क्रिकेट में बारहमासी व्यस्तता और टेस्ट मैचों से बढ़ती दूरी न तो खिलाड़ियों के लिए ठीक है और न ही खेल के लिए.
कभी मौसमी खेल कहा जाने वाला क्रिकेट अब हर मौसम के आम की तरह हो गया है. लेकिन बारहमासी मिलने वाले या बोतल बंद आम के रस में वह मजा कहां जो गर्मी के मौसम में मिलने वाले दशहरी-लंगड़ा-चौसा आमों में है. बारहों महीने खेले जाने वाले क्रिकेट ने भी खेल की गुणवत्ता और खेलने वालों की फिटनेस पर कुछ ऐसा ही फर्क डाला है.
एक समय था क्रिकेट का मौसम सितंबर से शुरू होकर मार्च तक चलता था. इसके बाद भयानक गर्मी में मैदान सूने पड़े रहते थे. अब आलम यह है कि साल भर क्रिकेट का खुमार चढ़ा रहता है. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि बीते अप्रैल और मई की गर्मी में हिन्दुस्तान में 1000 से ज्यादा लोग गर्मी से मर गए. लेकिन इस दौरान चल रहे आईपीएल में खिलाड़ी बिना शिकायत मैदानों में डटे रहे. इसके बाद भारतीय क्रिकेट टीम बांग्लादेश के दौरे पर पहुंच गई है.
जिस अप्रैल और मई की गर्मी में हिन्दुस्तान में 1000 से ज्यादा लोग गर्मी से मर गए वहां आईपीएल के दौरान खिलाड़ी मैदानों में डटे रहे. पैसे की चमक ने इस गर्मी को भी मात दे दी.
कभी भद्रजनों का खेल कहा जाने वाला क्रिकेट अब पैसा कमाने की मशीन बन गया है. आईपीएल की कामयाबी के बाद से मानो इसके फटाफट संस्करण को दुहने की होड़ लग गई है. क्रिकेट खेलने वाले लगभग सभी देशों ने अपने यहां टी-20 क्रिकेट लीग की शुरुआत कर दी है. पिछले हफ्ते पाकिस्तान ने भी आईपीएल की तर्ज पर 'पाकिस्तान सुपर लीग' की घोषणा की है. इस दौड़ में खेल का लंबा प्रारूप कहीं पीछे छूट गया लगता है
टेस्ट क्रिकेट शास्त्रीय संगीत की तरह है जो सही मायने में खिलाड़ी के कौशल को परखता है. धैर्य और तकनीक की पूरी परीक्षा लेने वाला क्रिकेट का यह संस्करण किसी भी खिलाड़ी के खेल को संपूर्णता देता है. लेकिन पैसों की चमक के चलते इसे कम तरजीह मिलने लगी है. ऑस्ट्रेलिया के माइक हसी को ही लीजिए जिनका वनडे में 48 और टेस्ट में 51 का औसत है. उन्होंने दो साल पहले खेल के हर प्रारूप से संन्यास ले लिया था. लेकिन आईपीएल के लिए वे हमेशा फिट नज़र आते हैं. 2011 में आईपीएल के दौरान श्रीलंकाई क्रिकेट बोर्ड ने जब लसिथ मलिंगा को टेस्ट टीम में चुनने के लिए उनसे आईपीएल छोड़कर चोटों से उबरने को कहा तो उन्होंने मुंबई इंडियंस को देश की टेस्ट टीम से ज्यादा तरजीह दी. यहां तक कि श्रीलंकाई बोर्ड द्वारा उन पर दबाव बनाये जाने पर उन्होंने तुरंत टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले लिया. साफ है कि पैसे के मोह ने देश के लिए खेलने के गौरव को भी पीछे छोड़ दिया.
टेस्ट क्रिकेट शास्त्रीय संगीत की तरह है जो सही मायने में खिलाड़ी का कौशल परखता है. धैर्य और तकनीक की पूरी परीक्षा लेने वाला खेल का यह संस्करण किसी भी खिलाड़ी के खेल को संपूर्णता देता है.
टेस्ट क्रिकेट के उलट टी-20 पूरी तरह से बल्लेबाजों का खेल है. इसमें बल्लेबाज क्रीज पर करो या मरो का मंत्र लेकर उतरता है. टेस्ट मैच में जो शॉट खेलना गलत माना जाता है, टी-20 में उसी की तारीफ़ की जाती है. खेल के इस छोटे प्रारूप में गेंदबाजों का लक्ष्य विकेट लेना नहीं, रन बचाना होता है. लेकिन टेस्ट मैच में जब तक गेंदबाज विपक्षी टीम के सभी 20 विकेट चटकाने का दम न रखते हों, तब तक जीत की कल्पना तक नहीं की जा सकती. अगर, गौर किया जाए तो पिछले चार-पांच सालों में टेस्ट क्रिकेट और श्रृंखलाओं के आयोजन में भारी गिरावट आई है. जबकि खिलाड़ियों की व्यस्तता पहले से कई गुना बढ़ गयी है.
बात किसी खेल की हो या गणित और विज्ञान की, हमेशा एक कोच और शिक्षक अपने शिष्यों को बेसिक्स यानि आधार मजबूत करने की सलाह देता है. जाहिर है, जब शुरुआत ही फटाफट क्रिकेट को ध्यान में रख कर होगी तो टेस्ट क्रिकेट खेलने के लिए जरूरी क्षमता और धैर्य कहां से आएगा. लेकिन यह इस खेल में पैसे की धमक ही है कि देश और एक बड़ी हद तक दुनिया में इस खेल को चलाने वाली बीसीसीआई इस सवाल से मुंह फेरे दिखती है. साफ नजर आता है कि वह भारतीय टीम में चयन के लिए खिलाड़ियों के रणजी प्रदर्शन की जगह अब आईपीएल प्रदर्शन को तरजीह दे रही है. पहले जहां क्रिकेटर रणजी खेल कर टेस्ट या वनडे टीम में शामिल होने का लक्ष्य रखता था, वहीँ अब नए खिलाड़ियों का पहला लक्ष्य आईपीएल होता है.
जब शुरुआत ही फटाफट क्रिकेट को ध्यान में रख कर होगी तो टेस्ट खेलने के लिए जरूरी क्षमता और धैर्य कहां से आएगा. लेकिन खेल को चलाने वाली संस्था बीसीसीआई इन सवालों से मुंह फेरे दिखती है.
बीसीसीआई पर हमेशा आरोप लगता रहा है कि यह हमेशा अपने निर्णय आर्थिक नफा-नुकसान देख कर लेती है. कुछ समय पहले जब वेस्टइंडीज की टीम भारत दौरा बीच में छोड़ कर चली गयी थी तो सभी जानते थे कि यह निर्णय कैरेबियाई खिलाडियों का था और इसके पीछे उनके अपने बोर्ड से मतभेद थे. लेकिन यहां भी बीसीसीआई ने दोहरी रणनीति ही अपनायी. उसने वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड पर भारी जुर्माना तो लगाया ही, दोनों देशों के बीच होने वाले दौरों पर कई साल के लिए प्रतिबंध भी लगा दिया. लेकिन जिन खिलाड़ियों ने दौरा बीच में छोड़ने का निर्णय लिया था उन्हें बीसीसीआई ने भारतीय सरजमीं पर आईपीएल खेलने की अनुमति दे दी.
टेस्ट क्रिकेट से खिलाड़ियों की बढ़ती दूरी का मतलब है, कि उनके खेल में धैर्य, अनुशासन, ठहराव और परिपक्वता की कमी. टेस्ट का प्रारूप ऐसा है कि जिसमें खिलाड़ी अपनी कमी को अच्छे से समझ सकता है. पहले टेस्ट क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन ही एक खिलाड़ी की खेल में परिपक्वता और मजबूती पर मुहर लगाता था. कई देशों में तो खिलाड़ी को टेस्ट कैप मिलना एक बड़ा सम्मान माना जाता था. लेकिन क्रिकेट के इस लम्बे प्रारूप के अस्तित्व पर आज संकट के बादल मंडराने लगे हैं. इसकी कम होती महत्ता और ज्यादा क्रिकेट का परिणाम बांग्लादेश जैसे देश से इतनी बड़ी हार के रूप में सामने आ रहा है.