कल्पना के घोड़ों की लगाम खींचिए और उन्हें जरा उल्टा दौड़ाइए. सोचिए कि अगर श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी न लिखा होता तो! क्या होता अगर यह कालजयी उपन्यास न होता!

अगर राग दरबारी न हुआ होता तो न जानें कितनी पीढ़ियां शहर की सड़कें छोड़ने के बाद हिंदुस्तानी देहात का जो महासागर शुरु होता है उसमें गोते लगाए बिना रह जातीं. अगर राग दरबारी न होता तो शिवपालगंज नहीं होता. गंजहे नहीं होते और उनकी टिल्ल-टांय नहीं होती. तब हो सकता है कि हम हिंदी साहित्य में गांव के बारे में मैथिलीशरण गुप्त की इस कविता को ही सच्चाई मान लेते कि अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है/थोड़े में निर्वाह यहां है/ ऐसी सुविधा और कहां है. इस भावुक-भावना से भरी कविता को पढ़कर बहुत सारे शहरी हिंदी हृदय प्रदेश के गांव की उसी छवि को मन में बसा लेते जैसी हमारी सरकारें हमें इंडिया शाइनिंग, भारत निर्माण और साफ नीयत-सही विकास के विज्ञापनों में दिखाती हैं.

अगर राग दरबारी न होता तो हम ग्राम्य जीवन की सरलता के ऐसे महिमामंडन का शिकार होते कि जानते हुए भी न मानते कि हमारे गांवों में पंडित राधेलाल भी रहते हैं जो साक्षरता और निरक्षरता की सीमा रेखा पर खड़े रहते हैं और अपनी सुविधानुसार अदालत में कह सकते हैं कि ‘हुजूर पढ़ा-लिखा नहीं हूं.’ और अगर बात बिगड़ने लगे तो निरक्षरता की एलओसी पार कर यह भी कह सकते हैं कि ‘सरकार दस्तखत कर सकता हूं.’ पंडित राधेलाल चाहें निरक्षरता का लघु रूप धरें या साक्षरता का विकट रूप. इंसाफ हर हाल में उनकी गवाही के आगे सरेंडर कर ही देता है.

अगर राग दरबारी न लिखा गया होता तो हमारे पास ऐसे वन लाइनर नहीं होते जो भीषण से भीषण सवालों के लिए कुंजी का काम करते हैं. मसलन, देश की उच्च शिक्षा की बदहाली पर हम यह कैसे कह पाते कि उच्च शिक्षा रास्ते में पड़ी कुतिया है, जिसे कोई भी लात मारकर निकल सकता है. राग दरबारी न होता तो हम यह कैसे जान पाते कि मध्ययुग का कोई सिंहासन रहा होगा, जो अब घिसकर कुर्सी बन गया है और हमारे दारोगा जी उसी पर विराजते हैं. अगर गंजहों का दिया सहज ज्ञान न होता तो यह ज्ञान कौन देता कि पुनर्जन्म का ईजाद भारत की दीवानी अदालतों से हुआ ताकि कोई यह अफसोस लेकर न मरे कि उसे इंसाफ नहीं मिला.

शिवपालगंज के आत्मविश्वास से भरे गंजहे न होते तो किसानों को उन्नत कृषि सिखाने आए वैज्ञानिकों को मूर्ख मानने का साहस कौन जुटा पाता. गंजहों ने पूरे भारत के ग्रामीणों को स्वर दिया और एक अनूठा सिद्धांत स्थापित किया कि सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में वक्ता और श्रोता दोनों एक दूसरे को मूर्ख मानकर चलें. राग दरबारी न लिखा गया होता तो अधिक अन्न उपजाओ टाइप के विज्ञापनों की वाल राइटिंग की निरर्थकता बहुत बाद में समझ आती. राग दरबारी के गंजहों ने पहले ही समझ लिया था कि इस तरह के विज्ञापन सिर्फ गॉसिप के काम आ सकते हैं. गंजहों ने हमें ज्ञान दिया कि ऐसे विज्ञापनों मे छपे हष्ट-पुष्ट शरीर वाले मर्द को रसूखदार बद्री पहलवान ही समझा जाए और उसके साथ बनी सुघड़ कन्या के बारे में विचार देने के लिए पूरा गांव स्वतंत्र रहे.

राग दरबारी न होता तो छंगामल माध्यमिक विद्यालय भी नहीं होता जो खुद-ब-खुद एक किरदार है और मजे की बात है कि राग दरबारी लिखे जाने के पचास साल बाद भी उसका यौवन बरकरार है. छंगामल विद्यालय में अगर इतिहास के मास्टर खन्ना अंग्रेजी न पढ़ा रहे होते तो हम कैसे जान पाते कि यह तो हमारी गौरवशाली परंपरा है और हमें 2019 में भी किसी भूगोल के अध्यापक से भौतिक विज्ञान पढ़ने में गर्व महसूस करना चाहिए. किसी इंटर कालेज की प्रिंसिपली कितना दिक्कत तलब काम है, यह हमें कैसे पता चलता अगर अहम राग दरबारी में छंगामल विद्यालय के प्रिंसिपल और क्लर्क की बातें न सुनी होतीं. हम कैसे जान पाते कि राजनीतिक रसूख वाले किसी वैद्य जी को अगर किसी स्कूल का क्लर्क चाचा कहता है देता है तो प्रिंसिपल इस बात से मन मसोस कर रह जाता है कि वह उन्हें बाप नहीं कह सकता. और भारतीय़ ग्रामीण प्रतिभा से हमारी शहरी पीढ़ी को यह ज्ञान कहां से मिलता कि हर चिड़ीमार को मौके-बेमौके सलाम करते रहना चाहिए, पता नहीं कब काम आ जाए क्योंकि कोई शरीफ आदमी तो कुछ करके देता नहीं है.

राग दरबारी ने ही हमें बताया कि हमारा लोकतंत्र ऐसी चीज है जो बदन पर महज एक जांघिया धारण करने वाले सनीचर को ग्राम प्रधान भी बना सकता है. बस उसकी एक शर्त है कि वह प्रधानी पूर्व और प्रधानी के बाद भी पूरी आस्था से वैद्य जी की बैठकी में भंग पीसता रहे.

और फिर वैद्य जी. जो हैं तो हमारे मुल्क में बहुत सारे लेकिन अगर राग दरबारी न होता तो वैद्य जी के कृतित्व की ऊंचाइयों और व्यक्तित्व की गहराइयों का वर्णन कौन कर पाता. आज भी भारत के सार्वजनिक शौचालयों में लगे गुप्त रोग के इलाज के विज्ञापन देखकर आपको यह एहसास कैसे होता कि वैद्य जी पहले ही बता गए थे कि ब्रम्हचर्य का नाश ही सब रोगों का मूल है. अगर राग दरबारी ने वैद्य जी के किरदार को न गढ़ा होता तो भ्रष्टाचार को नैतिक आभा कैसे दी जाती है, कइयों के लिए यह सीखना जरा मुश्किल होता. वैद्य जी बहुत सरलता से कैसे कह सकते थे कि ‘ऐसी कौन सहकारी यूनियन है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं है. अगर ऐसा नहीं होता तो लोग हमें गलत समझते. अब ठीक है लोग समझेंगे हम कुछ छुपाते नहीं.’ अगर राग दरबारी जैसी साहित्यिक कृति हमारे पास नहीं होती तो हम इस प्रकार की ईमानदारी वाली बेईमानी के लिए सिर्फ राजनीति के अखबारी किस्सों पर निर्भर रहते.

राग दरबारी न लिखा गया होता तो हमें यह समझने में मुश्किल होती कि नेता बनने के लिए रूप्पन बाबू जैसा मिजाज होना चाहिए जो थाने में बैठे चोर और थानेदार को एक नजर से देखता हो. रूप्पन बाबू ने ही हमें बहुत पहले सिखाया कि ‘सार्वजनिक जीवन का मूलमंत्र है- सबको दयनीय समझो, सबका काम करो और सबसे काम लो.’ किसी भी वाद और विचार से मुक्त रहकर रूप्पन बाबू पूंजीवाद के प्रतीक दुकानदारों से सामान खरीदते नहीं थे, ग्रहण करते थे. शोषण का प्रतीक इक्के वाले भी उन्हें शहर पहुंचाकर किराया नहीं आशीर्वाद मांगते थे. राजनीति में परिवारवाद पर सर खपाने के बजाय हम राग दरबारी के उदाहरण से आसानी से ही समझ गए कि नेता पैदायशी होते हैं. रूप्पन बाबू नेता थे क्योंकि उनके बाप वैद्य जी भी नेता थे.

शिवपालगंज का लंगड़ न होता तो सरकारी दफ्तर में दी जाने वाली दरख्वास्तों की जान चींटी जैसी होती है जिसे कोई भी ले सकता है, यह हम जानते लेकिन इसकी ऐसी सार्वजनकि अभिव्यक्ति न हुई होती. लंगड़ ने हम सबको सिखाया कि आम आदमी की दरख्वास्त खारिज हो जाना उसकी नियति है और हमें ज्यादा टिल्ल-टांय के बगैर अपनी नियति बदलने की प्रतीक्षा करनी चाहिए.

राग दरबारी न होता तो हम कहां जान पाते कि उच्च शिक्षा प्राप्त और दुनिया बदलने के सपने से लैस रंगनाथ जैसे युवा कैसे और क्यों अपने हालात से मुंह मोड़ लेते हैं और पलायन संगीत की स्वर लहरी का सहारा लेते हैं.

राग दरबारी न होता तो हमारे पास हिंदी की बहुपठित किताब नहीं होती और हिंदी के एक सुविख्यात आलोचक की यह बात कैसे गलत निकलती कि अपठित रह जाना ही इसका लक्ष्य है.