बीते 14 जून को रूस में फीफा विश्व कप 2018 की शुरुआत हो चुकी है. दुनिया फुटबॉल के रंग में रंग चुकी है. भारत इस महाकुंभ का हिस्सा नहीं है, पर टीवी पर ‘मेरी दूसरी कंट्री’ वाले विज्ञापन देखते-देखते कइयों ने अपनी पसंदीदा फुटबॉल टीम चुन ली होगी. आज हम फुटबॉल में अपना दूसरा देश चुन रहे हैं. पर ‘सत्य के प्रयोग’ करने वाले भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक सदी से भी पहले दक्षिण अफ्रीका जैसे दूसरे देश में फुटबॉल के साथ अनोखे सामाजिक-राजनीतिक प्रयोग किये थे.

दक्षिण अफ्रीका में गांधी के राजनीतिक जीवन के बारे में तो काफी कुछ लिखा गया है लेकिन, वहां उनके फुटबॉल के प्रति लगाव और कैसे उन्होंने इस खेल के जरिये नस्लभेदी-रंगभेदी कानून के खिलाफ लड़ाई लड़ी, इस पर कम चर्चा हुई है. मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में अफ्रीकन इतिहास के प्रोफेसर पीटर एल्गी एक साक्षात्कार में बताते हैं, ‘गांधीजी 1896 में स्थापित ट्रांसवाल इंडियन फुटबॉल एसोसिएशन के संस्थापकों में से एक थे. यह अफ्रीका का पहला संगठित क्लब था जिसका संचालन पूरी तरह से अश्वेत लोगों के हाथ में था.’

दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए महात्मा गांधी के फुटबॉल से लगाव का बहुत ज्यादा दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया. लेकिन वहां की वाचिक परंपरा में गांधी एक ऐसे शख्स के तौर पर याद किये जाते हैं जिसने न केवल अफ्रीकी अश्वेतों और प्रवासी भारतीयों को फुटबॉल से जोड़ा बल्कि दक्षिण अफ्रीका की वर्तमान बहुरंगी खेल संस्कृति की नींव रखी.

फुटबॉल से बापू का लगाव कैसे हुआ?

महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा में अपने बचपन का जो वर्णन करते हैं उससे कहीं यह नहीं लगता कि वे किसी खेल में कोई विशेष रुचि रखते थे. 18 साल की उम्र में अपना गृहनगर पोरबंदर छोड़कर वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे. यही वह वक्त था जब फुटबॉल का उभार यूरोप में अपने चरम पर था. फुटबॉल एसोसिएशन को वैधानिक दर्जा मिल चुका था और व्यावसायिक क्लब खिलाड़ियों को प्रोफेशनल का दर्जा देने लगे थे. गांधी की भी इस सब पर नज़र थी और वे समझ चुके थे कि जल्द ही इंग्लैंड में फ़ुटबाल क्रिकेट से ज्यादा देखा जाने वाला खेल हो जाएगा. दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स सेटलमेंट ( जहां गांधी जी ने अपना पहला आश्रम बनाया था) के अाधिकारिक गाइड सीठोले फुटबॉल पैराडाइज से बातचीत में कहते हैं, ‘इंग्लैंड में रहने के दौरान ही गांधीजी फुटबॉल की ताकत को समझ चुके थे.’

लेकिन फुटबॉल को राजनीतिक चेतना के तौर पर इस्तेमाल करने का तरीका गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका पहुंचने के बाद ही सूझा. 1893 में अपनी कानून की पढ़ाई पूरी कर जब वे दादा अब्दुला एंड कंपनी के वकील बनकर दक्षिण अफ्रीका के लिये रवाना हुए तो उनके मन में एक नए देश को जानने की उत्सुकता थी. लेकिन जहाज के तट पर पहुंचते ही उनका भ्रम टूट गया. ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह’ में गांधी लिखते हैं, ‘जहाज के तट पर पहुंचते ही महसूस हुआ कि यहां भारतीयों का कोई सम्मान नहीं है.’

दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत फुटबॉल खिलाड़ियों के साथ गांधी
दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत फुटबॉल खिलाड़ियों के साथ गांधी

इसके बाद वह वाक़या हुआ जिसमें ट्रेन में पहले दर्जे का टिकट लेने के बाद भी गांधीजी को तीसरे दर्जे में सफर करने को कहा गया और विरोध करने पर उन्हें ट्रेन से नीचे फेंक दिया गया. इसी घटना ने गांधी के महात्मा होने की बुनियाद डाली. गांधी ने ठान लिया कि वे दक्षिण अफ्रीका में वंचित और भेदभाव के शिकार लोगों के लिए संघर्ष करेंगे.

फुटबॉल सत्याग्रह का औजार बना

अहिंसा और सविनय अवज्ञा महात्मा गांधी के प्रमुख हथियार थे. फिर उनकी नज़र फुटबॉल पर भी गई जो उस वक्त अफ्रीका में कमजोर और मजदूर वर्ग में लोकप्रिय खेल था. उनके मनोरंजन का यही एकमात्र जरिया था. मैच के दौरान काफी भीड़ जुटती थी. गांधीजी ने भांप लिया कि इस खेल में सामूहिकता का जो तत्व है वह नस्लभेद के खिलाफ उनकी लड़ाई में काफी मददगार साबित होगा. इतिहास के शोधकर्ता और केंद्रीय विद्यालय में प्रवक्ता अनुपम शुक्ल कहते हैं, ‘जैसे-जैसे दक्षिण अफ्रीका में गांधी की सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगीं, वैसे-वैसे फुटबॉल में उनका रुझान बढ़ने लगा. वे तमाम मैच देखने जाने लगे और वहां मौजूद अफ्रीकी और भारतीयों को उनके राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने लगे. मैच देखने आई भीड़ को वो समझाते थे कि कैसे अहिंसा और सत्याग्रह के जरिये हमें उन गोरों से समान अधिकार लेने हैं जो हमें दूसरे दर्जे का नागरिक समझते हैं.’

धीरे-धीरे नस्लभेद के कानून से अहिंसा के जरिये लड़ने वाले महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका के भारतीय समुदाय के सर्वमान्य नेता हो गए. 1904 के आसपास उन्होंने डरबन, प्रिटोरिया और जोहान्सबर्ग में तीन फुटबॉल क्लबों की स्थापना में मदद की. इन तीनों का नाम रखा गया पैसिव रजिस्टर्स क्लब. हालांकि दुर्भाग्य से इनसे जुड़े ज्यादा दस्तावेज संभाले नहीं गए. लेकिन डरबन के ओल्ड कोर्ट म्यूज़ियम में खिलाड़ियों के साथ उनकी तस्वीरें हैं. कुछ तस्वीरों में वे मैच देखने जुटी भीड़ को संबोधित भी कर रहे हैं.

क्या इस खेल में गांधी की निजी दिलचस्पी भी थी?

2010 में दक्षिण अफ्रीका में विश्व कप के आयोजन के समय फीफा ने महात्मा गांधी को एक ‘फुटबॉल लेजेंड’ बताया. यह भी दिलचस्प है कि गांधी को अपना आदर्श मानने वाले नेल्सन मंडेला भी 2010 के फीफा फाइनल में मौजूद थे. गांधी और फुटबाल, दोनों में दिलचस्पी रखने वाले अक्सर इस पर बहस करते हैं कि गांधी के लिए फुटबॉल सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का जरिया भर था या इस खेल में उनकी कोई निजी रुचि भी थी. 2010 में साउथ अफ्रीकन इंडोर फुटबाल एसोसिएशन के प्रेसीडेंट पी गोविंदस्वामी एक बातचीत में कहते हैं, ‘इसमें कोई शक नहीं कि फुटबॉल के जरिये गांधी सत्याग्रह, पैसिव रेजिस्टेंस जैसे मकसद हासिल करना चाहते थे क्योंकि उस समय फुटबाल के साथ टीम गेम का विचार बहुत गहरे से जुड़ा था और स्टार खिलाड़ी कल्चर दूर दूर तक न था. यही सामूहिकता और साथ में मिलकर कुछ हासिल करने का जुनून उन्हें सबसे ज्यादा प्रेरित करता था. लेकिन यह कहना गलत होगा कि गांधी के लिए फुटबॉल मैच सिर्फ जनसंवाद और पैसिव रजिस्टेंस आंदोलन के पर्चे बांटने की जगह थे. वे खुद इस खेल में गहरी रुचि रखते थे और इससे उन्हें आध्यात्मिक शांति मिलती थी.’

गांधी के अफ्रीका प्रवास को बड़ी बारीकी से दस्तावेजों में समेटने वाले जीआर नायडू की बेटी रेबेका नायडू भी इसकी काफी हद तक तस्दीक करती हैं कि अफ्रीका में रहते हुए गांधीजी को फुटबाल का जूनून था. फीफा से एक बातचीत में वे कहती हैं, ‘गांधीजी ने फुटबॉल के फीनिक्स सेटलमेंट में एक धूल भरे जमीन के टुकड़े को फुटबाल ग्राउंड में तब्दील करवाया था. जो आज हेरिटेज साइट है. 1903 में गांधी की मदद से साउथ अफ्रीकन एसोसिएशन ऑफ हिंदू फुटबॉल की स्थापना हुई जो अपेक्षाकृत बड़ा संगठन था और इसने लीग फुटबॉल में भारतीय और अश्वेत खिलाड़ियों का रास्ता खोला.’

100 कामरेड्स की गिरफ्तारी के विरोध में मैच

गांधीजी की मदद से प्रिटोरिया, जोहान्सबर्ग और डरबन में बने पैसिव रजिस्टर्स क्लब के कुछ मैचों ने अौपनेवेशिक दक्षिण अफ्रीका में खासी चर्चा बटोरी थी. 1910 में हुए ये मैच नस्लीय कानून का विरोध कर रहे 100 लोगों की गिरफ्तारी के विरोध में एक तरह का प्रदर्शन थे. इन मैचों में आई भीड़ से फंड भी एकत्र किया जाता था जो उन परिवारों की मदद के लिए दे दिया जाता था जो भेदभाव वाले कानून का अहिंसात्मक विरोध करते हुए गिरफ्तार कर लिए जाते थे.

कुछ और किस्से

मूनलाइटर्स दक्षिण अफ्रीका का एक प्रसिद्ध ब्लैक फुटबॉल क्लब था. इसकी स्थापना भारत से अंग्रेजों द्वारा ले जाये गए ठेका मजदूरों ने की थी. ये मजदूर अपने अनुबंध समाप्त होने के बाद होटलों में वेटर वगरैह का काम करने लगे. इस क्लब के नामकरण का किस्सा बहुत दिलचस्प है. एक दिन मून होटल में काम खत्म करने के बाद ये वेटर बैठे हुए थे. बात फुटबॉल पर चल निकली. तय हुआ कि क्लब बनाया जाय. लेकिन नाम पर बात फंस गई. तभी एक वेटर ने कहा, ’गर्मियों के दिन हैं और चारों तरफ चांद (मून) की रोशनी (लाइट) बिखरी है. यहीं से नाम सूझ गया- मूनलाइटर्स. इस अश्वेत फुटबॉल क्लब ने अफ्रीका में खूब नाम कमाया. इसी तरह जीआर नायडू के मैंनिंग रेंजर्स क्लब ने भी अफ्रीका के अश्वेत फुटबॉल क्लब में खूब चर्चा बटोरी. गांधीजी ने इन दोनों क्लबों की हर स्तर से मदद की. भारतीय और अश्वेत लोगों को दक्षिण अफ्रीकी फुटबॉल की मुख्यधारा में लाने में उनका खासा योगदान रहा.

भारत अाकर विचार बदले

दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद भी गांधीजी का वहां के फुटबॉल संगठनों से जुड़ाव बरकरार रहा. नवंबर 1921 से मार्च 1922 तक साउथ अफ्रीका का ‘क्रिस्टोफर कॉन्टिजेंट’ भारत के दौरे पर आया और देश के विभिन्न हिस्सों में उसने 14 मैच खेले. इनमें अहमदाबाद में हुए मैच में गांधीजी खुद मौजूद रहे. हालांकि बाद में उनकी धारणा खेल के बारे में काफी बदल गई. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उन्होंने कहा, ‘मेरे लिए सुदृढ़ शरीर वह है जो खेत में मेहनत करने से बनता है न कि फ़ुटबाल और क्रिकेट के मैदान में.’

हो सकता है कि तत्कालीन भारत के सामाजिक हालात देख उन्हें खेल एक विलासिता लगने लगे हों और उन्होंने सत्याग्रह के वे रास्ते निकाले जो भारत जैसे धर्मपरायण देश में अधिक मुफीद थे.