आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अभियान शुरू करने की घोषणा कर दी है. पार्टी ने इसके लिए नारा दिया है – एलजी दिल्ली छोड़ो. इसमें कोई दोराय नहीं कि काफी हद तक यह पूरी कवायद राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश है, फिर भी इसने एक ऐसे मुद्दे पर चर्चा की गुंजाइश बना दी है, जो अभी तक दबा हुआ था. हालांकि यह चर्चा आगे बढ़े, इसके लिए जरूरी है कि इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्ष अपने-अपने रुख में लचीलापन लाएं.

इस मुद्दे से जुड़ी सच्चाई यह है कि दिल्ली की स्थापना के जो दो बुनियादी आधार हैं, वे परस्पर विरोधाभासी हैं. यहां एक तरफ तो एक चुनी हुई विधानसभा और सरकार है, वहीं दूसरी तरफ संविधान का अनुच्छेद 239एए इस सरकार के अधिकारों में कटौती करता है. इस विरोधाभास के पीछे की दलील भी समझी जा सकती है. राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते यहां की कुछ व्यवस्थाएं और सुरक्षा से जुड़े पहलू केंद्र सरकार की जिम्मेदारी हैं और संविधान का अनुच्छेद 239एए उसे इन मसलों पर नियंत्रण का कानूनी अधिकार देता है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी और केंद्र में भाजपा की सरकार आने के पहले तक यहां राज्य और केंद्र की सरकारें आपस में बातचीत और समझौते से सभी मुद्दों का हल निकालती रही हैं. लेकिन बीते तीन-चार सालों में यह स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. इस बीच दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) पर कई बार आरोप लगे कि वे ‘आप’ सरकार के कामकाज में बाधा डाल रहे हैं और यहां तक कि उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी जांच के अधिकार भी दिल्ली सरकार से वापस लिए हैं.

वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इन मतभेदों को नाटकीय तरीके से उठाते हुए इन्हें बढ़ाने का ही काम किया. उदाहरण के लिए ‘आप’ ने पूर्ण राज्य के लिए नारा दिया है – एलजी दिल्ली छोड़ो. यह नारा अप्रत्यक्ष रूप से उपराज्यपाल की तुलना ब्रिटिश हुकूमत के वायसराय से करता है और केंद्र सरकार को उपनिवेशवादी सत्ता के तौर पर पेश करता है.

कानूनी रूप से दिल्ली हाई कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि यहां के प्रशासन का मुखिया, उपराज्यपाल है. लेकिन इसके साथ यह भी सही है कि चुनी हुई सरकार यहां की जनता के लिए जवाबदेह है और उसे अपने हिस्से की स्वायत्ता मिलनी चाहिए. मसलन उसके पास प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार तो होना ही चाहिए.

इन हालात में एक बीच का रास्ता भी निकाला जा सकता है. यह 2003 की बात है. तब केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार थी और तब भाजपा ने लोक सभा में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने से जुड़ा एक विधेयक पेश किया था. उस समय एक संसदीय समिति ने सिफारिश की थी कि केंद्र सरकार नई दिल्ली नगरपालिका परिषद के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र का प्रशासनिक कामकाज देखे और बाकी सभी क्षेत्रों में दिल्ली विधानसभा को शासन-प्रशासन के सभी अधिकार दे दिए जाएं. हालांकि ऐसे और इसके साथ अन्य प्रस्तावों पर भी बातचीत तभी आगे बढ़ सकती है जब दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर तीखे आरोप-प्रत्यारोप बंद हों. (स्रोत)