जी को अपने प्रचलित नाम और उपनाम के बीच में लगाने वाले भय्यूजी महाराज से पहली और आखिरी बातचीत अन्ना आंदोलन के दौरान हुई थी. 2011 के अगस्त महीने की बात है. तब की कांग्रेस सरकार और अन्ना हजारे के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाकर वे रातों-रात सुर्खियों में आ चुके थे और हर कोई उनके बारे में थोड़ा और जानना चाहता था. उनका ‘प्रोफाइल’ लिखने के लिए जब उनसे संपर्क किया तो कुछ दिन तो उनके मातहत ‘वे सफर में हैं’ का बहाना बनाकर टालते रहे. लेकिन जब आखिरकार फोन उन तक पहुंचा तो उस वक्त ट्रेन में सफर करते होने के बावजूद उन्होंने इत्मीनान से अपने सफर के बारे में बात की.

राष्ट्रीय मीडिया और देश के लिए साल 2011 में भय्यूजी महाराज इतने अपरिचित थे कि इस गोरे-चिट्टे मॉडल से दिखने वाले ‘संत’ की उम्र तक हर कोई अलग-अलग बता रहा था. इसलिए मेरे अब तक लिए साक्षात्कारों में वह इकलौता है जिसमें सबसे पहला सवाल इतना आलसी था – आपकी उम्र कितनी है?

भय्यूजी के अनुसार तब वे 38 के थे. लेकिन मीडिया में प्रचलित उनकी उम्र 43 थी. इसके बारे में उनका कहना था कि गांव में पढ़ाई होने की वजह से उनकी उम्र सर्टिफिकेट में ज्यादा लिखवा दी गई - ‘गांव में तो आपको मालूम है कैसा होता है.’ लेकिन ज्यादा लोगों तक उनकी यह बात शायद पहुंची नहीं, इसलिए आज भी मीडिया उसी प्रचलित उम्र को सही मानकर उन्हें 45 के बजाय 50 वर्षीय घोषित कर रहा है.

भय्यू महाराज का जन्म शुजालपुर, मध्य प्रदेश के एक कृषक परिवार में हुआ और उनके बचपन का नाम उदय सिंह देशमुख था. इंदौर में पढ़ाई और पारिवारिक खेती देखने के दौरान उन्होंने दो साल मॉडलिंग भी की थी जिसे बातचीत में उन्होंने अपने जवानी के दिनों का ‘शगल’ बताया था और जिक्र किया था कि वे सियाराम सूटिंग्स के पोस्टरों पर आया करते थे. उनके इसी आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय शरद यादव ने संसद में दिए अपने भाषण में उनका जिक्र करते हुए कहा था, ‘वहां एक मध्यस्थ है जो हीरो की तरह दिखता है.’

भय्यूजी महाराज शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे और समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ
भय्यूजी महाराज शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे और समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ

अन्ना आंदोलन में अपनी भूमिका पर उनका कहना था, ‘दोनों पक्षों के बीच बातचीत सही दिशा में नहीं जा रही थी. मैंने बस उसे सही दिशा देने की कोशिश की है.’ अन्ना हजारे और कांग्रेस सरकार के बीच की आखिरी दौर की बातचीत को सफल बनाने में भय्यूजी महाराज की अहम भूमिका मानी जाती है. उस वक्त जब आंदोलनकारी कांग्रेसी नेताओं पर भरोसा नहीं कर रहे थे और सरकार के पास ऐसा कोई दूसरा देसी आदमी नहीं था जो अन्ना से उन्हीं की भाषा में आत्मीयता से बात कर सके, तब अन्ना के साथ काम कर चुके भय्यू महाराज संवाद का पुल बने थे.

बातचीत के दौरान उनका कहना था, ‘मैं अन्ना को पिछले 10-12 साल से जानता हूं. हमारा ट्रस्ट महाराष्ट्र के गांवों में खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य और जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करता है और अपने इन्हीं सामाजिक कार्यों के दौरान मैं उनके संपर्क में आया था. हालांकि हमने अन्ना के गांव रालेगण सिद्धि में काम नहीं किया है लेकिन अन्ना ने हमारा काम देखा है और हमने अन्ना के साथ सूचना का अधिकार आंदोलन में भी भाग लिया था.’

व्यक्तित्व के साथ-साथ उनकी संतई भी कुछ-कुछ निराली थी. उसके पीछे की राजनीति हालांकि वही थी जो आजकल मुख्यधारा की राजनीति का अहम हिस्सा है. हर प्रवचननुमा बात में राष्ट्र हित पर जोर था, राष्ट्रीय भावना जाग्रत करने की ख्वाहिश थी, और इसके लिए संविधान जागरण अभियान चलाने के अलावा वे ‘भारत माता मंदिर’ भी बनवा चुके थे. लेकिन टिपिकल संतों की तरह वे गेरुआ वस्त्र नहीं बल्कि सफेद कुर्ता-पायजामा पसंद करते थे, तंत्र-मंत्र से दूर रहते थे और खुद को ‘युवा संत’ व ‘राष्ट्र संत’ कहलवाना पसंद करते थे.

बातचीत में जोर देकर उन्होंने कहा था कि जब मैं आम किसान परिवार से आकर, बिना कोई आडम्बर किए, बिना कोई चमत्कार दिखाए सामाजिक कार्य कर सकता हूं तो बाकी आम लोग ऐसा क्यों नहीं कर सकते. यह भी कि मैं जगह-जगह मंदिर बनवाने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि हम (उनका ट्रस्ट) मंदिरों के सामने कृषि विकास केंद्र स्थापित करते हैं ताकि किसान भूखा न रहे.

यह पूछने पर कि आपके आश्रम कहां-कहां पर मौजूद हैं (मैं कुछ वक्त पहले ही राम मंदिर आंदोलन से पहचानी जाने वालीं साध्वी ऋतंभरा का साक्षात्कार लेने उनके आश्रम वात्सल्य ग्राम गया था और उसके पांच-सितारा वैभव से हैरान था. इसलिए यह सवाल पूछा था!), भय्यू महाराज ने साफ-साफ कहा – ‘आश्रम बनाता नहीं सर. गांव-गांव जाकर सामाजिक कार्य करता हूं इसलिए आश्रम की मुझे जरूरत नहीं. बस लोगों से मिलने-जुलने के लिए दो-तीन कमरों का एक छोटा मकान है इंदौर में, वहीं से मेरा कार्य संचालित होता है.’ सुना है बाद के वर्षों में भी वही छोटा घर भय्यू महाराज का आश्रम रहा.

आत्महत्या के बाद भय्यू महाराज का निजी जीवन पब्लिक डोमेन में आ चुका है. उनकी बेटी दूसरी पत्नी डॉ आरुषि पर आरोप लगा चुकी है कि उनकी ही वजह से उसके पिता ने खुदकुशी का कदम उठाया, और पत्नी कह चुकी हैं कि बेटी कुहू उन्हें पसंद नहीं करती थी. यह विडम्बना ही है कि सात साल पहले अपनी निराली संतई के ब्यौरे देते वक्त भय्यू महाराज का कहना था कि वे गुरु-शिष्य परंपरा में विश्वास नहीं रखते और किसी आश्रम की उन्हें चाहत नहीं है. वे बस गृहस्थ आश्रम में विश्वास रखते हैं और चाहते हैं कि हर व्यक्ति का केवल वही आश्रम हो, क्योंकि बिना उसमें प्रवेश किए इंसान संपूर्ण नहीं होता. आगे चलकर शायद इसी गृहस्थी की कलह ने उन्हें अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया.

बातचीत के वक्त तक उनका एकमात्र ट्रस्ट इंदौर में श्री सदगुरू दत्ता धार्मिक और पारमार्थिक ट्रस्ट नाम से पंजीकृत था. इसकी बात चलने पर वे बातों-बातों में यह भी कह गए थे (न जाने क्यों), ‘मैं ट्रस्ट में 10 लाख रुपए से ज्यादा रखता ही नहीं कि आगे चलकर शिष्यों में लड़ाई हो. पैसों के लफड़े में न पड़कर अपन सिर्फ सामाजिक कार्य करते हैं.’ लेकिन सात साल बाद मृत्यु से पहले वे खुद अपनी सारी संपत्ति और आश्रम – जिसका मूल्य हजार करोड़ आंका जा रहा है - सेवादार विनायक के नाम कर गए हैं और इसने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है.

खुद के शब्दों में ‘राष्ट्र-धर्म जागरण के लिए पूर्णत: समर्पित’ इस लो-प्रोफाइल संत की मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की जनता में अच्छी-खासी फॉलोइंग थी और राजनीति में भी. बातचीत में उन्होंने खुद स्वीकारा था कि, ‘बीजेपी, शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी जैसी पार्टियों में मेरे कई नेताओं से बहुत अच्छे संबंध हैं, लेकिन मैं राजनीति से दूर रहता हूं. पॉजिटिव बातें करता हूं और पॉजिटिव काम करता हूं.’ हालांकि दूर रहने की बात के बाद उन्होंने यह भी स्वीकारा कि जब विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तो उनकी सरकार बचाने में उनका भी योगदान था.

भय्यू महाराज हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित थे (मई 2014) और इससे पहले जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी लोगों ने उन्हें सद्भावना उपवास कार्यक्रम के दौरान मोदी के निकट देखा था. मोहन भागवत, शिवराज सिंह चौहान, नितिन गडकरी से लेकर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, विलासराव देखमुख, राज ठाकरे, शरद पवार और लता मंगेशकर तक से उनके निजी संबंध थे. लेकिन जब उस सात साल पुरानी बातचीत के अंत में उनसे पूछा गया कि अन्ना आंदोलन से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के बाद क्या अब वे परदे के आगे वाली राजनीति का रुख करेंगे, तो उन्होंने स्पष्टता से कहा, ‘न मैं कोई पद स्वीकारूंगा जीवन में, न कोई पुरस्कार लूंगा. मैं अपने सामाजिक कार्यों से खुश हूं और केवल मातृभूमि की सेवा करना चाहता हूं.’

इस आखिरी बात पर भय्यू महाराज अंत तक डटे रहे. मध्य प्रदेश सरकार ने जब कुछ समय पूर्व पांच संतों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया तब वे ऐसे इकलौते संत थे जिन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया.