब डॉलर सालाना का कारोबार है जिसके सामने ईरान का 13 अरब डॉलर का कारोबार कहीं नहीं टिकता. व्यापार के मामले पर चिंता की लकीरें तब और गहरी हो जाती हैं जब अमेरिकी चेतावनी के बारे में पता लगता है. ईरान डील से हटने के बाद अमेरिका ने कहा है कि जो कंपनियां ईरान में व्यापार करेंगी या उसका तेल खरीदेंगी, उन पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लागू होंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि इस सब के बाद भी भारत ने आखिर ईरान को तरजीह देने का फैसला क्यों किया है.

दुनिया के कई जानकार भारत के इस रुख के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण बताते हैं. इनके मुताबिक इस रुख का पहला कारण भारत की ऊर्जा पर बहुत ज्यादा निर्भरता है. हालांकि, इस मामले में भारत इराक और सऊदी अरब पर भी निर्भर है. लेकिन, ईरान के मामले में अलग यह है कि 2016 के बाद से ये दोनों देश डॉलर के साथ-साथ रुपए और ईरानी मुद्रा रियाल में भी एक-दूसरे से व्यापार करते हैं. यह दोनों ही देशों के लिए फायदेमंद भी है. साथ ही इसके चलते इन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद डॉलर के लेन-देन में आने वाली परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ेगा.

रुपए और रियाल में लेन-देन से ईरान को एक और फायदा भी है. हाल ही में चीन में हुई शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में इसके सदस्य देशों के बीच अपनी मुद्रा में व्यापार करने को लेकर सहमति बनी है. देखा जाए तो विपरीत परिस्थितियों में लिए गए इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ ईरान को ही मिलेगा. अब ईरान अगर भारतीय मुद्रा में तेल बेचता है तो वह इस मुद्रा के जरिये एससीओ के सदस्य देशों से भी व्यापार कर सकेगा.

अगर भारत से ईरान को होने वाले निर्यात की बात करें तो इस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी में बतौर भारतीय प्रतिनिधि काम कर चुके शील कांत शर्मा एक न्यूज़ एजेंसी को बताते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत ईरान को 60 प्रतिशत से ज्यादा अनाज का निर्यात करता है जो अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आता.

भारत और ईरान मामलों के कुछ जानकार भारत के रुख के पीछे कई कूटनीतिक कारण भी बताते हैं. इनके मुताबिक पहला बड़ा कारण ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह है. भारत के लिए यह बंदरगाह बहुत ज्यादा महत्व रखता है. इससे वह पाकिस्तान में प्रवेश किए बिना ही सीधे अफगानिस्तान और खनिज पदार्थों की बहुलता वाले मध्य एशियाई देशों में भी अपनी पहुंच बना सकेगा. चाबहार के जरिये भारत इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को भी कुछ हद तक कम करने के प्रयास में है, जो चाबहार के नजदीक ही पाकिस्तानी क्षेत्र में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण करवा रहा है.

जानकार कहते हैं कि भारत अमेरिका के दबाव में आकर अब इसलिए भी पीछे नहीं हट सकता क्योंकि उसने चाबहार बंदरगाह के निर्माण के लिए 50 करोड़ डॉलर यानी तीन हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश की योजना बनाई है और इस रकम का एक बड़ा हिस्सा वह चाबहार पर लगा भी चुका है.

कुछ विशेषज्ञ भारत द्वारा ईरान का साथ देने का दूसरा बड़ा कारण पाकिस्तान को बताते हैं. ईरान और पाकिस्तान दोनों ही मुस्लिम देशों के इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के सदस्य हैं. पाकिस्तान इस संगठन में कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के विरुद्ध समर्थन जुटाने की भरपूर कोशिश करता है लेकिन ईरान और मध्यपूर्व के कुछ अन्य देशों की वजह से ही वह ऐसा नहीं कर पाता. इसके अलावा ईरान कई अन्य मौकों पर भारत के साथ खड़ा दिखा है. कुलभूषण जाधव के मामले पर भी उसने पाकिस्तान की जगह भारत का साथ दिया था.

भारत की आंतरिक राजनीति भी एक कारण

इस समय भारत द्वारा ईरान का साथ देने की एक वजह भारत की आंतरिक राजनीति भी मानी जा रही है. कुछ विशेषज्ञ तो ईरान पर लगे प्रतिबंधों को नरेंद्र मोदी की सरकार और पार्टी के लिए काफी अच्छा बताते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका ने ईरान से तेल खरीद रही कंपनियों को ऐसा करने के लिए नवंबर तक की मोहलत दी है. यानी नवंबर में यह मोहलत खत्म होने के बाद अमेरिका के डर के चलते दुनिया की कई कंपनियां ईरान से तेल और गैस खरीदना बंद कर देंगी जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढेंगी.

ये लोग कहते हैं कि यह सब तब हो रहा होगा जब भारत में तीन राज्यों के चुनाव होने वाले होंगे. साथ ही इसके छह महीने बाद ही आम चुनाव भी होगा. जीएसटी और नोटबंदी के बाद देश में तेल के दाम बढने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा जिसका खामियाजा भाजपा को इन चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.

लेकिन, जानकार कहते हैं कि ईरान के साथ बने रहने की वजह से नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी इस स्थिति से बच सकती है. दरअसल, दुनिया में बढ़ी तेल की कीमतों के बीच भारत के लिए ईरान से तेल के दामों में तोलमोल करना आसान हो जाएगा. ईरान की भी स्थिति ऐसी है कि वह ना-नुकुर नहीं कर सकेगा और कम दाम पर भी भारत को तेल बेचने पर तैयार हो जाएगा. ईरान यह भी अच्छे से जानता है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है ऐसे में प्रतिबंधों के बीच भारत को तेल बेचना उसके लिए किसी बड़ी राहत से काम नहीं होगा.

भारत जानता है कि वह अकेला नहीं है

कुछ जानकार इस मामले में यह भी बताते हैं कि अगर भारत इस मामले पर खुल कर बोल रहा है तो इसका सबसे बड़ा कारण उसका नैतिक रूप से सही होना और अकेला न होना है. ये लोग कहते है कि ईरान डील से अलग होने का अमेरिका कोई ऐसा कारण नहीं बता पाया जो नैतिक रूप से सही हो. यही वजह है कि परमाणु ऊर्जा एजेंसी से लेकर यूरोपीय देश, रूस और चीन सभी ईरान के साथ हैं. साथ ही भारत यह भी जानता है कि जिस तरह से फ़्रांस, जर्मनी, रूस और चीन प्रयास कर रहे हैं उससे जल्द ही इस मामले में कोई बीच का रास्ता निकल आने की भी उम्मीद है.

इन सबमें एक अहम बात यह भी है कि भारत के फैसले को लेकर इजरायल के कई मीडिया संस्थान उसकी आलोचना कर रहे हैं. इनका कहना है कि भारत ने यह फैसला अपनी पुरानी नीतियों से हटकर लिया है जिसका कोई स्वरूप नहीं है. हालांकि, कई जानकार ऐसा नहीं मानते. इनके मुताबिक भारत अपनी पुरानी नीतियों पर ही चल रहा है. वह हमेशा से गुट निरपेक्ष रहा है और एक साथ अमेरिका-रूस और ईरान-सऊदी अरब जैसे देशों को साधता आया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते भी भारत की यह नीति काफी हद तक कारगर साबित होती दिख रही है. आज भारत ईरान और सऊदी अरब दोनों से तेल खरीदता है. इजरायल से ड्रोन और मिसाइल, फ्रांस और रूस से लड़ाकू विमान और अमेरिका से हथियार. इसके अलावा भारत अपने शत्रु देश पाकिस्तान से गलबहियां करने वाले चीन के भी करीब जा रहा है.

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