तकरीबन छह महीने पहले तक राजनीति को जानने-समझने वाले लोग अधिकांश लोग यह मान रहे थे कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भी नरेंद्र मोदी को जीत हासिल हो जाएगी. हालांकि, ये लोग यह भी मान रहे थे कि यह जीत 2014 जितनी बड़ी नहीं होगी और ज्यादा संभावना इस बात की है कि भाजपा को अपने बूते स्पष्ट बहुमत न मिल पाए. लेकिन फिर भी यह माना जा रहा था कि सहयोगियों के समर्थन से नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बन जाएंगे. जो लोग यह सोच रहे थे, वे बिहार में महागठबंधन टूटने और नीतीश कुमार के वापस भाजपा के पाले में आ जाने को भी 2019 में भाजपा की संभावित कामयाबी की एक अहम वजह के तौर पर देख रहे थे.

लेकिन पहले उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर और इसके बाद कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जिस तरह से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन हुआ और इन तीनों सीटों पर भाजपा की हार हुई, इससे विपक्ष को एक नई ताकत मिली. उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल का महागठबंधन लगभग तय दिख रहा है. संभव है कि इसमें कांग्रेस भी शामिल हो जाए.

उत्तर प्रदेश में 2014 में भाजपा को 71 सीटें मिलीं थीं और उसकी सहयोगी अपना दल को दो सीटें. लेकिन महागठबंधन बनने के बाद हर कोई यह मान रहा है कि भाजपा की सीटें काफी कम होंगी. कितनी कम होंगी, इसे लेकर अलग-अलग राय जरूर है. दूसरे राज्यों के नुकसान की गिनती न भी करें तो सिर्फ उत्तर प्रदेश से इतनी सीटों का नुकसान भाजपा को हो सकता है कि लोकसभा में अकेली पार्टी के तौर पर उसके पास स्पष्ट बहुमत न रहे.

अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ऐसा क्या कर सकती है कि 2019 में फिर से भाजपा की सरकार बन पाए. कई राजनीतिक जानकारों और राजनीतिक लोगों से बातचीत के आधार पर ये पांच चीजें उभरकर आती हैंः

एनडीए का विस्तार

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की अहमियत 2014 के चुनावों नतीजों के आने के बाद तब कम हो गई जब भाजपा को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिल गया. सहयोगी दलों के नेताओं को सरकार में तो जगह दी गई लेकिन, आम धारणा यह है कि उन्हें ताकतवर मंत्रालय नहीं दिए गए और सरकार में उनकी बहुत चलती नहीं है. इस वजह से भाजपा के सहयोगियों में लगातार असंतोष बना रहा है. कुछ ने मुखर होकर अपनी बात कही है तो अधिकांश आॅफ दि रिकाॅर्ड यह शिकायत करते हैं.

चंद्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टी एनडीए से अलग हो गई. शिव सेना को लगातार शिकायत रहती है. अब लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता दल भी मुखर हो रहे हैं. ऐसे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह अगला लोकसभा चुनाव जीतना चाहते हैं तो उन्हें न सिर्फ मौजूदा सहयोगियों को पूरे सम्मान से अपने साथ बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए बल्कि अलग-अलग राज्यों के और भी दलों को एनडीए के साथ जोड़ना चाहिए. ये लोग एक उदाहरण तमिलनाडु के अन्नाद्रमुक को एनडीए में औपचारिक तौर पर लाने के तौर पर दे रहे हैं. ऐसे ही दूसरे कई दल दूसरे राज्यों में भी हैं.

राष्ट्रीय के साथ क्षेत्रीय मुद्दों पर भी जोर

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के बारे में आम धारणा यह बनी है कि यह स्थानीय निकायों का चुनाव भी राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ना चाहती है. जबकि विपक्ष ने क्षेत्रीय मुद्दों के साथ प्रयोग करके भाजपा को पटखनी दी है. इसका सबसे ताजा उदाहरण पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कैराना उपचुनाव है. यहां भाजपा मोहम्मद अली जिन्ना की अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगी तस्वीर को मुद्दा बनाने की कोशिश करती रही और लोक दल ने गन्ना किसानों की परेशानी को मुद्दा बनाकर बाजी मार ली. इसलिए यह कहा जा रहा है कि भाजपा एक राष्ट्रीय दृष्टि तो रखे लेकिन स्थानीय मुद्दों को भी अपने चुनाव अभियान में तवज्जो दे. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि विपक्ष स्थानीय मुद्दों को तरजीह देने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है.

पार्टी क्षत्रपों को अहमियत

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा हर चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ती आई है और इस रणनीति से पार्टी को असाधारण कामयाबी भी मिली है. लेकिन 2019 लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस जिस तरह से गठबंधन कर रही है, उसमें स्थानीय नेताओं का अपने-अपने राज्यों में खास महत्व होगा. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे तो रखे लेकिन, अपने क्षत्रपों या अपने सहयोगी दलों के क्षत्रपों को भी महत्व दे ताकि विपक्ष की रणनीति का मुकाबला किया जा सके.

पिछड़ों को अहमियत

उत्तर प्रदेश में जिस तरह का महागठबंधन आकार लेता दिख रहा है, उसमें यह तय माना जा रहा है कि महागठबंधन पिछड़ों की आक्रामक राजनीति करेगा. अल्पसंख्यक स्वाभाविक तौर पर महागठबंधन के पाले में रहेंगे, इसलिए जानकारों के मुताबिक उन्हें लेकर इसे आक्रामकता दिखाने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसा करने से भाजपा को ध्रुवीकरण का फायदा मिल सकता है. लेकिन पिछड़ों के मुद्दों पर महागठबंधन आक्रामक रहकर भाजपा को घेरने की कोशिश जरूर करेगा.

अगर भाजपा को इसका मुकाबला करना है तो उसे पिछड़ों के साथ खड़ा होना होगा. जानकार मानते हैं कि सिर्फ हवा-हवाई बात करने से काम नहीं चलेगा. टिकटों के बंटवारे में भाजपा को पिछड़ों को वाजिब प्रतिनिधित्व देना होगा. कुछ लोग तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में महागठबंधन से मुकाबला करने के लिए नेतृत्व परिवर्तन यानी मुख्यमंत्री बदलने का सुझाव भी दे रहे हैं. इनका मानना है कि पार्टी को पिछड़े समाज के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना देना चाहिए. लेकिन चुनावों के पहले नेतृत्व परिवर्तन का खतरा भितरघात के तौर पर देखने को मिल सकता है.

महागठबंधन में दरार की कोशिश

उत्तर प्रदेश के महागठबंधन के बारे में यह माना जा रहा है कि यह भाजपा और 2019 लोकसभा चुनावों में जीत के बीच आकर खड़ा हो गया है. महागठबंधन के घटकों का आरोप है कि भाजपा अपने स्तर पर लगातार इस बात की कोशिश कर रही है कि महागठबंधन में दरार पड़ जाए और सपा-बसपा अलग-अलग हो जाएं. हर राजनीतिक व्यक्ति की यही राय है कि अगर किसी तरह से महागठबंधन पटरी से उतर गया और सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़े तो वोटों के बंटवारे से फिर भाजपा को सबसे अधिक फायदा होगा. ऐसे में अधिकांश राजनीतिक लोगों का यह मानना है कि अगर मोदी-शाह की जोड़ी 2019 लोकसभा चुनावों में जीत को लेकर आश्वस्त होना चाहती है तो उसे महागठबंधन में दरार पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए.