गोड्डा झारखंड का उत्तर-पूर्वी छोर है. घने जंगलों और धान के खेतों वाले इस जिले में कोयले का एक विशाल भंडार भी है. भारत की सबसे पुरानी कोयला खदानों में से एक गोड्डा में है लेकिन, विरोधाभास देखिए कि विद्युतीकरण के मामले में यह देश के सबसे फिसड्डी जिलों में शामिल है.

इसी गोड्डा जिले में अडानी समूह की एक कंपनी अडानी पॉवर लिमिटेड 1600 मेगावॉट की क्षमता वाला एक ऊर्जा संयंत्र बना रही है. यह संयंत्र कोयले से चलेगा. लेकिन इसकी बिजली गोड्डा या झारखंड के लिए नहीं होगी. उसे सीमा पार बांग्लादेश भेजा जाएगा.

सरकारी नीति के मुताबिक झारखंड में लगने वाले और कोयले से चलने वाले किसी भी ऊर्जा संयंत्र की 25 फीसदी बिजली राज्य सरकार को मिलती है जो इसे एक तय दर पर खरीदती है. अडानी पॉवर लिमिटेड का कहना है कि वह इस शर्त को पूरा करेगी, लेकिन किसी दूसरे स्रोत के जरिये. इस स्रोत के बारे में कंपनी ने कुछ नहीं बताया है.

लेकिन झारखंड को मिलने वाली यह बिजली सस्ती नहीं होगी. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन को मिले दस्तावेज बताते हैं कि 2016 में झारखंड ने अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव किया था. इससे अडानी पॉवर लिमिटेड को झारखंड में चल रहे दूसरे ऊर्जा संयंत्रों के मुकाबले सरकार को ज्यादा कीमत पर बिजली बेचने की इजाजत मिल गई.

झारखंड में कोयले पर आधारित बिजली परियोजनाएं लगाने वाली कंपनियों के साथ राज्य सरकार के समझौते का स्वरूप इससे पहले कुछ और होता था. 2012 में बनी राज्य की ऊर्जा नीति के तहत राज्य सरकार उनसे जो 25 फीसदी बिजली खरीदती थी उसमें से 12 फीसदी की कीमत परिवर्तनीय (वैरियेबल) यानी सिर्फ उसे बनाने में लगे ईंधन यानी कोयले की कीमत के बराबर होती थी. बाकी 13 फीसदी बिजली की कीमत के दो घटक होते थे - परिवर्तनीय और स्थिर (फिक्स्ड). यानी कि इसमें ईंधन की लागत के साथ-साथ परियोजना को बनाने और चलाने में लगा खर्च भी जोड़ा जाता था. यह दर वास्तव में कितनी होगी, इसका निर्धारण राज्य विद्युत नियामक आयोग (जेएसईआरटी) करता था.

अडानी पॉवर लिमिटेड के साथ झारखंड सरकार ने 2016 में जो पहले चरण का समझौता किया था उसकी शर्तें पुरानी ऊर्जा नीति के मुताबिक ही थीं. इसमें कहा गया था कि झारखंड मौजूदा प्रावधानों के हिसाब से कंपनी से 25 फीसदी बिजली खरीदेगा. लेकिन समझौते के दूसरे चरण में कंपनी ने मांग की कि शर्तों में बदलाव किया जाए. कंपनी चाहती थी कि 12 फीसदी बिजली वैरियेबल कॉस्ट पर पाने के लिए सरकार उसे सस्ती कीमत पर कोयला उपलब्ध कराए नहीं तो वह पूरी 25 फीसदी बिजली पूरी कीमत (वैरियेबल + फिक्सड) पर खरीदे. दूसरे शब्दों में कहें तो पूरी 25 फीसदी बिजली उस दर पर खरीदे जिस पर पहले वह 13 फीसदी बिजली खरीदती थी.

2014 तक सभी राज्यों की सरकारें अपने यहां चल रहे ऊर्जा संयंत्रों को कोयले की खदान आवंटित करने की सिफारिश केंद्र सरकार से किया करती थीं. इससे संयंत्रों को सस्ता कोयला मिल जाता था. शर्त यह होती थी कि वे इस कोयले को अपनी परियोजना के इतर किसी और काम के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. लेकिन अगस्त 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था खत्म कर दी. शीर्ष अदालत ने कहा कि खदानों का आवंटन मनमाने और अपारदर्शी तरीके से हो रहा है. 2015 में केंद्र ने कानून में बदलाव करते हुए कोयला खदानों के आवंटन के लिए नीलामी को अनिवार्य बना दिया.

2016 में झारखंड सरकार के साथ अपने पत्राचार में अडानी पॉवर लि. ने इसी बदलाव का हवाला देते हुए गोड्डा परियोजना की शर्तों में बदलाव की मांग की. छह अक्टूबर 2016 को झारखंड की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने राज्य की ऊर्जा नीति में वही बदलाव कर दिए जिनका प्रस्ताव कंपनी ने दिया था. इन बदलावों को आधार बनाकर अगले ही दिन दूसरे चरण के समझौते का प्रारूप तैयार कर लिया गया. इस समझौते पर सरकार और अडानी पॉवर लि. ने 21 अक्टूबर को दस्तखत कर दिये.

सरकार की ही एक गोपनीय ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि समझौते की शर्तों में हुए इस बदलाव से राज्य सरकार की जेब पर हर साल 296.40 करोड़ रु का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. समझौता 25 साल के लिए हुआ है. इस लिहाज से देखें तो यह अतिरिक्त बोझ कुल मिलाकर 7410 करोड़ रु का होगा.

झारखंड का महालेखापाल कार्यालय, जो सीएजी को रिपोर्ट करता है, ने 12 मई 2017 को झारखंड सरकार और अडानी पॉवर लि. के बीच हुए समझौते पर सवाल उठाए थे. उसका कहना था कि यह समझौता कंपनी को अनुचित तरीके से तरजीह देता है जिससे उसे गलत तरीके से फायदा होगा. उसका यह भी कहना था कि राज्य में मौजूद इस तरह के दूसरे ऊर्जा संयंत्र सरकार को कम और उन दरों पर बिजली दे रहे हैं जो पहले की ऊर्जा नीति के आधार पर तय की गई हैं. यहां गौर करने वाली बात यह है कि ऊर्जा नीति में हुए बदलाव पुराने संयंत्रों पर लागू नहीं हुए जबकि 2014 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते उन्हें भी अपनी खदानों से हाथ धोना पड़ा था. महालेखापाल कार्यालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि एक जैसे मामलों में सभी पक्षों के साथ हुए समझौतों की शर्तें भी एक जैसी होनी चाहिए.

इस पर झारखंड के ऊर्जा विभाग ने क्या प्रतिक्रिया दी, यह जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं है. स्क्रोल.इन ने विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय को ई-मेल के जरिये इससे जुड़े कुछ सवाल भेजे थे. लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका कोई जवाब नहीं आया था.

अडानी पॉवर लि. ने भी ईमेल के जरिये इस सिलसिले में पूछे गए सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया. कंपनी के एक प्रवक्ता ने कहा कि गोड्डा परियोजना की भारतीय ग्रिड के साथ कोई कनेक्टिविटी नहीं होगी इसलिए झारखंड सरकार को 25 फीसदी बिजली किसी वैकल्पिक स्रोत से दी जाएगी. प्रवक्ता का कहना था, ‘लेकिन इसकी दर गोड्डा परियोजना के हिसाब से ही तय होगी.’ उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि गोड्डा ऊर्जा परियोजना को विदेश से आयातित कोयले से चलाने के हिसाब से ही बनाया जा रहा है.

जब अडानी समूह ने बांग्लादेश के साथ बिजली आपूर्ति का समझौता किया था तो उसने यह नहीं बताया था कि गोड्डा बिजली संयंत्र के लिए कोयला कहां से आएगा. अप्रैल 2017 में भारत के पर्यावरण मंत्रालय के पास अडानी पॉवर ने जो दस्तावेज जमा किए थे उनमें कोयले का व्यापार करने वाली इंडोनेशिया की एक कंपनी के साथ उसके समझौते की जानकारी दी गई थी. अडानी पॉवर लि. का यह भी कहना था कि ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका में मौजूद खानों से भी गोड्डा के लिए कोयले की आपूर्ति की जा सकती है. मार्च 2018 में ऑस्ट्रेलिया में अडानी एंटरप्राइजेज के मुखिया जयकुमार जनकराज ने ऐलान किया कि गोड्डा परियोजना के लिए कोयला आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रांत की कारमाइकल खदान से भेजा जाएगा. हालांकि वहां आज भी इस खदान को अडानी समूह को देने के खिलाफ काफी विरोध हो रहा है.

आस्ट्रेलिया से आने वाले कोयले के चलते गोड्डा परियोजना में बनने वाली बिजली की लागत काफी बढ़ जाएगी. इस वजह से या तो झारखंड को अडानी पावर से काफी महंगी बिजली खरीदनी पड़ेगी या फिर इस प्लांट से उसे कुछ भी नहीं मिलेगा. अप्रैल 2018 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनैलिसिस (आईईईएफए) के विशेषज्ञ साइमन निकोल्स ने लिखा है कि ‘इतना पैसा खर्च करके एक ऐसे राज्य में कोयला आयात करने का कोई मतलब नहीं बनता जो कोयला खनन के मामले में भारत में सबसे आगे है.’

बांग्लादेश के साथ समझौता

गोड्डा ऊर्जा परियोजना ने जून 2015 में तब आकार लिया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ढाका गए थे. वहां प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ मुलाकात में उन्होंने अनुरोध किया था कि बांग्लादेश में भारतीय ऊर्जा कंपनियों को भी मौके दिए जाएं.

बांग्लादेश में बिजली की भारी कमी है. वहां न तो कोयले और पेट्रोल के भंडार हैं और न जलविद्युत परियोजनाओं की खास संभावना. इसके चलते उसे या तो अपने पड़ोसियों से बिजली आयात करनी पड़ती है या फिर अपने यहां ऊर्जा परियोजनाएं बनाने के लिए बाहर से आर्थिक और तकनीकी सहायता लेनी पड़ती है.

2010 में भारत ने बांग्लादेश को एक अरब डॉलर का कर्ज देने का ऐलान किया था. यह कर्ज बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए था. उसी साल भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनटीपीसी और बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड ने एक समझौता किया. इसके तहत बांग्लादेश में कोयले से चलने वाले दो ऊर्जा संयंत्र बनाए जाने थे. इनमें से हर एक की क्षमता 1320 मेगावॉट तय की गई थी.

अगले चार सालों तक भारत से बांग्लादेश ग्रिड को जाने वाली बिजली पर सरकारी उद्यमों का ही नियंत्रण रहा. लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद चीज़ें बदल गईं. छह जून 2015 को अपनी पहली ढाका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत बांग्लादेश के 2021 तक 24,000 मेगावाट ऊर्जा के लक्ष्य को पाने में उसकी मदद कर सकता है. उन्होंने ‘बांग्लादेश में ऊर्जा उत्पादन, प्रसारण और वितरण क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के प्रवेश के लिए’ प्रधानमंत्री शेख हसीना से मदद मांगी.

ठीक अगले दिन बांग्लादेश पावर डिवेलपमेंट बोर्ड ने अडानी पावर लिमिटेड और रिलायंस पावर लिमिटेड द्वारा बनाए जाने वाले पावर प्रोजेक्ट्स से बिजली खरीदने के लिए समझौतों की घोषणा कर दी.

बांग्लादेश की अपनी पहली यात्रा के दौरान वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
बांग्लादेश की अपनी पहली यात्रा के दौरान वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दो महीने बाद, 11 अगस्त 2015 को अडानी और बांग्लादेश ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए. जबकि दो साल बाद अप्रेल 2017 में शेख हसीना की नई दिल्ली यात्रा के दौरान इम्पलीमेंटेशन एग्रीमेंट पर मुहर लगाई गई. हालांकि बिजली की कीमत तय करने का काम बिजली खरीद समझौते के वक्त होने वाली बातचीत पर छोड़ दिया गया. द डेली सन की इस रिपोर्ट के मुताबिक इस कार्यक्रम में बांग्लादेश पावर डिविजन के ज्यादातर अधिकारी शामिल नहीं हुए थे.

बिजली खरीद समझौते में यह साफ किया गया था कि बिजली आपूर्ति कितनी मात्रा में और किस दर पर की जाएगी. विशेषज्ञों का कहना है कि खरीद की यह मात्रा और दरें छोटी अवधियों के लिए तय की जाती हैं ताकि ऊर्जा बाजार के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखा जा सके. साथ ही बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों को भी कॉम्पिटिटिव बिडिंग के माध्यम से चुना जाता है ताकि कीमतें कम और भ्रष्टाचार की संभावना खत्म की जा सके. लेकिन अडानी के साथ बांग्लादेश का करार 25 साल का है.

इसके अलावा आइईईएफए के साइमन निकोल्स के मुताबिक बांग्लादेश द्वारा खरीदी जाने वाली बिजली की ‘तय कीमत 8.6127 अमेरिकन सेंट्स या 5.82 रुपए प्रति इकाई है. इस कीमत में क्या शामिल किया गया है क्या नहीं, इस बारे में (बांग्लादेश पावर डिवेलपमेंट) बोर्ड कोई जानकारी नहीं देता.’ यह कीमत उस कीमत से काफी ज़्यादा है जो बांग्लादेश प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के ज़रिए अन्य भारतीय कंपनियों से खरीदी जा रही बिजली के लिए चुका रहा है. मसलन नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन को फरवरी 2018 में एक बोली जीतने के बाद बांग्लादेश को प्रति इकाई 3.42 रुपए की दर से 300 मेगावाट बिजली आपूर्ति करने का ठेका मिला है.

झरखंड में ऊर्जा की कीमत

भारत में सबसे ज़्यादा कोयला झारखंड के पास होने के बावजूद यहां बिजली की कमी है. यहां कुल 59 फीसदी घरों में बिजली के कनेक्शन हैं जबकि देशभर में यह दर 82 फीसदी है. यहां पर प्रति व्यक्ति बिजली खपत का आंकड़ा मात्र 552 यूनिट्स ही है जो कि देश के औसत का लगभग आधा है.

2012 में बनाई गई राज्य की ऊर्जा नीति ने थर्मल पावर कंपनियों को राज्य में अपनी परियोजनाएं शुरू करने के लिए तमाम तरह के प्रोत्साहन दिए. शर्त यह थी कि उत्पादित ऊर्जा का एक चौथाई हिस्सा सस्ती कीमत पर राज्य को दिया जाये.

मुंबई में भारत सरकार के मेक इन इंडिया सप्ताह के दौरान 17 फरवरी 2016 को अडानी पावर लिमिटेड ने गोड्डा परियोजना के लिए झारखंड सरकार के साथ पहले चरण का एमओयू साइन किया. इसमें कहा गया कि परियोजना में बनी पूरी बिजली बांग्लादेश भेजी जाएगी और कंपनी राज्य को जाने वाला एक चौथाई हिस्सा ‘अन्य स्रोतों’ से लेकर राज्य को देगी, जिसकी कीमत गोड्डा परियोजना के हिसाब से निर्धारित की जाएगी. यह प्रावधान इससे पहले के ऐसे समझौतों से बिलकुल अलग है.

‘अगर अडानी छत्तीसगढ़ की कोरबा (पश्चिम) परियोजना (जिसे अडानी अधिग्रहीत कर रहे हैं) में तैयार बिजली झारखंड को देते हैं तो यहां पैदा की गई बिजली की कीमत गोड्डा जैसी नई परियोजना में तैयार बिजली की कीमत से काफी कम होगी’ आइईईएफए के टिम बकले कहते हैं, ‘इस तरह के प्लांट से उत्पादित बिजली की कीमत गोड्डा से उत्पादित बिजली की दर पर लेने का मतलब है अडानी को ज़बरदस्त मुनाफा.’

21 अप्रेल 2016 को पहले चरण के एमओयू पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद अडानी पावर लिमिटेड ने जल्दी ही झारखंड के ऊर्जा विभाग को चिट्ठी लिखकर कहा कि वे दूसरे चरण के एमओयू के कुछ बिंदुओं से सहमत नहीं है. उन्होंने मिलकर बदलावों पर विचार करने के लिए लिखा. एक महीने बाद बिज़नेस स्टैंडर्ड और द टेलीग्राफ ने खबर दी कि अडानी द्वारा चाहे गए बदलावों पर चिंता व्यक्त करने के बाद झारखंड के तत्कालीन ऊर्जा सचिव, एसकेजी रहाटे लंबी छुट्टी पर चले गए हैं. रहाटे वर्तमान में झारखंड के ग्रह सचिव हैं. स्क्रोल द्वारा संपर्क किए जाने पर उन्होंने इस मामले पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

13 जुलाई को अडानी ने एक बार फिर ऊर्जा विभाग को लिखा, ‘ताकि एमओयू के मसौदे में सही बदलाव किए जा सकें’ क्योंकि ‘यह पाया गया है कि यह (केंद्र) सरकार के मौजूदा नियमों से मेल नहीं खाता है.’ 10 अगस्त को अडानी ने तीसरी चिट्ठी भेजी. इस चिट्ठी में वे सभी बदलाव दर्ज थे जो वे चाहते थे. हर बदलाव के साथ एक कॉलम में यह भी बताया गया था कि वह बदलाव क्यों सही था.

अडानी द्वारा मांगा गया मुख्य बदलाव यह था कि उसके द्वारा झारखंड को दी जाने वाली पूरी (25 फीसदी) बिजली की कीमत का निर्धारण वैरियबल और फिक्स्ड घटकों को जोड़कर किया जाए या फिर उसे सस्ता कोयला दिया जाए. अडानी का कहना था कि ‘कोल माइंस (स्पेशल प्रॉविजंस एक्ट 2015) के लागू हो जाने के बाद कोल ब्लॉक का आवंटन राज्य सरकार की सिफारिश पर संभव नहीं है. ऐसे में सभी को बराबरी का मौका देने के लिए झारखंड सरकार को पूरी परियोजना की ज़रूरत भर का कोयला उसे रियायती दामों पर उपलब्ध कराना चाहिए.’

अडानी पावर लिमिटेड द्वारा झारखंड के ऊर्जा विभाग को लिखी चिट्ठी
अडानी पावर लिमिटेड द्वारा झारखंड के ऊर्जा विभाग को लिखी चिट्ठी

लेकिन यहां जानने वाली बात यह है कि जो बाकी प्लांट राज्य को पुराने वाले फॉर्म्यूले के मुताबिक रियायती दर पर बिजली दे रहे थे, सुप्रीम कोर्ट आदेश के चलते उन्हें भी अपनी कोयला खदानों और सस्ते कोयले से हाथ धोना पड़ा था. अगस्त 2014 में कोर्ट ने सरकार द्वारा अपनी मर्ज़ी से किए गए कोयला खानों के आवंटनों को गलत बताते हुए उन्हें निरस्त कर दिया था. ऐसे में सिर्फ अडानी पावर के लिए बिजली का कीमत का नया फॉर्म्यूला बनाने का मतलब झारखंड की बाकी बिजली परियोजनाओं से बराबरी के मौका छीन लेना था. केवल उसे सस्ता कोयला उपलब्ध कराने का मतलब भी यही था.

आइईईएफए की रिपोर्ट के मुताबिक गोड्डा परियोजना पहले से ही काफी पीछे चल रही है जिसकी वजह से इसे बनाने का खर्चा काफी बढ़ सकता है और इससे बिजली की कीमत के फिक्सड हिस्से में काफी वृद्धि हो सकती है. यानी कि इस नये फॉर्म्युले का मतलब झारखंड को अडानी द्वारा दी जाने वाली बिजली की कीमत में एक मोटी बढ़ोत्तरी भी था.

ऊर्जा विभाग को एमओयू में बदलाव के लिए लिखी अपनी चिट्ठी के ठीक एक हफ्ते बाद अडानी पावर ने 17 अगस्त, 2016 को सरकार द्वारा संचालित झारखंड राज्य खनिज विकास निगम को एक पत्र लिखा. इसमें उसने गोड्डा परियोजना के लिए कोल लिंकेज दिये जाने की मांग की थी. लेकिन दो सितंबर को निगम ने कंपनी की यह मांग यह कहते हुए अस्वीकार कर दी कि वह कोल इंडिया लिमिटेड से इलेक्टॉनिक नीलामी के जरिए ही कोयला प्राप्त कर सकती है.

इसके करीब डेढ़ महीने बाद ही छह अक्टूबर, 2016 को झारखंड के ऊर्जा विभाग ने राज्य की ऊर्जा नीति में बदलाव का प्रस्ताव जारी कर दिया. इस प्रस्ताव के जारी होने के ठीक एक दिन बाद और इसके गजट में प्रकाशित होने से पहले ही, अडानी पावर लिमिटेड और राज्य सरकार ने नई नीति के हिसाब से दूसरे चरण के एमओयू का एक संशोधित ड्राफ्ट तैयार कर लिया. इसके मुताबिक झारखंड द्वारा कोल लिंकेज न दिये जाने पर (जो कि वह कानूनी रूप से दे ही नहीं सकता) अडानी की गोड्डा परियोजना से मिलने वाली पूरी 25 फीसदी बिजली उसे पूरी कीमत (वैरियेबल + फिक्सड) पर खरीदनी है. जबकि पहले झारखंड को 12 प्रतिशत बिजली सिर्फ वैरियेबल कीमत पर मिलनी थी. यानी अब राज्य को बिजली के लिए पहले से लगभग दोगुनी फिक्स्ड कीमत देनी है.

झारखंड की नई ऊर्जा नीति के नोटिफिकेशन का एक अंश
झारखंड की नई ऊर्जा नीति के नोटिफिकेशन का एक अंश

राज्य के महालेखापाल कार्यालय के ऑडिटरों द्वारा तैयार हिसाब के मुताबिक पुराने समझौते के तहत झारखंड हर महीने अडानी पावर लिमिटेड से 72.40 करोड़ रुपये की बिजली खरीदता. लेकिन अब उसे हर महीने 97.10 करोड़ रुपये की रकम चुकानी होगी. यानी राज्य सरकार को अब हर महीने 24.7 करोड़ रुपये ज्यादा चुकाने होंगे. एक साल में यह रकम होती है 296.40 करोड़ रुपये और चूंकि अडानी पावर लिमिटेड का बांग्लादेश से 25 साल का समझौता हुआ है तो इस हिसाब से इन सालों में झारखंड इस कंपनी को अतिरिक्त 7,410 करोड़ रुपयों का भुगतान करेगा.

आडिटरों ने इस हिसाब-किताब के लिए झारखंड सरकार की दो कंपनियों – आधुनिक पावर एंड नेचुरल रिसोर्स लिमिटेड और इनलैंड पावर लिमिटेड के साथ हुए एमओयू को आधार बनाया है. ये दोनो कंपनियां राज्य की एक तिहाई बिजली की आपूर्ति करती हैं.

सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले के बाद इन दोनों कंपनियों से भी इनके कोल ब्लॉक ले लिए गए थे. इसके चलते ये कंपनियां घाटे में आ गई थीं और इन पर कर्जा चढ़ गया था. लेकिन इसके बाद इन कंपनियों ने 2017 में लागू की गई शक्ति योजना के तहत कोल इंडिया लिमिटेड की इलेक्ट्रॉनिक नीलामी व्यवस्था के जरिए कोयला खरीदना शुरू किया.

इन दोनों सहित राज्य में कोई भी ऐसी कंपनी नहीं है जिसे सरकार की संशोधित ऊर्जा नीति का फायदा मिला हो. इन सभी पुरानी बिजली परियोजनाओं से अभी भी पिछले फॉर्म्यूले के हिसाब से बिजली खरीदी जा रही है. और इनमें से किसी को भी रियायती दर पर कोयला भी नहीं मिल रहा है.

बड़ा सवाल

झारखंड की ऊर्जा नीति में हुआ संशोधन कई अहम सवाल उठाता है. मसलन, वे बिजली परियोजनाएं जिन्हें रियायती दर पर कोयला नहीं मिल रहा है, क्या उन्हें राज्य सरकार को कम कीमत पर बिजली उपलब्ध कराने की बाध्यता से मुक्त नहीं किया जाना चाहिए? अशोक खुराना भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं. निजी बिजली कंपनियों के संगठन एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स (एपीपी) के महानिदेशक अशोक कहते हैं, ‘राज्य सरकार द्वारा मदद किये जाने के अलावा इन बिजली परियोजनाओं को कोई रियायत नहीं मिलती है.’

वहीं विशेषज्ञ इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि तापीय बिजली परियोजनाओं को, जिस राज्य में वे स्थापित हैं, उससे सिर्फ कोयले में ही रियायत नहीं मिलती. मंथन नाम के एक गैर-लाभकारी संगठन के साथ काम करने वाले ऊर्जा क्षेत्र के शोधार्थी श्रीपद धर्माधिकारी कहते हैं, ‘बिजली इकाइयां पहले ही सरकारों से बड़े पैमाने पर रियायतें पा रही हैं. सरकारें अपनी तरफ से अधिग्रहण करके जमीन इन्हें देती हैं तो इसके साथ ही इन्हें बड़ी मात्रा में पानी भी उपलब्ध कराया जाता है.’

अडानी की गोड्डा परियोजना को इसे चिर नदी से हर साल तीन करोड़ 60 लाख क्यूबिक मीटर पानी लेने की अनुमति दी गई है. वह भी तब जब कंपनी ने चार बार मौका मिलने के बाद भी पर्यावरण मंत्रालय के एक्सपर्ट पैनल के सामने नदी के बहाव और जलगृहण क्षेत्र से जुड़ी जानकारी जमा नहीं कराई. श्रीपद के मुताबिक, ‘यह परियोजना में इतनी विशाल मात्रा में पानी की खपत होने की वजह से इसे पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से रोका गया था.’

इसके अलावा झारखंड सरकार परियोजना और कोयले की ढुलाई के उद्देश्य से रेल लाइन बिछाने के लिए जमीनों का अधिगृहण भी कर रही है. ऐसा करने में उसे स्थानीय लोगों के भारी विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है.