श्रीनगर के मशहूर लाल चौक के घंटाघर से ज़रा सी दूरी पर मौजूद लाल ईंटों वाली इमारतों को प्रेस कॉलोनी या प्रेस एनक्लेव कहा जाता है. कई मशहूर अखबारों के दफ्तर यहां हैं. रेसीडेंसी रोड से जब आप प्रेस कॉलोनी में घुसेंगे तो लाल दीवार पर काले ग्रेनाइट की एक प्लेट दिखाई देगी. इस पर आप पढ़ सकते हैं कि इस जगह को एक फोटो जर्नलिस्ट के नाम पर मुश्ताक अली एनक्लेव कहते हैं. 10 सितंबर 1995 को एजेंस फ्रांस प्रेस के लिए काम करने वाले मुश्ताक एक पार्सल बम धमाके में मारे गए थे.

कुछ देर पहले एक कश्मीरी पत्रकार दोस्त ने बताया कि शुजात बुखारी नहीं रहे. तब से मैं उस काली ग्रेनाइट की प्लेट के अलावा कुछ और नहीं देख पा रही हूं.

मैं देखने की कोशिश करती हूं कि एक संपादक अपने दफ्तर से निकलता है, और उस पर गोलियों की पूरी एक मैगज़ीन खाली कर दी जाती है. नहीं देख पाती. कश्मीर प्रवास के दिनों में न जाने कितनी बार मैं इस संपादक के दफ्तर तक गई हूं. उसकी मौत की खबरें पढ़ते हुए मैं लकड़ी के पैनल्स से ढकी दीवारों वाले उस केबिन में बैठे शख़्स का चेहरा याद करने की कोशिश करती हूं. उसकी टेबल पर रखा वह फ्रेम याद करने की कोशिश करती हूं जिसमें उसकी पत्नी और बेटे की तस्वीर थी. पर सब धुंधला है. कश्मीर की हकीकत की तरह. ब्लर्ड रियलिटी.

कौन हैं ये लोग, जिन्होंने शुजाअत बुखारी की जान ली है? यह सवाल मैं हर उस कश्मीरी से पूछती हूं जिससे मैं ये सदमा बांट सकती हूं. सब के सब सदमे में हैं. ईद से एक रोज़ पहले सब के हाथ-पांव ठंडे पड़ चुके हैं. जो हुआ है, कश्मीर के लिए नया नहीं है. लेकिन बार-बार होने वाले हादसे के शिकार और उनके जख्म तो एक जैसे ही होते हैं. इस हादसे पर यकीन लाने में अभी वक्त लगेगा.

कश्मीर में कभी एक हादसे की कहानी एक नहीं होती. इसके कई वर्जन होते हैं. अखबारों ने बताना शुरू कर दिया है कि मिलिटेंट्स ने शुजात बुखारी का कत्ल कर दिया. दिल्ली या कानपुर में रहने वालों के लिए एजेंसी का मतलब शायद गैस एजेंसी या बहुत से बहुत न्यूज एजेंसी हो सकता है. आप कश्मीरियों से बात करें, उनके सबसे बड़े दुश्मन का नाम भी यही है - एजेंसीज़. कश्मीर में रहने वालों के लिए एजेंसीज के मायने क्या हैं, इसे समझने के लिए आपको कश्मीर को समझना होगा. लेकिन अगर आप उन्हें जानते थे तो आपके लिए अमन के हामी शुजात बुखारी को मारने वाले सिर्फ आतंकवादी ही हो सकते हैं, मिलिटेंट नहीं. मिलिटेंट और आतंकवादी होने में फर्क है. तभी कहीं से सुनाई पड़ता है - शुजात के कातिल ये दोनों मुल्क हैं.

दो साल पहले इसी ईद के वक्त जब बुरहान वानी को मार दिया गया था, घाटी में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया था. तब मैं अक्सर राइज़िंग कश्मीर के दफ्तर से अपनी खबरें फाइल किया करती थी. जब कश्मीर मेरे लिए नया था, तब कितनी बार शुजात बुखारी ने एक सीनियर कलीग की तरह नहीं, एक बड़े भाई, एक पिता की तरह चीज़ें समझाई थीं. एक मशहूर पत्रकार, होने का कोई मिज़ाज नहीं, कोई गुरूर नहीं. उन्होंने कितनी ही बार कहा था, ‘व्हाइ डोंट यू राइट फॉर अस?’ मैंने कभी नहीं लिखा. अब सोचती हूं कि काश लिखा होता. तब कहां पता था कि उनके लिए पहली बार उनकी मौत की खबर सुनने के बाद लिखना होगा.