पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद संगठन की सदस्यता के लिए आने वाले आवेदनों में चार गुना बढ़ोतरी हुई है. द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक संघ ने यह दावा प्रणब मुखर्जी को लिखे पत्र में किया है. इस पत्र में पूर्व राष्ट्रपति का ‘अपने (कांग्रेस) लोगों द्वारा विरोध’ किए जाने के बाद भी सात जून के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए आभार जताया गया है

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में नागपुर के संघ मुख्यालय पहुंचे तो काफी हो-हल्ला हुआ. कांग्रेस में उनके पुराने सहयोगी रहे नेताओं ने उन पर सबसे अधिक हमले किए. यहां तक की प्रणब मुखर्जी की बेटी और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी अपने पिता को संघ मुख्यालय नहीं जाने की सलाह दी. इसके बावजूद प्रणब मुखर्जी वहां गए.

इसके बाद शिव सेना के सर्वेसर्वा उद्धव ठाकरे का बयान सुर्खियां बन गया. उनके मुताबिक संघ इस योजना पर काम कर रहा है कि अगर 2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बहुमत नहीं मिलता तो कांग्रेस को रोकने के लिए प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनवा दिया जाए.

उद्धव ठाकरे की इस बात में कितनी सच्चाई है, इस बारे में अभी ठीक-ठीक कुछ कह पाना तो मुश्किल है लेकिन प्रणब मुखर्जी और संघ से जुड़ी कुछ पुरानी ऐसी बातें हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी भी राजनीतिक संभावना को अभी से ही खारिज करना ठीक भी नहीं है.

प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे तो उस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत उनसे राष्ट्रपति भवन में चार बार मिले थे. एक बार तो ऐसा भी हुआ कि मोहन भागवत ने राष्ट्रपति भवन में ही रात्रि प्रवास किया. इससे पता चलता है कि मोहन भागवत और प्रणब मुखर्जी के आपसी संबंध किस तरह के हैं. इन दोनों के आपसी संबंधों में वह कटुता नहीं दिखती जो कांग्रेस पार्टी के अधिकांश नेताओं और संघ परिवार के बीच दिखती है. लेकिन जब मोहन भागवत राष्ट्रपति भवन में जाकर प्रणब मुखर्जी से मिल रहे थे और वहां रुके थे, तब किसी कांग्रेसी नेता ने इसका विरोध नहीं किया.

अब यह बात सामने आ रही है कि राष्ट्रपति भवन में ही मोहन भागवत ने प्रणब मुखर्जी को संघ मुख्यालय आने का न्यौता दिया था. बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर प्रणब मुखर्जी ने उस वक्त यह कहा कि वे संघ मुख्यालय आएंगे जरूर लेकिन राष्ट्रपति पद से हटने के बाद. यह मोहन भागवत और प्रणब मुखर्जी की आपसी नजदीकी ही थी कि जिस वजह से पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनावों से पहले कई बार यह बात चली कि प्रणब मुखर्जी को ही दूसरा कार्यकाल देने पर भी विचार चल रहा है.

प्रणब मुखर्जी के राजनीतिक जीवन में प्रधानमंत्री पद के अलावा उन्हें सब कुछ मिला. प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को प्रणब मुखर्जी छिपाते नहीं हैं. पहली बार उनकी यह इच्छा 1984 में जाहिर हुई थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को ऐसा लग रहा था कि प्रधानमंत्री पद पर उनका हक है. लेकिन राजीव गांधी प्रधानमंत्री बन गए. इसके बाद प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस में एक दूरी भी बनी जो कुछ साल बाद खत्म हुई.

2004 में भी जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया तो उस वक्त भी इस पद के जो दावेदार उभरकर सामने आए थे, उनमें प्रणब मुखर्जी सबसे मजबूत दावेदार थे. लेकिन इस बार भी बाजी उनके हाथ नहीं लगी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए.

कई खंडों में प्रणब मुखर्जी जो अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं, उसके सबसे हालिया खंड में भी इस बात का जिक्र है कि मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक बार ऐसा मौका आया जब उन्हें लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. लेकिन फिर ऐसा नहीं हुआ और उन्हें राष्ट्रपति बना दिया गया.

अपने देश में पूर्व राष्ट्रपति के फिर से प्रधानमंत्री बनने या राजनीति में सक्रिय होने को लेकर कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है. यह परंपरा का हिस्सा जरूर रहा है कि कोई राष्ट्रपति उस पद से हटने के बाद दोबारा राजनीति में सक्रिय नहीं हुआ है.

लेकिन राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है. अगर कोई राजनीतिक परिस्थिति ऐसी बनती है जिसमें प्रणब मुखर्जी तक प्रधानमंत्री की कुर्सी खुद पहुंचती है तो फिर उनके सामने अपना सपना पूरा करने का विकल्प होगा. जानकारों के मुताबिक असीमित संभावनाओं वाली राजनीति में अगर किसी खास सियासी परिस्थिति में संघ की ओर से ही प्रणब मुखर्जी तक ऐसा प्रस्ताव आ जाए तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए. संघ को ऐसा करके दो फायदे होंगे. पहला यह कि वह कांग्रेस को सत्ता में आने से रोक लेगा. दूसरा फायदा यह होगा कि इसे वंशवाद की राजनीति के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाए सकेगा.

प्रणब मुखर्जी की पहचान राजनीति में हर दल और हर नेता को साधकर चलने वाले नेता की रही है. उनके हर पार्टी के नेताओं से अच्छे ताल्लुकात हैं. यही वजह थी कि जब वे राष्ट्रपति का चुनाव लड़े तो उनके समर्थन में भाजपा के सहयोगी भी उतर आए. नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड और उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने प्रणब का साथ दिया था. कहा तो यह भी जाता है कि कुछ भाजपा सांसदों ने भी इस दौरान क्राॅस वोटिंग की थी.

एक वर्ग की मानें तो सबको साथ लेकर चलने वाले प्रणब मुखर्जी से संघ को यह खतरा नहीं रहेगा कि प्रधानमंत्री के तौर पर प्रणब उसके हाथ से निकल जाएंगे क्योंकि प्रणब मुखर्जी हमेशा धारा के साथ चले हैं. राष्ट्रपति के तौर पर भी कई मौके ऐसे आए जब बहुत लोगों को यह अखरता रहा कि वे नरेंद्र मोदी सरकार की हां में हां मिला रहे हैं. इन्हीं लोगों को प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय जाने से भी बहुत आपत्ति थी.

लेकिन इन आपत्तियों के बीच प्रणब मुखर्जी अपनी राजनीति को समझते हैं, और उनके राजनीतिक कौशल पर उनके समर्थकों के साथ-साथ उनके विरोधियों को भी संदेह नहीं है. ऐसे में प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय जाने में किसी तरह की राजनीति को नहीं देखना बड़ी भूल होगी.