हाल में ब्रिटेन की सरकार ने आसान नियमों के तहत वीज़ा पाने वाले देशों की सूची से भारत को बाहर कर दिया. उसके इस क़दम से उन भारतीय छात्रों में ख़ासी निराशा है जो ब्रिटेन के शीर्ष विश्वविद्यालयों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं. अब उन्हें वीज़ा पाने के लिए ज़्यादा कठिन प्रक्रिया से गुज़रना होगा. इसके तहत भारतीय छात्रों को शैक्षिक और वित्तीय दस्तावेज़ों के अलावा अपने अंग्रेज़ी ज्ञान से संबंधित दस्तावेज़ भी जमा कराने होंगे. नए नियम छह जुलाई, 2018 से लागू हो जाएंगे.

हाल में आई इस ख़बर के बाद शुरू में ब्रिटेन की तरफ़ से बहाने बनाए जा रहे थे. उस समय वहां के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था, ‘हम ब्रिटेन में पढ़ने की इच्छा रखने वाले भारतीय छात्रों का स्वागत करते हैं. चीन और अमेरिका को छोड़कर किसी भी देश की तुलना में भारतीय छात्रों को सबसे ज़्यादा वीज़ा जारी किए जाते हैं.’ ब्रिटिश मंत्रालय के मुताबिक़ ब्रिटेन आने के लिए आवेदन देने वाले ज़्यादातर भारतीय छात्रों को वीज़ा मिल जाता है. उसने कहा कि 2014 में 86 प्रतिशत भारतीयों को वीज़ा मिला था. अब यह आंकड़ा 90 प्रतिशत हो गया है.

अब हाल ही में आई द हिंदू अख़बार की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत सरकार के एक सूत्र ने ब्रिटेन के इस फ़ैसले के पीछे का कारण बताया है. बीते अप्रैल में अपने ब्रिटेन दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और ब्रिटेन के बीच हुए 20 से ज़्यादा समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन एक समझौते पर हस्ताक्षर करने से उन्होंने ऐन वक़्त पर इनकार कर दिया था. समझौते (एमओयू) में ब्रिटेन में अवैध रूप से रह रहे भारतीयों को वापस भारत भेजने की बात कही गई थी. अख़बार के मुताबिक़ भारत सरकार के सूत्र ने बताया कि समझौते पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर नहीं करने की वजह से ही ब्रिटेन ने भारतीयों के लिए वीज़ा प्रक्रिया जटिल कर दी है.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अवैध भारतीय प्रवासियों को लेकर भारत और ब्रिटेन के बीच तनाव विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के 2016 के ब्रिटेन दौरे के समय से बना हुआ है. वहां प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने मुलाक़ात के दौरान सुषमा स्वराज से कहा था कि वे भारत के साथ बेहतर वीज़ा समझौते को लेकर विचार कर सकती हैं लेकिन, इसी दौरान दोनों देशों को ब्रिटेन में अवैध रूप से रह रहे भारतीयों की घरवापसी के बारे में भी विचार करना होगा. सरकारी सूत्र के मुताबिक़ इसी को लेकर भारत और ब्रिटेन के संबंध अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं.

और अब पिछले पखवाड़े के बहानों को पीछे छोड़ते हुए ब्रिटेन भी इस मुद्दे पर खुल कर सामने आ गया है. उसने साफ़ कहा है कि अवैध रूप से ब्रिटेन आए भारतीयों की वापसी के लिए प्रस्तावित समझौते पर भारत के हस्ताक्षर नहीं करने की वजह से ही भारतीय छात्रों के लिए वीज़ा नियम मुश्किल कर दिए गए हैं.

भारत समझौते पर क्यों हस्ताक्षर नहीं कर रहा?

यह बात इसी महीने इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से सामने आई कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस समझौते पर हस्ताक्षर करने से रोक दिया था जिस पर अवैध भारतीयों को (15 दिन के अंदर) भारत वापस भेजने की बात कही गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक़ केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समझौते को मंज़ूरी दे दी थी और ब्रिटेन दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी उस पर हस्ताक्षर करने वाले थे. लेकिन आख़िरी समय में विदेश मंत्री ने समझौते की शर्तों पर आपत्ति जता दी थी.

दरअसल मंत्रालय के अधिकारियों और भारतीय एजेंसियों का कहना था कि इस समझौते को लेकर उनसे राय-मशविरा नहीं लिया गया था. भारत के अधिकारियों का कहना था कि उनकी जानकारी में ऐसे कई मामले हैं जिनमें भारतीयों के बजाय बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या श्रीलंका के नागरिकों को ब्रिटेन से भारत भेज दिया गया. एक अधिकारी का कहना था कि दूसरे देशों के ये नागरिक भारतीय होने का दावा करते हैं और उम्मीद करते हैं कि यहां उनसे अच्छा व्यवहार किया जाएगा, लेकिन बिना सही दस्तावेज़ों के किसी की पहचान करना आसान नहीं है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन समेत पूरे यूरोप में इस समय क़रीब 40 हजार भारतीय अवैध रूप से रह रहे हैं. ब्रिटिश सरकार का कहना है कि इन लोगों को तुरंत भारत भेजने की ज़रूरत है. वहीं, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने ब्रिटिश सरकार को आश्वासन दिया है कि भारत सरकार समझौते की शर्तों पर फिर विचार करेगी. साथ ही भारतीय एजेंसियों से कहा जाएगा कि वे तय समयसीमा के अंदर अवैध प्रवासियों की पहचान करें. हालांकि इससे पहले ही इस मुद्दे पर दोनों देशों के संबंध नकारात्मक वजहों के चलते चर्चा में हैं.

क्या व्यापार पर असर पड़ सकता है?

ब्रिटेन ने यह क़दम ऐसे समय में उठाया है जब वह यूरोपीय संघ से अलग (जिसे ब्रेक्ज़िट कहा जाता है) होने के बाद भारत से खुले व्यापारिक संबंध चाहता है. कुछ जानकारों का कहना है कि वीज़ा के मुद्दे पर उसके फ़ैसले से दोनों देशों के व्यापारिक संबंध बिगड़ सकते हैं. यूके काउंसिल फ़ॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट अफेयर्स के अध्यक्ष और भारतीय मूल के व्यवसायी लॉर्ड करण बिलिमोरिया ने भारतीय छात्रों के लिए वीज़ा नियम कठिन करने को भारत का अपमान बताया था. उन्होंने कहा था, ‘मैं इसे भारत के प्रति बुरा व अनुचित व्यवहार मानता हूं. यह पाखंडपूर्ण फ़ैसला ऐसे समय में लिया गया है जब ब्रेक्ज़िट के बाद ब्रिटेन भारत से खुला व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है.’

हालांकि ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री लियाम फाक्स अलग राय रखते हैं. उनका कहना है, ‘भारत के साथ हमारे संबंध मजबूत हैं. ये केवल व्यापार से नहीं जुड़े हैं. अप्रैल में राष्ट्रमंडल देशों के प्रमुखों की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आए भारतीय मंत्रिमंडल ने उस समझौते को मंज़ूरी दे दी थी जिसमें ब्रिटेन में अवैध रूप से रहने वाले भारतीय प्रवासियों तथा भारत में अवैध तरीक़े से रह रहे ब्रिटिश नागरिकों को उनके देश वापस भेजने की बात कही गई थी. प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान क़रीब 25 एमओयू पर हस्ताक्षर होने थे जिनमें से एक यह भी था.’

भारतीय छात्रों से होने वाले व्यवहार को लेकर चिंता

कई जानकारों का कहना है कि भारत को आसान वीज़ा वाले देशों की सूची से निकालकर जोख़िम भरे देशों की सूची में डालने की वजह से अब ब्रिटेन में भारतीय छात्रों के साथ होने वाले व्यवहार में अंतर देखने को मिल सकता है. ब्रिटेन स्थित राष्ट्रीय भारतीय छात्र व पूर्व छात्र संघ की अध्यक्षा सनम अरोड़ा कहती हैं, ‘भारत को जो संदेश दिया जा रहा है हम उससे चिंतित हैं. क्या हम यह बताना चाह रहे हैं कि भारत से फ़र्ज़ी छात्र आते हैं?’ सनम आगे कहती हैं, ‘(ब्रिटिश सरकार की) घोषणा के बाद भारतीय छात्रों की आवेदन प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं आएगा लेकिन, इससे जो संदेश उनमें गया है वह चिंता पैदा करता है. क्या यह सही है कि एक ब्रिटिश विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले भारतीय छात्र से किसी चीनी छात्र की अपेक्षा अलग व्यवहार किया जाए.’