देश में खुदरा महंगाई दर अब अप्रैल के बाद मई में भी बढ़ गई है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने मंगलवार को बताया कि पिछले महीने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की वृद्धि दर 4.87 फीसदी तक चली गई है. यह चार महीनों में इसका उच्चतम स्तर है. इससे पहले अप्रैल में इसमें 4.58 फीसदी जबकि मार्च में 4.28 फीसदी की वृद्धि हुई थी. इस तरह नवंबर से यह लगातार सातवां महीना है जब खुदरा महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के चार फीसदी के औसत लक्ष्य से ज्यादा रही है. इससे केंद्र और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) दोनों का चिंतित होना लाजमी माना जा रहा है.

सीएसओ के मुताबिक मई में खुदरा महंगाई बढ़ने की मूल वजह फल और सब्जियों का महंगा होना रही है. इसके चलते पिछले महीने खुदरा खाद्य महंगाई दर (सीएफपीआई) भी अप्रैल के 2.8 फीसदी से बढ़कर 3.1 फीसदी हो गई. यही नहीं, मई में शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी सेवाओं के साथ आवासीय सुविधा, फुटवियर और कपड़े भी पांच फीसदी से ज्यादा महंगे हो गए हैं. पिछले माह हालांकि दाल और चीनी जैसे उत्पाद पिछले साल की तुलना में सस्ते हुए हैं. यह सरकार के लिए राहत भरी खबर है.

वैसे पिछले महीने 14 तारीख के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम जैसे अचानक महंगे हो गए थे उससे जानकारों को इस बात का पूरा अनुमान था कि खुदरा महंगाई बढ़ जाएगी. यही कारण था कि समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अर्थशास्त्रियों के बीच कराए गए अपने एक सर्वेक्षण में बताया कि मई में खुदरा महंगाई दर 4.83 फीसदी के आसपास रह सकती है. और वास्तव में ऐसा ही हुआ. उधर, कई कारणों से ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस साल सर्दी से पहले महंगाई के घटने के कोई आसार नहीं हैं.

देश का केंद्रीय बैंक आरबीआई भी इससे सहमत है. पिछले ही हफ्ते नीतिगत दरों की समीक्षा के बाद उसने बताया कि वित्त वर्ष 2018-19 में औसत खुदरा महंगाई दर के 4.8 फीसदी रहने की संभावना है. इससे पहले अप्रैल में उसका यह अनुमान केवल 4.65 फीसदी का था. ताजा आकलन में उसने कहा है कि अप्रैल से सितंबर के बीच महंगाई दर 4.8 से 4.9 फीसदी के बीच रह सकती है. हालांकि उसके बाद के छह महीनों में इसके थोड़ा घटकर 4.7 फीसदी रहने का अंदाजा है. वहीं महंगाई कम करने की गरज से उसने ब्याज दरें भी चौथाई फीसदी बढ़ा दी हैं. इस बीच महंगाई के ताजा आंकड़े आने के बाद आरबीआई के इस कदम का समर्थन कर रहे लोग कह रहे हैं कि उसका यह फैसला बहुत वाजिब था. ऐसा इसलिए कि कई वजहों से अगले कुछ महीनों तक खुदरा महंगाई के बढ़ने का पूरा अनुमान है. इसके मोटे तौर पर सात कारण बताए जा रहे हैं.

कच्चे तेल के बढ़ते दाम

जून में कच्चा तेल हालांकि ओपेक के प्रमुख देशों और रूस से मिले इस संकेत के बाद थोड़ा सस्ता हुआ है कि वे निकट भविष्य में इसका उत्पादन बढ़ाने की सोच रहे हैं. वैसे इस बारे में कोई फैसला वियना में 22 जून को होने वाली एक बैठक में लिया जाएगा. लेकिन मुश्किल यह है कि ईरान और वेनेजुएला जैसे ओपेक के कई देश ऐसे प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं. इस वजह से कइयों को उत्पादन बढ़ाने का फैसला होने की उम्मीद बहुत कम लग रही है. जानकारों का मानना है कि उत्पादन बढ़ाने पर यदि सहमति नहीं बनी तो कच्चा तेल फिर से महंगा होने लगेगा. इससे हमारे देश में और कई महीनों तक महंगाई से परेशानी होते रहने की आशंका काफी बढ़ जाएगी.

बरसात में खाद्य महंगाई के बढ़ने की संभावना

जानकारों के अनुसार गर्मी और बरसात के चलते अगले तीन-चार महीनों में खाने-पीने के कई सामान जैसे सब्जियां और फल और महंगे हो सकते हैं. इस चलते हो सकता है कि सितंबर आते-आते किसी महीने यह आरबीआई के मध्यकालिक लक्ष्य की उच्चतम सीमा (छह फीसदी) को भी छू ले.

डॉलर की तुलना में रुपये का कमजोर होना

अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और वहां ब्याज दरें लगातार बढ़ने से भारतीय मुद्रा इस साल लगातार कमजोर बनी हुई है. अभी खबर आई है कि रुपये को मजबूत बनाने के लिए आरबीआई ने अप्रैल में 800 करोड़ डॉलर से ज्यादा की बिकवाली की है. इसके साथ वह एनआरआई बॉन्ड उतारने की योजना पर भी काम कर रहा है. इसके बावजूद एक डॉलर की कीमत अभी 67.5 रुपये के आसपास है. रुपये की कमजोरी से आयात महंगा हो जाता है जिससे देश में महंगाई भी पहले से बढ़ जाती है.

निम्न आधार प्रभाव

खुदरा महंगाई के आकलन में आधार प्रभाव यानी बेस इफेक्ट की बड़ी भूमिका होती है. 2017 की पहली छमाही में औसत खुदरा महंगाई दर केवल 2.89 फीसदी थी. जून में तो यह अपने पांच साल के न्यूनतम स्तर - 1.54 फीसदी - तक पहुंच गई थी. हालांकि कच्चा तेल के महंगा होने के चलते अक्टूबर से यह बढ़ते-बढ़ते 3.8 फीसदी तक पहुंच गई थी. इसलिए माना जा रहा है कि मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल से सितंबर तक खुदरा महंगाई के आंकड़े केवल इस वजह से करीब आधा प्रतिशत बढ़कर दिखेंगे. हालांकि प्रतिकूल आधार प्रभाव कम होने पर सितंबर के बाद महंगाई के थोड़ा नरम होने का अंदाजा लगाया गया है.

समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी

खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी में वृद्धि करने के मोदी सरकार के फैसले से आगामी खरीफ सीजन में फसलों की कीमत करीब एक तिहाई बढ़ने का अनुमान है. इससे भी महंगाई के चढ़ने की संभावना है.

सातवें वेतन आयोग के तहत आवासीय भत्ते में बढ़ोतरी

केंद्र सरकार के फैसले के बाद राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों को इसका लाभ देने लगी है. इससे अगले कई महीनों तक बाजार में ज्यादा धनराशि खर्च होने का आकलन है जिससे खुदरा महंगाई का बढ़ना तय है. जानकारों का मानना है कि इस साल के अंत से इस फैसले का असर धीरे-धीरे कम होना शुरू हो सकता है.

सरकारी खर्च बढ़ाने का केंद्र सरकार का फैसला

केंद्र ने मौजूदा वित्त वर्ष में पहले के लक्ष्य से 0.3 फीसदी ज्यादा यानी 3.3 फीसदी राजकोषीय घाटा (वह राशि जो सरकार के आय से ज्यादा खर्च होती है) रखने का लक्ष्य तय किया है. अगले साल लोकसभा चुनाव होने के चलते राज्यों में भी ऐसा होने की संभावना है. केवल इस फैसले से बाजार में करीब एक लाख करोड़ रुपये ज्यादा आने का अनुमान है.