प्रशासनिक सेवाओं में लैटरल एंट्री कराने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ दलित समूह भारत बंद की तैयारी में हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक अगस्त में स्वतंत्रता दिवस के आसपास इस बंद का आह्वान करने की योजना है. दलित कार्यकर्ता अशोक भारती का कहना है कि सरकार का यह कदम संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) जैसी संवैधानिक संस्था की उपेक्षा है. उनके मुताबिक लैटेरल एंट्री सिस्टम अनुसूचित जातियों व जनजातियों को आरक्षण देने की अनदेखी करता है.

इससे पहले बीते अप्रैल में एससी-एसटी एक्ट के कथित रूप से कमजोर होने के मुद्दे पर दलित संगठनों ने भारत बंद किया था. अशोक भारती ने कहा कि इस बार का भारत बंद संसद के मॉनसून सत्र में बुलाए जाने की योजना है ताकि आंदोलन की गूंज राष्ट्रीय स्तर पर सुनाई दे. उन्होंने कहा, ‘विरोध का मकसद यह संदेश देना है कि अगर (लैटरल एंट्री सिस्टम को लेकर) हमारी चिंताओं पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो दलित समुदाय 2019 के लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी को करारा जवाब देगा.’

बीते हफ्ते अलग-अलग केंद्रीय विभागों में संयुक्त सचिव के पद की नियुक्ति के लिए अधिसूचना जारी की गई थी. इसमें निजी क्षेत्र में कम से कम 15 साल का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों का केवल साक्षात्कार के आधार पर चयन किए जाने की बात कही गई है. मोदी सरकार में मंत्री राम विलास पासवान ने भी इस लैटरल एंट्री को लेकर सवाल उठाया है. द हिंदू की खबर के मुताबिक उन्होंने पूछा है कि क्या इसमें आरक्षण का प्रावधान लागू होगा. बताया जाता है कि राम विलास पासवान ने दलित मुद्दों पर बुलाई गई मंत्रियों के समूह की बैठक में यह बात उठाई. अखबार ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि इसी बैठक में मौजूद प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसमें आरक्षण लागू होने से इनकार किया है.