इस बार संगीत-नाटक अकादमी पुरस्कारों के लिए नाम तय करते वक़्त स्थितियां सहज नहीं थीं. सूत्रों की मानें तो एक नाम पर ख़ास तौर विवाद की स्थिति बनी थी. आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने उन्हें पुरस्कार देने पर आपत्ति उठाई. इसके बाद अकादमी को उनकी पृष्ठभूमि की जांच करानी पड़ी. इस चक्कर में पुरस्कारों की घोषणा में भी लगभग दो सप्ताह की देर हुई.

द इकॉनॉमिक टाइम्स के अनुसार संगीत-नाटक अकादमी की सामान्य परिषद की इसी आठ जून को मणिपुर की राजधानी इंफाल में बैठक हुई थी. इस बैठक में 2017 के पुरस्कारों के लिए 42 नामों को मंज़ूरी दे दी गई थी. मगर इनकी घोषणा 20 जून को की जा सकी क्योंकि आरएसएस और भाजपा के पदाधिकारियों को एक नाम पर ख़ास आपत्ति थी. यह नाम- रंगकर्मी सुनील शानबाग का था. भाजपा-आरएसएस के पदाधिकारी चाहते थे कि शानबाग का नाम पुरस्कार विजेताओं की सूची से हटा दिया जाए.

अपनी मांग के समर्थन में भाजपा-आरएसएस के पदाधिकारियों की दलील थी कि शानबाग जैसे कलाकारों को सम्मानित करने से राष्ट्रवाद और हिंदू मान्यताओं को आघात पहुंचेगा. उन्होंने अपनी इस मांग के पक्ष में दलील दी थी कि शानबाग 2015 में कथित असहिष्णुता के नाम पर चलाए गए पुरस्कार वापसी अभियान में शामिल रहे हैं. उन्होंने खुले तौर पर सांस्कृतिक संस्थानों पर सरकार की पकड़ मज़बूत किए जाने की कोशिशों का भी विरोध किया था. यही नहीं उनके माओवादियों से भी संबंध हैं.

बताया गया कि शानबाग के माओवादी नेता कोबाद घांडी और अनुराधा से संबंध रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि इसके बाद संगीत-नाटक अकादमी ने इन तमाम आरोपों की जांच कराने का फ़ैसला किया. इस बीच पुरस्कार विजेताओं के नामों का ऐलान रोक दिया गया. इस बाबत अकादमी के अध्यक्ष शेखर सेन ने माना, ‘हां, एक नाम (शानबाग) को लेकर कुछ आपत्तियां थीं. हमने इनकी जांच कराई लेकिन सभी आरोपों काे ग़लत पाया. लिहाज़ा हमने उन्हें पुरस्कार देने के सामान्य परिषद के फैसले को क़ायम रखा.’