‘यूपी भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक इस समय निराशा के दौर से गुजर रहे हैं. जब मंत्री और विधायक परेशान हैं तो आम कार्यकर्ता की स्थिति को आप स्वयं समझ सकते हैं.’

उत्तर प्रदेश में एक भाजपा कार्यकर्ता की यह बात पार्टी की सरकार के कामकाज का हाल बता देती है. उधर, जनता की अपेक्षाओं पर योगी सरकार कितनी खरी उतर पाई है, यह राज्य के लोकसभा और विधानसभा उप चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया है. गोरखपुर और फूलपुर राज्य के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा से जुड़ी लोकसभा सीटें थीं. वहां विपक्षी एकता भी बहुत स्पष्ट नहीं थी क्योंकि कांग्रेस वहां खुद चुनाव मैदान में थी. फिर भी भाजपा वहां पराजित हुई. इसके बाद हुए कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने पिछली पराजय के तमाम कारणों को समझ कर अपनी चुनावी तैयारियां की थीं. पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन में सहानुभूति लहर का लाभ उठाने की भी कोशिश की थी. संगठन के लोगों को काफी पहले से वोटरों के बीच भेज कर उसने पूरी जमीनी तैयारी भी की थी.

लेकिन सारे प्रयास बेकार गए. मुख्यमंत्री का प्रचार अभियान भी काम नहीं आया और प्रधानमंत्री की रैली भी जीत नहीं दिला सकी. भाजपा जिन्ना को खारिज करते करते ‘गन्ने के भंवर’ में उलझ गई. उपचुनाव के इलाके में गन्ना मिलों से ज्यादा से ज्यादा भुगतान कराने का भी लाभ उसे नहीं मिल पाया क्योंकि जिन इलाकों में ज्यादा भुगतान हुआ वहीं भाजपा को बड़े अंतर से पिछड़ना पड़ा. उदाहरण के लिए सहारनपुर के नुकुड़ और गंगोह विधानसभा क्षेत्र में स्थित तीन शुगर मिलों ने 70 फीसदी भुगतान कर दिया था. लेकिन गंगोह विधानसभा क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकदल को भाजपा से 12 हजार और नुकुड़ में 18 हजार वोट ज्यादा हासिल हुए.

अब मंथन

भाजपा अब इन पराजयों पर मंथन कर रही है. शुरुआती दौर में यह माना जा रहा था कि जातीय समीकरणों के चलते भाजपा का सफाया हुआ. मगर अब पार्टी की आंतरिक छानबीन में यह बात भी सामने आई है कि जातीय समीकरणों से अधिक नुकसान उसे पदाधिकारियों के कामकाज के तरीके, कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल की कमी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से पहुंचा है.

कैराना से भाजपा प्रत्याशी रहीं मृगांका सिंह के बयान से भी इसकी पुष्टि होती है. उन्होंने कहा कि सहारनपुर जिले की दोनों विधानसभा सीटों में भाजपा के पिछड़ने की असली वजह प्रशासन का आतंकराज है. सहारनपुर में भाजपा के जिला अध्यक्ष बिजेंद्र कश्यप मानते हैं कि कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई नहीं हुई. अधिकारियों द्वारा उनको अपमानित किया गया. इस आरोप की पुष्टि इस बात से होती भी है कि सरकार ने सहारनपुर के डीएम का तबादला कर दिया है. इसी तरह शामली जिले की तीन सीटों पर भी भाजपा रणनीतिकारों की योजना के नतीजे उल्टे ही रहे. उधर, कैराना विधानसभा सीट पर पार्टी को बढ़त की उम्मीद नहीं थी लेकिन, इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार 13 हजार वोटों से आगे रहीं.

कुल मिलाकर भाजपा ‘थिंक टैंक’ की योजनाएं परवान नहीं चढ़ पाईं. अब इसी गड़बड़ी का तोड़ ढूंढ़ने के लिए भाजपा ने दोनों सीटों से जुड़े सभी प्रमुख लोगों के साथ बैठकों का दौर शुरू कर दिया है. इनमें यह बात सामने आई है कि राज्य में सरकार होने के बावजूद कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं हो रही. न उनकी बड़े नेता सुनते हैं और न ही प्रशासनिक अधिकारी उनको तवज्जो दे रहे हैं. मुरादाबाद में हुई एक बैठक में कुछ सांसदों और विधायकों ने इस बात पर भी नाराजगी जाहिर की कि प्रदेश के अधिकारी तो दूर जिले के अधिकारी भी उनकी नहीं सुन रहे. उनके मुताबिक शीर्ष नेतृत्व उनसे योजनाओं का भौतिक सत्यापन करने और कमियों पर शिकायत करने को कहता है, लेकिन डीएम-कमिश्नर सुनते ही नहीं. साफ है कि सरकार का इकबाल जिले के अधिकारियों के स्तर तक प्रभाव डाल नहीं पा रहा है, और इसके कारण भी कार्यकर्ताओं में निराशा और असहाय होने की प्रवृति बढ़ रही है.

कोई किसी से संतुष्ट नहीं

उत्तर प्रदेश भाजपा में आजकल एक बात खूब दोहराई रही है. बात यह है कि ‘कार्यकर्ता अपने नेता से संतुष्ट नहीं है. नेता अपने विधायक से संतुष्ट नहीं है. विधायक मंत्री से तो मंत्री मुख्यमंत्री और शासन के अधिकारियों से संतुष्ट नहीं है. मुख्यमंत्री अपने अधिकारियों और मंत्रियों से संतुष्ट नहीं हैं और मुख्यमंत्री से पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व संतुष्ट नहीं है.’ यानी हर कोई किसी न किसी से असंतुष्ट है. इसी असंतोष का खामियाजा पार्टी को लगातार पराजय के तौर पर भुगतना पड़ रहा है. असंतोष के इसी दौर में उत्तर प्रदेश में सरकार का नेतृत्व बदलने की चर्चाएं भी हैं और इस बात की भी कि असंतोष खत्म करने के लिए प्रदेश सरकार के कई चेहरे भी बदले जा सकते हैं. पार्टी संगठन में भी बड़े बदलावों की सुगबुगाहट चल रही है.

भाजपा के असंतुष्ट कार्यकर्ताओं में छटपटाहट इस बात को लेकर भी है कि मुख्यमंत्री की तमाम व्यक्तिगत ईमानदारी के बावजूद भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग पा रही है. मुख्यमंत्री ने शुरू में जो तेजी दिखाने की कोशिश की थी, उस तेजी पर अब अफसरशाही ने पूरा शिकंजा कस दिया है. सरकारी योजनाओं में अधिकारियों के भ्रष्टाचार के मामले अब खुल कर सामने आने लगे हैं. साथ ही पार्टी संगठन और कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार की छाया पड़ने की सुगबुगाहट होने लगी है. मंत्रियों को काम न हो पाने की शिकायत होने लगी है तो अवैध कमाई में विधायकों की हिस्सेदारी के आॅडियो वायरल होने लगे हैं.

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के महत्व को देखते हुए अब खुद नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति और योगी सरकार के कामकाज की समीक्षा शुरू कर दी है. इसी के चलते उत्तर प्रदेश में मंत्रिमंडल का विस्तार भी लटक गया है. केंद्रीय नेतृत्व की व्यापक समीक्षा के बाद उत्तर प्रदेश को लेकर पार्टी कुछ बड़े कदम उठा सकती है, इस बात की भी चर्चाएं तेज हो गई हैं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार के सभी मंत्रियों को बारी बारी से पार्टी कार्यालय में बैठ कर कार्यकर्ताओं की बात सुनने का निर्देश दिया था. माना जाता है कि यह निर्देश पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की ओर से दिया गया था. लेकिन यह निर्देश महज कागजी रहा. कुछ दिन मंत्री कार्यालय में नियमित बैठते रहे, फिर सिलसिला ठप हो गया. दबी जुबान में कुछ मंत्रियों ने इसकी वजह यह बताई कि जब वे कुछ कर ही नहीं पा रहे तो कार्यकर्ताओं की सुनवाई किसलिए करें.

साफ है कि भाजपा को लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन या किसी महागठबंधन से जो चुनौतियां मिलेंगी वे तो अपनी जगह पर हैं लेकिन, एक बड़ी चुनौती उसे कार्यकर्ताओं की ओर से भी मिलनी तय है. स्थिति यह है कि लखनऊ में भाजपा कार्यालय में घूमते टहलते कार्यकर्ताओं के बीच से इस तरह की बातें सुनी जा सकती हैं कि पार्टी ने जो ‘संपर्क फाॅर समर्थन’ अभियान छेड़ा है उसे पार्टी हित में ‘संपर्क फाॅर कार्यकर्ता’ बना दिया जाना चाहिए.