गांधीवादी विचारक अव्यक्त सत्याग्रह के नियमित लेखक हैं.


हम चारों भाई-बहन तब किशोर उम्र के रहे होंगे. हम दो भाई और हमारी दो जुड़वी बहनें. शाम को आंगन में खुले आकाश के नीचे हम चारों लालटेन की रोशनी में पढ़ रहे थे. पढ़ते हुए हम सब पर नींद की मानो बेहोशी छा रही थी. नींद के उस झोंके में हम पहले से रटी हुई कविताएं और कहानियां बुदबुदाए जा रहे थे. रसोई में रोटियां बना रहीं हमारी निरक्षर मांओं को आश्वस्त करने के लिए अमूमन यही तरीका जाने कब से काम में लाया जाता रहा था. हालांकि हम भाई-बहनों ने एक और तरीका ढूंढ़ा था कि हम चार में से कोई दो यदि एकाध झपकी लेना चाहें तो बाकी दो जोर-जोर से पढ़ने का दिखावा जारी रखें. उस दिन भी रोज की तरह हम सभी नींद के मारे असहाय हुए जा रहे थे. कुछ देर में एक-एक कर तीनों भाई-बहन चटाई पर अलग-अलग दिशाओं में सो गए. उस अलिखित समझौते के तहत इस राज को छिपाए रखने की जिम्मेदारी अब अकेले मुझपर थी.

लेकिन चारों में सबसे छोटा मैं, एक कच्चा पहरेदार निकला. ऐसा लग रहा था मानो हवा में नींद का रस घुला हुआ हो. लगा जैसे कोई आम के बगीचे वाले हमारे झूले पर मुझे झुला रहा हो. मैं आंखें बंद करके उस आभासी झूले पर झूलने लगा. वह झूला दरअसल नींद ही थी. अचानक मैं लालटेन पर ही लुढ़क गया. लालटेन गिर गई. उसका शीशा टूटते-टूटते बचा. किरासन तेल (कैरोसीन ऑयल) उसके बर्नर में घुस गया. फक-फक करते हुए वह बुझ गया. यह आवाज सुनकर जब तक मां दौड़ी-दौड़ी आई, तब तक मेरे भाई-बहन देह झाड़कर सामान्य अवस्था में आ चुके थे. हालांकि अब हमारा वह अलिखित समझौता टूट चुका था. अगले ही पल इस घटना का सारा ठीकरा मुझ पर फोड़ दिया गया. कहा गया कि मुझे पढ़ते हुए बड़ी नींद आती है, इतनी कि होश नहीं रहता. मेरे तीनों भाई-बहन सरकारी गवाह बन चुके थे. मैं अकेला अपराधी घोषित हुआ!

उन्हीं दिनों मां ने भी यह महसूस किया कि मुझे दिन में ही कहीं भी बैठे-बैठे नींद आ जाती थी. यहां तक कि मुझे खुद भी ऐसा महसूस होने लगा था. ऐसा लगता कि दौड़-धूप करते, बगीचे में खेलते और यहां तक कि मित्र-मंडली में बातचीत करते भी मैं उनींदा ही रहता.

फिर एक रोज़ रात के खाने पर मां ने अपनी यह चिंता बाबूजी को बताई. बाबूजी ने कहा कि कुछ नहीं अमरसा का असर है. ‘अमरसा’ यानी गांव की अमराइयों से होकर बहनेवाली रसदार हवा जिसमें आलस और नींद का रस घुला होता है. इस पर मां की प्रतिक्रिया थी - ‘दिन-रात कलमबाग (आम के बगीचे के लिए मिथिला में प्रचलित शब्द) में आमों की पहरेदारी करते-करते आपको हर बात में अमरसा ही नजर आता है. बच्चा बीमार है. इसे डॉक्टर के पास ले जाना होगा.’ इस पर बाबूजी तनिक झुंझला गए और उन्होंने कहा - ‘मैं दिन-रात आम की रखवाली करूं या इन सुतक्कड़ को डॉक्टर के पास ले जाता रहूं.’ मां ने शिकायती अंदाज में कहा - ‘कोई बात नहीं. मैं ही लेकर जाऊंगी.’

थोड़े दिन पहले ही पास के मोहल्ले का एक युवक डॉक्टर हुआ था. उसकी प्राइवेट प्रैक्टिस भी चलती थी. हम उन्हें उनके घरेलू नाम ‘बबलू भैया’ कहकर ही बुलाते थे. वो हमसे फीस नहीं लेते, इसलिए मां ने उन्हें देने के लिए चुन-चुनकर अच्छे-अच्छे गछपक्कू (पेड़ में ही पके हुए) आम झोले में भर लिए.

नौसिखिए डॉक्टर ने गौर से मेरे स्थायी और अनियंत्रित उनींदेपन की कहानी सुनी. फिर मुझसे कुछ इधर-उधर का सवाल पूछा. कहा स्कूलों में तो गर्मी की छुट्टियां चल रही होंगी. दिनभर करते क्या हो? मां ने जवाब दिया - ‘करना क्या है. दिनभर आम के बगीचे में उछल-कूद करना और आम खाते रहना. जब भी कहीं बैठते हैं ऊंघने लगते हैं. इसके पिताजी कहते हैं कि अमरसा की हवा का असर है. लेकिन मुझे तो बड़ा डर लग रहा है. आजकल तो इन्हें घर का कुछ भी खाना नहीं सुहाता. दिनभर आम के फलाहार पर ही रहते हैं.’ इतना कहते ही मां ने आम का झोला उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा - ‘ये कुछ पेड़ के पके आम आपके लिए भी लेकर आई थी.’ डॉक्टर ने कहा - ‘अब समझ में आया. इनको कोई बीमारी नहीं है. और यह असर केवल अमरसा की हवा का भी नहीं है.’

‘फिर क्या हुआ है इसे?’ मां ने चिंतित होकर पूछा. ‘यह सब आम की माया है. जो दिन-रात आम ही खाएगा, और आम के अलावे कुछ न खाएगा, उसका हाल और क्या होना है! यह अमरसा के हवा का नहीं आम के रस का असर है. इसका उनींदापन तो अब आम के साथ ही जाएगा.’ इसके बाद मां ने मेरी तरफ देखा और कहा - ‘सुन लिए न? आज से आम खाना बंद!’ मां की बात को बीच में काटते हुए डॉक्टर ने कहा - ‘नहीं, नहीं, यह तो अन्याय होगा. आम खाना पूरी तरह बंद नहीं करना है. बस थोड़ा कम हो जाए और आम के साथ-साथ घर का खाना भी इन्हें रुचने लगे, तो सब ठीक हो जाएगा.’

मैं तो रुआंसा हो चला था. दवा के झंझट से छूटे, तो परहेज और पाबंदियां गले पड़ीं! और मेरे बागों के आम जो मुझे खुद बुलाते हैं कि आओ मुझे खाओ, मुझे चूसो, उनके उस बुलावे पर क्या करूंगा, क्या कहूंगा? क्या मेरे साथी मुझपर हंसेंगे नहीं? साथियों के बीच आम खाने में अव्वल होने का तमगा छिन न जाएगा? तो क्या अब बाग में जाने पर पाबंदी लग जाएगी? इतने बम्बई और किसुनभोग जो मूंग के झाड़ में खेतों में छिपा रखे हैं, उनका क्या होगा? और वो गेहूं की भूसी में गोरे गए (पकने के लिए गर्म स्थान पर रखे गए) फैजली, चौड़िया और जर्दालू का क्या होगा? हाय! मालदह तो अभी पकने शुरू भी नहीं हुए, क्या इस बार उसका कतरा खाने को न मिलेगा? रास्तेभर यह सब सोचते हुए दिल बैठा जा रहा था.

घर पहुंचते ही मां सीधे मुझे बगीचे में बाबूजी के पास ले गई. बाबूजी ने मचान पर बैठे-बैठे सारी बातें सुनीं. डॉक्टर-रूपी जज के बाद अब बाबूजी-रूपी राष्ट्रपति से ही मेरी उम्मीद बची थी. बाबूजी ने कहा - ‘मैं तो पहले ही कह रहा था, यह अमरसा का असर है. अब आम के मौसम में बच्चा आम नहीं खाएगा, तो क्या करेगा. बड़े आए आज के जमाने के डॉक्टर. न तो नींद कोई बीमारी है और न आम कोई समस्या. भादो में कलकतिया और सड़ही के पकने तक ही तो बच्चा आम खाएगा. गाछ में आम टक-टक ताकता रहे और बच्चे के मुंह में जाब लगा रहे, यह तो सरासर अन्याय होगा.’ उनकी बात पूरी होते-होते मैं पास के ही बिज्जू की फुनगी पर चढ़ते हुए अधपके और ललियाए आमों को टटोल रहा था.

उस घटना के लगभग तीस साल बाद अब डॉक्टर गूगल ने पूछने पर बताया कि आम में ट्रिप्टोफेन नाम का एक एमिनो एसिड पाया जाता है, जो हमारी नींद को बढ़ाने में मदद करता है. तो मेरे दोस्तों, अनिंद्रा से जूझ रही दुनिया के लिए आम बड़ी चीज है. आम खाइये, अच्छी नींद लीजिए और प्रकृति का धन्यवाद कीजिए.