पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाने के बाद उनके बारे में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा है कि अगर 2019 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो संघ प्रणब मुखर्जी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे कर सकता है. उद्धव ठाकरे अकेले नहीं हैं जो इस तरह की अटकलें लगा रहे हैं. कई दूसरे लोगों को भी लगता है कि संघ ने एक राजनीतिक योजना के तहत प्रणब मुखर्जी को बुलाया था और भविष्य में उन्हें फिर से राजनीति में सक्रिय करने की कोशिश हो सकती है.

उधर, प्रणब मुखर्जी की बेटी और कांग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा है कि उनके पिता अब कभी सक्रिय राजनीति में नहीं आएंगे. लेकिन उनकी बातों को कोई भी अधिक तरजीह देने को इसलिए तैयार नहीं है क्योंकि उन्होंने तो सार्वजनिक तौर पर अपने पिता को संघ के कार्यक्रम में जाने से भी मना किया था, फिर भी प्रणब मुखर्जी वहां गए.

राष्ट्रपति पद से हटने के बाद प्रणब मुखर्जी के दोबारा राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने की संभावनाओं पर अटकलबाजी कुछ महीने पहले भी चली थी. लेकिन उस वक्त उन्हें कांग्रेस में दोबारा सक्रिय करने की बात चल रही थी. लंबे समय तक कांग्रेस में रहे मणिशंकर अय्यर ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. इस लेख का सार यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने प्रणब मुखर्जी को दूसरा कार्यकाल नहीं देकर कांग्रेस पार्टी पर बड़ा उपकार किया है. अय्यर ने प्रणब मुखर्जी के राजनीतिक अनुभव और राष्ट्रपति बनने के पहले की उनकी राजनीतिक सक्रियता का हवाला देते हुए यह इच्छा जताई थी कि उन्हें फिर से राजनीति में सक्रिय होना चाहिए.

मणिशंकर अय्यर ने सीधे तो नहीं लिखा, लेकिन इसका पूरा संकेत दे दिया था कि वे अब भी प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की संभावना को खारिज नहीं कर रहे. उन्होंने एक तरफ तो यह लिखा कि अब वे कभी प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद पर नहीं देख सकते, लेकिन अगर कोई चमत्कार हो जाए तो ऐसा हो भी सकता है. इसके तुरंत बाद उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में चमत्कार होते रहते हैं.

अब प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं पर एक बार फिर से बातचीत शुरू हुई है. लेकिन इस पर चर्चा करने से पहले जान लेते हैं कि प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति भले ही 2012 में बने हों, लेकिन इसके पहले के तकरीबन 30 सालों में उनके राजनीतिक जीवन में एक से ज्यादा बार ऐसे मौके आए जब यह लगा कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहद नजदीक पहुंच गए हैं. पहला मौका तो 1984 में तब आया जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई. लेकिन उस समय जिस तरह से राजीव गांधी का प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ ग्रहण कराया गया उससे नाराज होकर प्रणब मुखर्जी ने अपनी नई पार्टी बना ली. उस घटना ने साफ कर दिया कि प्रणब मुखर्जी के मन में प्रधानमंत्री बनने की लेकर इच्छा कोई दबी-छिपी नहीं थी. हालांकि, बाद में वे फिर से कांग्रेस में आ गए.

प्रणब मुखर्जी के सामने एक ऐसा ही दूसरा मौका तकरीबन 20 साल बाद आया. 2004 में तमाम अनुमानों को धता बताते हुए सोनिया गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को हरा दिया. लगा कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन जाएंगी. लेकिन ऐन मौके पर जब सोनिया गांधी ने ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने से इनकार कर दिया तो चर्चा चलने लगी कि अब प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बन सकते हैं. पर उस वक्त सोनिया ने मनमोहन सिंह पर यकीन करना उचित समझा.

तो ऐसे में क्या प्रणब मुखर्जी के लिए अब भी प्रधानमंत्री बनने की कोई संभावना बच जाती है? इसमें जाने से पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या कोई राष्ट्रपति पद से हटने के बाद राजनीति में फिर से सक्रिय हो सकता है या प्रधानमंत्री बन सकता है. संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पूर्व राष्ट्रपति को राजनीति में फिर से सक्रिय होने या प्रधानमंत्री बनने से रोके. लेकिन यह परंपरा का हिस्सा जरूर रहा है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोबारा दलगत राजनीति में नहीं आते. हां, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने और इसमें हारने के बाद राजनीति में सक्रिय रहने वालों की फेहरिस्त छोटी नहीं है.

यह परंपरा राज्यपालों के बारे में भी रही है. लेकिन संवैधानिक बाध्यता इस मामले में भी नहीं है. पिछले कुछ सालों में यह परंपरा टूटी भी है. सुशील कुमार शिंदे राज्यपाल रहने के बाद दोबारा सक्रिय राजनीति में आए और मनमोहन सिंह सरकार में वे पहले ऊर्जा मंत्री और बाद में गृह मंत्री बने. सुशील कुमार शिंदे 2002 का उपराष्ट्रपति चुनाव भी राजग उम्मीदवार भैरो सिंह शेखावत के खिलाफ लड़े थे. केरल के राज्यपाल रहे निखिल कुमार बिहार ने औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. उनके बाद केरल की राज्यपाल बनाई गईं शीला दीक्षित भी इस पद से हटने के बाद दोबारा कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुईं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन होने से पहले पार्टी ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था. राष्ट्रपति के मामले में ऐसा कोई उदाहरण अब तक नहीं है.

राष्ट्रपति का पद भारत में 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के साथ अस्तित्व में आया. इसके पहले राष्ट्रपति के समकक्ष गवर्नर जनरल का पद था. आजादी के तुरंत बाद अस्तित्व में आए इस पद पर रहने वाले एकमात्र भारतीय थे चक्रवर्ती राज गोपालाचारी. लेकिन बाद में राजेंद्र प्रसाद को भारत का पहला राष्ट्रपति चुना गया और वे जवाहरलाल नेहरू सरकार में मंत्री बन गये. वे नेहरू कैबिनेट में कई दिनों तक बगैर किसी मंत्रालय के मंत्री रहे और सरदार पटेल के निधन के बाद गृह मंत्री बने. इसके बाद 1952 में वे मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री बने. उस वक्त आंध्र प्रदेश भी मद्रास का ही हिस्सा था. 1953 में इस राज्य से अलग होकर आंध्र प्रदेश बना और मद्रास प्रांत का नाम तमिलनाडु कर दिया गया.

राजगोपालाचारी का उदाहरण बताता है कि जिसे आम तौर पर उल्टी गंगा बहाना कहा जाता है, वैसी घटना भारत के इतिहास में पहले भी हुई है. तो क्या प्रणब मुखर्जी राजगोपालाचारी की राह चलेंगे? मणिशंकर अय्यर ने लिखा है कि उन्होंने एक बार राजगोपालाचारी का उदाहरण प्रणब मुखर्जी के सामने रखा था लेकिन, वे इतने नीतिपरक हैं कि उन्होंने इस प्रस्ताव पर मौखिक तो क्या हाव-भाव से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि शर्मिष्ठा मुखर्जी की यह बात सही है कि प्रणब मुखर्जी अब कभी भी सक्रिय राजनीति में नहीं आएंगे? भारत में भले ही ऐसा उदाहरण अब तक नहीं हो लेकिन फिर भी अगर एक पूर्व राष्ट्रपति राजनीति में सक्रिय होना चाहे तो इसके लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है. हां, यह अब तक की परंपरा के खिलाफ जरूर होगा और इसे लेकर नैतिकता से जुड़े कई सवाल उठ सकते हैं.

पूर्व राष्ट्रपति के प्रधानमंत्री पद पर आ जाने से भारतीय संविधान में संवैधानिक पदों का जो वरीयता क्रम है उसमें भी अजीब स्थिति पैदा हो सकती है. इसमें राष्ट्रपति शीर्ष पर होते हैं, फिर उपराष्ट्रपति और तीसरे नंबर पर प्रधानमंत्री. चौथा स्थान प्रदेश के अंदर उस प्रदेश के राज्यपाल का होता है और पांचवें स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति होते हैं. अगर किसी तरह प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो इस सूची में पहले स्थान पर रहने के बाद उन्हें बतौर प्रधानमंत्री तीसरे स्थान पर रहना होगा.

भारत में भले ही राष्ट्रपति के प्रधानमंत्री पद पर वापस आने का कोई उदाहरण नहीं हो लेकिन दुनिया के कुछ दूसरे देशों में ऐसे उदाहरण हैं. इनमें सबसे प्रमुखता से रूस का नाम लिया जा सकता है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन राष्ट्रपति पद पर रहने के बाद प्रधानमंत्री बने और फिर इसके बाद राष्ट्रपति पद पर दोबारा वापस आए. लेकिन रूस न तो हमारे जितना परिपक्व लोकतंत्र है और न ही व्लादिमीर पुतिन इस व्यवस्था के एक अनुकरणीय उदाहरण.