अगर किसी को हिंदी भाषा की मूलभूत जानकारी नहीं है और वह थोड़ा-बहुत इसे बोल-समझ नहीं पाता तो संभव है अब उसे आईआईएसईआर (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एज़ुकेशन एंड रिसर्च) जैसे संस्थान में नौकरी का मौका न मिले. इस संस्थान में कुछ खाली पदों को भरने के लिए निकाले गए विज्ञापन से इसका संकेत मिला है.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक आईआईएसईआर कोलकाता ने उपपंजीयक, कार्यकारी अभियंता, सहायक पंजीयक आदि के 20 पदों के लिए पिछले महीने विज्ञापन निकाला था. इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि आवेदकों को ‘हिंदी भाषा’ की मूलभूत जानकारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए. इन पदों के लिए आवेदन करने की आख़िरी तारीख़ 25 जून थी.
इस बाबत पूछे जाने पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी इसकी पुष्टि भी करते हैं. उनके मुताबिक, ‘सरकार (केंद्र की) ने नीतिगत निर्णय लिया है. इसके मुताबिक इन संस्थानों में काम करने वाले लोगों को राष्ट्रभाषा की मूलभूत जानकारी होनी चाहिए. सरकार का मानना है कि राष्ट्रभाषा पूरे देश को एक सूत्र में पिरोती है.’
हालांकि सरकार के इस फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है क्योंकि आईआईएसईआर के अधिकांश केंद्र ग़ैर-हिंदीभाषी शहरों में हैं. ये केंद्र तिरुअनंतपुरम (केरल), तिरुपति (आंध्र प्रदेश), पुणे (महाराष्ट्र), कोलकाता (पश्चिम बंगाल), बरहामपुर (ओडिशा), मोहाली (पंजाब) और भोपाल (मध्य प्रदेश) में हैं. इनमें भोपाल ही पूरी तरह हिंदीभाषी केंद्र है.
संभवत: इसीलिए भाषाई क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों ने इस फ़ैसले का विरोध किया है. कोलकाता के बांग्ला पोक्खो संगठन के गर्ग चटर्जी कहते हैं, ‘हिंदी शिक्षकों के लिए इस भाषा की जानकारी अनिवार्य रूप से होने की बात तो समझ में आती है. लेकिन ग़ैर-हिंदीभाषियों के लिए यह अनिवार्यता समझ से परे है.’ चेन्नई के सेंटर लैंग्वेज़ इक्वैलिटी एंड राइट्स के सेंथिल नाथन का कहना है, ‘सरकार का यह फ़ैसला लोगों को संविधान से मिले भाषाई समानता के अधिकार के ख़िलाफ़ है.’
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